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    Home » जन-जन में लोकतंत्र के प्रति आस्था पैदा हो
    Breaking News Headlines मेहमान का पन्ना राष्ट्रीय संवाद विशेष

    जन-जन में लोकतंत्र के प्रति आस्था पैदा हो

    Devanand SinghBy Devanand SinghSeptember 14, 2021No Comments7 Mins Read
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    अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस – 15 सितम्बर, 2021 पर विशेष
    जन-जन में लोकतंत्र के प्रति आस्था पैदा हो
    -ललित गर्ग-

    लोकतंत्र एक ऐसी प्रणाली है, जिसमें किसी भी देश के नागरिक अपने मताधिकार का प्रयोग करके एक प्रतिनिधि को चुनते हैं। लोकतंत्र का मतलब होता है, न कोई राजा और न कोई गुलाम, इसमें सब एक समान हैं। हर व्यक्ति को अपनी बात रखने का अधिकार है। हर वर्ष 15 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस मनाया जाता है। प्रसिद्ध राजनैतिक विचारक अब्राहम लिंकन ने इसकी परिभाषा देते हुए कहा था कि लोकतंत्र का मतलब होता है, जनता द्वारा जनता का शासन। लोकतंत्र दिवस का मुख्य उद्देश्य पूरे विश्व में लोकतंत्र को बढ़ावा देना है। 2007 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के द्वारा अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस की शुरुआत की गई थी। सबसे पहले 2008 में अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस मनाया गया। इसके तहत दुनिया के हर कोने में सुशासन लागू करना है। भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जा सकता है, क्योंकि यहां लगभग 60-70 करोड़ लोग अपने मत का प्रयोग करके सरकार को चुनते हैं।
    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल में भारत के लोकतांत्रिक प्रक्रिया व व्यवस्था में सुधार व्यापक देखा गया। धनबल, बाहुबल को काफी हद तक हाशिया मिला। पर बुद्धिबल, जो सबमें श्रेष्ठ व ताकतवर गिना जाता है, उस पर नियंत्रण बिना राष्ट्रीय चरित्र बने सम्भव नहीं। क्योंकि अन्ततोगत्वा बुद्धिबल ही राज करता है। वहां शुद्धि के बिना लोकतंत्र की शुद्धि की कल्पना अधूरी है। भारतीय लोकतंत्र में बाहुबल, धनबल एवं बुद्धिबल का वर्चस्व रहा है। बाहुबल का जब भी प्रयोग हुआ या होता है तो नतीजा महाभारत होता रहा है। धनबल का जब भी प्रयोग हुआ तो नतीजा शोषण, गुलामी के रूप में हुआ। कोई ईस्ट इण्डिया कम्पनी आ जाती है या बन जाती है। बुद्धिबल का सदुपयोग ही उत्कर्ष लाता है और उसका दुरुपयोग अपकर्ष का कारण बनता है, बाहुबल व धनबल को जन्म देता है।
    लेकिन भारतीय लोकतंत्र की विडम्बना है कि यहां लोकतंत्र में सिर गिने जाते हैं, मस्तिष्क नहीं। इसका खामियाजा हमारा लोकतंत्र भुगतता है, भुगतता रहा है। ज्यादा सिर आ रहे हैं, मस्तिष्क नहीं। जाति, धर्म और वर्ग के मुखौटे ज्यादा हैं, मनुष्यता के चेहरे कम। बुद्धि का छलपूर्ण उपयोग कर समीकरण का चक्रव्यूह बना देते हैं, जिससे निकलना अभिमन्यु (मतदाता) ने सीखा नहीं।
