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    Home » छत्तीसगढ़ में ननों की गिरफ़्तारी बीजेपी के लिए सांप्रदायिक संतुलन साधने की रणनीति के लिए झटका
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    छत्तीसगढ़ में ननों की गिरफ़्तारी बीजेपी के लिए सांप्रदायिक संतुलन साधने की रणनीति के लिए झटका

    News DeskBy News DeskAugust 3, 2025No Comments6 Mins Read
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    देवानंद सिंह
    छत्तीसगढ़ के दुर्ग रेलवे स्टेशन पर दो ननों की गिरफ़्तारी ने एक ऐसा राजनीतिक तूफ़ान खड़ा कर दिया है, जिसकी गूंज राज्य की सीमाओं से निकलकर सैकड़ों किलोमीटर दूर केरल में सुनाई दे रही है। यह घटना भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के लिए केवल एक स्थानीय मुद्दा नहीं रही, बल्कि एक व्यापक सांप्रदायिक-सामाजिक प्रश्न बन गई है, जिसने उसकी ‘अल्पसंख्यक आउटरीच’ रणनीति को गहरे संकट में डाल दिया है।

    दरअसल, गत 25 जुलाई को छत्तीसगढ़ पुलिस ने वंदना फ्रांसिस और प्रीति मैरी नामक दो ननों को दुर्ग रेलवे स्टेशन पर गिरफ़्तार किया। आरोप लगाया गया कि ये नन तीन युवतियों, जिनकी उम्र 19, 21 और 24 साल है को अपने साथ उत्तर भारत, आगरा के एक संस्थान में ले जा रही थीं, जहां उन्हें रसोई विभाग में नियोजित किया जाना था। शिकायत बजरंग दल के एक स्थानीय सदस्य द्वारा दर्ज कराई गई थी, जिसमें मानव तस्करी और जबरन धर्मांतरण के आरोप लगाए गए, हालांकि बाद में यह स्पष्ट हुआ कि इन युवतियों के पास वैध दस्तावेज़, माता-पिता की सहमति पत्र और नियोजन संबंधी प्रमाणपत्र भी मौजूद थे। इसके बावजूद पुलिस ने बिना विस्तृत जांच के कार्रवाई करते हुए ननों को हिरासत में लिया, जिससे पूरे ईसाई समुदाय में असंतोष की लहर फैल गई।

    यह मामला उस समय सामने आया है, जब केरल में आगामी स्थानीय निकाय चुनावों की तैयारियां चल रही हैं, जिन्हें अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा है। केरल ईसाई समुदाय की सघन उपस्थिति वाला राज्य है, वहां बीजेपी पिछले कुछ वर्षों से संगठित रूप में पैर जमाने की कोशिश कर रही है। इसके लिए उसने चर्चों से संवाद बढ़ाया, ईसाई त्योहारों में भागीदारी की और कैथोलिक समुदाय के नेताओं से मुलाकातें भी कीं, लेकिन छत्तीसगढ़ की यह घटना उन सभी कोशिशों को न सिर्फ कमजोर करती है, बल्कि ईसाई समुदाय के भीतर पहले से मौजूद आशंकाओं को और मजबूत कर देती है। सायरो-मालाबार जैसे बड़े और प्रभावशाली ईसाई समुदाय ने, जिसने हाल के वर्षों में बीजेपी को कुछ हद तक समर्थन देना शुरू किया था, इस घटना पर खुलकर नाराज़गी ज़ाहिर की है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह बीजेपी के लिए दक्षिण भारत में सांप्रदायिक संतुलन साधने की रणनीति में एक गहरा धक्का है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बीजेपी राष्ट्रीय स्तर पर अपने हितों को संतुलित नहीं कर पा रही है। छत्तीसगढ़ और केरल की बीजेपी इकाइयों के बीच हितों का टकराव इस पूरे प्रकरण में स्पष्ट रूप से दिखता है।
    छत्तीसगढ़ में जहां बीजेपी हिंदू बहुल मतदाताओं को लुभाने के लिए धर्मांतरण विरोधी एजेंडा पर काम कर रही है, वहीं केरल में वह ईसाई समुदाय को अपने पाले में लाने की कोशिशों में लगी है। यह विरोधाभास तब और तीव्र हो गया जब केरल बीजेपी अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने सार्वजनिक रूप से बजरंग दल को इस घटना के लिए ज़िम्मेदार ठहराया और पार्टी की छवि सुधारने की कोशिश की।

