कारो नदी फिर हुई काली, कहीं विकास की कीमत पानी तो नहीं?
*बारिश में लाल मिट्टी का पानी समझ आता है, लेकिन काला पानी क्यों? खनन-औद्योगिक गतिविधियों और प्रशासनिक निगरानी पर प्रश्न चिन्ह!*
राष्ट्र संवाद संवाददाता, बड़बिल।
ओडिशा-झारखंड सीमा क्षेत्र की महत्वपूर्ण कारो नदी में रविवार को पानी का रंग अचानक काला दिखाई देने से आसपास के इलाकों में चिंता और चर्चा तेज हो गई। बारिश के मौसम में लाल मिट्टी के कारण नदी का पानी मटमैला या लाल होना सामान्य माना जा सकता है, लेकिन काले पानी का दिखाई देना कई सवाल खड़े करता है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर नदी के पानी का रंग काला होने के पीछे वास्तविक कारण क्या है?
कारो नदी सुंदरगढ़ और क्योंझर के खनन-औद्योगिक क्षेत्रों से होकर पश्चिमी सिंहभूम में प्रवेश करती है और सारंडा क्षेत्र से गुजरते हुए दक्षिण कोयल नदी में मिलती है। उपलब्ध अध्ययनों में भी कारो नदी के खनन गतिविधियों से प्रभावित होने का उल्लेख मिलता है। एक अध्ययन में कारो-कोयना नदी क्षेत्र में खनन गतिविधियों के कारण जल-गुणवत्ता पर प्रभाव दर्ज किया गया है।
ऐसे में मौजूदा स्थिति को महज बारिश का असर मानकर छोड़ देना भी उचित नहीं होगा। क्या किसी खदान, औद्योगिक इकाई, वाशरी या अपशिष्ट स्थल से निकला पानी नदी तक पहुंचा है? क्या नदी में तलछट या खनिज अवशेष की मात्रा अचानक बढ़ी है? इन सवालों का जवाब केवल वैज्ञानिक जांच से मिल सकता है।
दिलचस्प यह है कि कारो नदी से जुड़े प्रदूषण को लेकर पूर्व में न्यायिक स्तर पर भी शिकायतें सामने आ चुकी हैं। ओडिशा हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में कारो नदी में औद्योगिक अपशिष्ट से जल प्रदूषण संबंधी एक जनहित याचिका दर्ज है।
ऐसे में तत्काल नदी के अलग-अलग स्थानों से पानी के नमूने लेकर जांच कराने, आसपास की खदानों और औद्योगिक इकाइयों के डिस्चार्ज प्वाइंट की जांच तथा रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग उठ रही है। काला पानी सिर्फ नदी का रंग नहीं, बल्कि निगरानी व्यवस्था के लिए भी एक गंभीर चेतावनी है।