    यह हिंसा, यह बूथ लूटना, यह अधिकारियों को पीटना, गलत मत डालना, स्पष्ट संकेत दे रहे हैं कि शिक्षा का अभाव और गरीबी का नहीं मिटना इसके कारण हैं। बिना इनके मिटे सुधार का पुख्ता आधार नहीं बनेगा। मतदाता सौ प्रतिशत शिक्षित हों, गरीबी की रेखा से नीचे कोई नहीं रहे, अधिकतम मतदान हो, तभी लोगों को लोकतंत्र का अर्थ और मूल्य समझ में आएगा। तभी ये जाति, धर्म और वर्गों के समीकरण टूटेंगे। तभी लोकतंत्र को सिर नहीं, मस्तिष्क मिलेंगे।
    लोकतंत्र सुशासन, जवाबदेही, नियंत्रण और संतुलन की सबसे बेहतर प्रणाली है। लेकिन हमारे देश में लोकतंत्र में विषमताएं एवं विसंगतियों का बाहुल्य रहा है, लोकतंत्र के नाम पर छलावा हमारे साथ होता रहा है। इसके जिम्मेदार जितने राजनीति दल है उतने ही हम भी है। यह एक त्रासदी ही है कि हम वोट महोत्सव को कमतर आंकते रहे हैं। जबकि आज यह बताने और जताने की जरूरत है कि इस भारत के मालिक आप और हम सभी हैं और हम जागे हुए हैं। हम सो नहीं रहे हैं। हम धोखा नहीं खा रहे हैं। प्रधानमंत्री ने मतदान प्रतिशत बढ़ाने की अपील करते हुए यह सही कहा कि अधिक से अधिक मतदान का मतलब एक मजबूत लोकतंत्र है और मजबूत लोकतंत्र से ही विकसित भारत बनेगा।
    अब ऐसी व्यवस्था एवं तकनीक विकसित करने का भी समय आ गया है जिससे अपने गांव-शहर से दूर रहने वाले वहां जाए बगैर मतदान कर सकें। ध्यान रहे कि ऐसे लोगों की संख्या करोड़ों में है। रोजी-रोटी के लिए अपने गांव-शहर से दूर जाकर जीवनयापन करने वाले सब लोगों के लिए यह संभव नहीं कि वे मतदान करने अपने घर-गांव लौट सकें। यदि सेना और अर्धसैनिक बलों के जवानों के साथ-साथ चुनाव ड्यूटी में शामिल लोगों के लिए वोट देने की व्यवस्था हो सकती है तो अन्य लोगों के लिए क्यों नहीं हो सकती? एक ऐसे समय जब विदेश में रह रहे भारतीयों को भारत आए बगैर वोट देने की सुविधा देने की तैयारी हो रही है तब फिर ऐसा कुछ किया ही जाना चाहिए जिससे वे आम भारतीय भी मतदान कर सकें जो अपने निर्वाचन क्षेत्र से बाहर होते हैं। ऐसी किसी व्यवस्था के निर्माण के लिए निर्वाचन आयोग के साथ सरकार का भी सक्रिय होना समय की मांग है। इसी से हम अधिकतम मतदान के लक्ष्य को हासिल कर सकंेगे।
    अधिकतम वोटिंग का वास्तविक उद्देश्य है, जन-जन में लोकतंत्र के प्रति आस्था पैदा करना, हर व्यक्ति की जिम्मेदारी निश्चित करना, वोट देने के लिए प्रेरित करना। एक जनक्रांति के रूप श्री रिखबचन्द जैन एवं श्री विपीन गुप्ता के नेतृत्व में  ‘भारतीय मतदाता संगठन’ इस मुहिम के लिये सक्रिय हुआ है, यह शुभ संकेत है। इस तरह के जन-आन्दोलन के साथ-साथ भारतीय संविधान में अनिवार्य मतदान के लिये कानूनी प्रावधान बनाये जाने की तीव्र अपेक्षा है। बेल्जियम, आस्ट्रेलिया, ग्रीस, बोलिनिया और इटली जैसे देशों की भांति हमारे कानून में भी मतदान न करने वालों के लिये मामूली जुर्माना निश्चित होना चाहिए। यदि भारत में मतदान अनिवार्य हो जाए तो चुनावी भ्रष्टाचार बहुत घट जाएगा। यह भी देखा गया है कि चुनावों मंें येन-केन-प्रकारेण जीतने के लिये ये ही राजनीतिक दल और उम्मीदवार मतदान को बाधित भी करते हैं और उससे भी मतदान का प्रतिशत घटता है। अधिकतम मतदान से इस तरह के भ्रष्टाचार से मुक्ति मिलेगी, लोगों में जागरूकता बढ़ेगी, वोट-बैंक की राजनीति थोड़ी पतली पड़ेगी।