    बीजेपी ने तत्काल प्रतिक्रिया देते हुए एक प्रतिनिधिमंडल छत्तीसगढ़ भेजा ताकि ननों की रिहाई की प्रक्रिया में तेजी लाई जा सके। पर यह कदम भी घाव पर मरहम जैसा प्रतीत हुआ, क्योंकि असल आघात ननों की गिरफ़्तारी से पहले ही लग चुका था। कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया और केरल कैथोलिक बिशप्स काउंसिल जैसे संगठनों ने इस कार्रवाई को धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन बताया है। उनका कहना है कि यह केवल ननों के खिलाफ नहीं, बल्कि संपूर्ण ईसाई समुदाय के विरुद्ध एक आक्रामक रुख का संकेत है।

    सीबीसीआई के अध्यक्ष मार एंड्रयूज़ ताज़ात ने कहा कि यह घटना ईसाइयों के उत्पीड़न की कई घटनाओं में से एक है। ननों को उनके धार्मिक वस्त्रों के कारण निशाना बनाया गया। यह देश के संविधान के खिलाफ है। उन्होंने यह भी चेताया कि इस तरह की घटनाएं अब ईसाई समुदाय के भीतर एक डर का माहौल पैदा कर रही हैं।
    वहीं, कुछ विश्लेषकों ने 2014 से 2024 के बीच ईसाइयों पर हमलों की घटनाओं में छह गुना वृद्धि को चिन्हित करते हुए इसे एक सांख्यिकीय भयावहता करार दिया।

    बीजेपी के लिए यह दोहरा संकट है। जहां एक ओर उसे अपनी पार्टी के भीतर टकराव और जनता के बीच छवि संकट से जूझना पड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस और सीपीएम जैसे विपक्षी दल इस मुद्दे को उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। इन दलों के सांसदों ने न सिर्फ जेल में बंद ननों से मुलाकात की, बल्कि इसे मानवाधिकार के उल्लंघन और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की साजिश करार दिया। यह भी उल्लेखनीय है कि इस पूरे मामले को लेकर चर्च ने फिलहाल राजनीतिक निष्क्रियता का रुख अपनाया है, लेकिन वह प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की प्रतिक्रिया का इंतज़ार कर रहा है। इससे यह संकेत भी मिलता है कि बीजेपी के साथ उसका संवाद भले ही टूटा नहीं हो, लेकिन उस पर भरोसा भी अब पहले जैसा नहीं रह गया है।

    राज्य के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा है कि यह मामला धर्मांतरण और मानव तस्करी से जुड़ा है और पुलिस ने पूरी जांच के बाद कार्रवाई की है। उन्होंने इस मुद्दे को राजनीतिक रंग देने से बचने की सलाह दी, लेकिन विरोधी दलों और ईसाई संगठनों का कहना है कि यह कार्रवाई पहले से तय स्क्रिप्ट के तहत हुई है, जिसमें बजरंग दल की शिकायत को आधार बनाकर राज्य पुलिस ने त्वरित गिरफ्तारी कर बीजेपी के हिंदुत्ववादी रुख को संतुष्ट करने का प्रयास किया। कुल मिलाकर, बीजेपी के लिए यह घटनाक्रम न सिर्फ छत्तीसगढ़ के स्थानीय चुनावों को प्रभावित कर सकता है, बल्कि केरल जैसे राज्य में उसके सीमित राजनीतिक आधार को भी कमजोर कर सकता है। यह साफ हो गया है कि पार्टी जब एक राज्य में बहुसंख्यक भावनाओं को तुष्ट करने की कोशिश करती है, तो दूसरे राज्य में अल्पसंख्यकों के भरोसे को तोड़ती है।

    प्रधानमंत्री मोदी द्वारा ईसाई समुदाय के बीच पहुंच बनाने की जो कोशिशें की गई थीं, जैसे चर्चों में दौरे, क्रिसमस संदेश और समुदाय के नेताओं से संवाद, वो सब अब सवालों के घेरे में हैं। खासकर, तब, जब ननों की गिरफ्तारी जैसी घटनाएं उनकी सरकार की धार्मिक सहिष्णुता की छवि को गहरा आघात पहुंचाती हैं। केरल जैसे राज्य में, जहां ईसाई और मुस्लिम मिलाकर कुल आबादी का लगभग 45% हिस्सा हैं, ऐसी घटनाएं बीजेपी के लिए दीर्घकालिक नुकसान का कारण बन सकती हैं। विश्वास की पुनःस्थापना के लिए केवल प्रतिनिधिमंडल भेजना या बयान जारी करना पर्याप्त नहीं होगा। अगर, बीजेपी को वास्तव में एक सर्वसमावेशी पार्टी के रूप में राष्ट्रीय पहचान चाहिए, तो उसे अपने संगठन और सहयोगी संगठनों के बीच सामंजस्य और संवेदनशीलता सुनिश्चित करनी होगी।

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