किसी भी लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति केवल उसकी संस्थाओं, चुनावों और संविधान में नहीं होती, बल्कि उसके नागरिकों की स्वतंत्र चेतना में भी होती है। नागरिक यदि प्रश्न पूछना छोड़ दें, तथ्यों को परखना छोड़ दें और किसी तैयार विचार को बिना जांचे अपनी मान्यता बना लें, तो लोकतंत्र का बाहरी ढांचा भले ही सुरक्षित दिखाई दे, उसकी आत्मा कमजोर होने लगती है। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस संबोधन में प्रयुक्त “दिमागी नक्सली” शब्द को इसी व्यापक संदर्भ में देखने की आवश्यकता है। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में देश की शक्ति को झकझोरने की बात करते हुए 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य और नागरिकों की सामूहिक भूमिका पर भी जोर दिया।
दिमागी नक्सली की बहस से आगे: असली सवाल
“दिमागी नक्सली” शब्द पर राजनीतिक बहस होना स्वाभाविक है। कोई इसे कठोर राजनीतिक भाषा मानेगा, कोई इसे वैचारिक चेतावनी के रूप में देखेगा। लेकिन इस शब्द से आगे बढ़कर एक अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न हमारे सामने खड़ा होता है। क्या आज का युवा वास्तव में स्वयं सोच रहा है, या वह किसी राजनीतिक, सामाजिक अथवा डिजिटल समूह द्वारा तैयार की गई प्रतिक्रिया को अपनी स्वतंत्र चेतना समझ रहा है?
यह प्रश्न केवल सत्ता विरोधी युवाओं से नहीं पूछा जाना चाहिए। सत्ता समर्थक युवाओं से भी उतनी ही गंभीरता से पूछा जाना चाहिए। किसी सरकार का समर्थन करना स्वतंत्र चिंतन का प्रमाण नहीं है और सरकार का विरोध करना भी वैचारिक परिपक्वता का प्रमाण नहीं है। स्वतंत्र चिंतन की असली कसौटी यह है कि व्यक्ति अपने प्रिय विचार के सामने भी प्रश्न खड़े कर सके, अपने विरोधी के तर्क को सुन सके और प्रमाण मिलने पर अपनी धारणा बदलने का साहस रख सके।
तैयार वैचारिक पटकथा का खतरा
आज विचारों की दुनिया पहले से कहीं अधिक जटिल हो गई है। हमारे आसपास लगातार ऐसी सूचनाएं आती रहती हैं जो हमारी भावनाओं को तत्काल उत्तेजित करती हैं। किसी घटना का पूरा संदर्भ जाने बिना प्रतिक्रिया देना आसान है। किसी संदेश को पढ़कर क्रोधित होना, किसी चित्र को देखकर निष्कर्ष निकाल लेना या किसी लोकप्रिय व्यक्ति की बात को अंतिम सत्य मान लेना और भी आसान है। धीरे-धीरे व्यक्ति को यह भ्रम होने लगता है कि वह स्वयं सोच रहा है, जबकि उसकी सोच किसी और द्वारा पहले से निर्धारित दिशा में आगे बढ़ रही होती है।
यहीं तैयार वैचारिक पटकथा का खतरा पैदा होता है। यदि हमें पहले ही बता दिया जाए कि किसे देशभक्त मानना है, किसे देशद्रोही, किसे प्रगतिशील और किसे प्रतिक्रियावादी, तो विचार करने की हमारी आवश्यकता समाप्त हो जाती है। हम तर्क के स्थान पर पहचान को चुन लेते हैं और सत्य के स्थान पर अपने पक्ष की सुविधा को। यह स्थिति किसी एक विचारधारा की समस्या नहीं है। यह मनुष्य की उस कमजोरी से जुड़ी है जिसमें वह जटिल प्रश्नों के सरल और सुविधाजनक उत्तर तलाशता है।

विकसित भारत के लिए स्वतंत्र चेतना अनिवार्य
प्रधानमंत्री के उसी स्वतंत्रता दिवस भाषण का दूसरा पक्ष इसलिए अधिक महत्वपूर्ण है। उन्होंने विकसित भारत के लिए “शक्ति की सप्तधारा” की चर्चा करते हुए विनिर्माण, तकनीक, नवाचार, ऊर्जा, राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक क्षमता जैसे क्षेत्रों को आगे बढ़ाने की आवश्यकता बताई। उन्होंने युवाओं की क्षमता और भारत की सामर्थ्य पर भी जोर दिया। प्रधानमंत्री कार्यालय की आधिकारिक वेबसाइट पर भाषण का पूरा विवरण उपलब्ध है।
विकसित भारत का निर्माण केवल आर्थिक संसाधनों से नहीं होगा। उसके लिए विकसित चेतना भी चाहिए। ऐसा युवा चाहिए जो नई तकनीक का उपयोग करे, लेकिन उसके प्रभावों को समझे भी। जो राष्ट्र से प्रेम करे, लेकिन राष्ट्रहित के नाम पर हर प्रश्न को दबा न दे। जो सत्ता का सम्मान करे, लेकिन सत्ता से प्रश्न पूछने के लोकतांत्रिक अधिकार को भी समझे। जो असहमति को शत्रुता न माने और सहमति को सत्य का अंतिम प्रमाण न समझे।
भारत को ऐसे नागरिकों की आवश्यकता है जो किसी भी राजनीतिक दल, संगठन, प्रचार तंत्र या भीड़ को अपनी बुद्धि का स्वामी न बनने दें। स्वतंत्रता का अर्थ केवल बाहरी बंधनों से मुक्ति नहीं है। स्वतंत्रता का एक गहरा अर्थ मानसिक स्वतंत्रता भी है। यदि हमारा मन पूर्वाग्रह, भय, अंधसमर्थन और अंधविरोध से संचालित होने लगे, तो राजनीतिक स्वतंत्रता अधूरी रह जाती है।
इसलिए “दिमागी नक्सली” की बहस को केवल आरोप और प्रत्यारोप तक सीमित कर देना उचित नहीं होगा। इससे कहीं बड़ा प्रश्न यह है कि हम अपने युवाओं को कैसी चेतना देना चाहते हैं। ऐसी चेतना जो किसी भी तैयार पटकथा को स्वीकार कर ले, या ऐसी चेतना जो हर विचार को तर्क, तथ्य और विवेक की कसौटी पर परखे।
2047 का विकसित भारत केवल ऊंची इमारतों, तेज रेल, आधुनिक उद्योगों और नई तकनीकों का भारत नहीं होना चाहिए। वह स्वतंत्र सोच वाले नागरिकों का भारत भी होना चाहिए। क्योंकि अंततः किसी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति उसके हथियार, धन या तकनीक नहीं, बल्कि उसके नागरिकों का विवेक होता है। जिस दिन भारत का युवा यह कहने में सक्षम हो जाएगा कि “मैं तुम्हारी बात सुनूंगा, लेकिन अपना निष्कर्ष स्वयं बनाऊंगा”, उसी दिन स्वतंत्रता का अर्थ और अधिक गहरा हो जाएगा।