    जिस दिन भारत के 90 प्रतिशत से अधिक नागरिक वोट डालने लगेंगे, राजनीतिक जागरूकता इतनी बढ़ जाएगी कि राजनीति को सेवा की बजाय सुखों की सेज मानने वाले किसी तरह का दुस्साहस नहीं कर पायेंगे। राजनीति को सेवा या मिशन के रूप में लेने वाले ही जन-स्वीकार्य होंगे। अधिकतम मतदान का संकल्प लोकतंत्र को एक नई करवट देगा। ”अभी नहीं तो कभी नहीं।“ सत्ता पर काबिज होने के लिये सबके हाथों में खुजली चलती रही है। उन्हें केवल चुनाव में जीत की चिन्ता रहती है, अगली पीढ़ी की नहीं। अब तक मतदाताओं के पवित्र मत को पाने के लिए पवित्र प्रयास की सीमा का उल्लंघन होता रहा है। अधिकतम वोटिंग न होने देना एक तरह की त्रासदी है, यह बुरे लोगों की चीत्कार नहीं है, भले लोगों की चुप्पी है जिसका नतीजा राष्ट्र भुगत रहा है/भुगतता रहेगा, जब तब राष्ट्र का हर नागरिक मुखर नहीं होगा। इसलिये अधिकतम वोटिंग को प्रोत्साहन करना नितांत अपेक्षित है। इसके लिये परम आवश्यक है कि सर्वप्रथम राष्ट्रीय वातावरण अनुकूल बने। देश ने साम्प्रदायिकता, आतंकवाद तथा घोटालों के जंगल में एक लम्बा सफर तय किया है। उसकी मानसिकता घायल है तथा जिस विश्वास के धरातल पर उसकी सोच ठहरी हुई थी, वह भी हिली है। पुराने चेहरों पर उसका विश्वास नहीं रहा। जनतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण पहलू चुनाव है। यह राष्ट्रीय चरित्र का प्रतिबिम्ब होता है। जनतंत्र में स्वस्थ मूल्यों को बनाए रखने के लिए चुनाव की स्वस्थता अनिवार्य है। इसमें देश के हर नागरिक को अपने मत की आहूति देकर लोकतंत्र में अपनी सक्रिय सहभागिता निभानी ही चाहिए।
    शासन व्यवस्था की सबसे श्रेष्ठ प्रणाली लोकतंत्र ही है। तभी उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने कहा कि लोकतंत्र आम आदमी को बोलने की ताकत देता है और यह सुनिश्चित करता है कि कानून की नजर में सभी बराबर हैं। लोकतंत्र का यह अंतर्राष्ट्रीय दिवस दुनिया में लोकतंत्र की स्थिति की समीक्षा करने का अवसर देता है। लोकतंत्र एक लक्ष्य के रूप में एक प्रक्रिया है, और केवल अंतर्राष्ट्रीय समुदाय, राष्ट्रीय शासी निकाय, नागरिक समाज और व्यक्तियों की ओर से पूरी भागीदारी और समर्थन के साथ, लोकतंत्र के आदर्श को हर किसी के लिए आसान हर जगह आनन्दमयी जीवन बनाया जा सके। लोकतंत्र का आधुनिक स्वरूप आज अधिकतम मतदान एवं चुनाव प्रक्रिया और उसके लोकतांत्रिक प्रावधानों के आधार पर निर्धारित होता है।

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