एनडीए के लिए कम चुनौतीपूर्ण नहीं होगा नया कार्यकाल
देवानंद सिंह
बिहार ने एक बार फिर नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए को स्पष्ट जनादेश दिया है। यह जीत केवल एक चुनावी विजय नहीं, बल्कि पिछले दो दशकों में विकसित हुए उन भरोसे के स्तंभों की पुष्टि भी है, जिन पर सुशासन बाबू की छवि खड़ी हुई। सड़कें बेहतर हुईं, स्कूलों की संख्या और पहुंच बढ़ी, स्वास्थ्य ढांचा मजबूत हुआ और महिलाओं की भागीदारी अभूतपूर्व रूप से विस्तृत हुई। बावजूद इसके, बिहार आज भी देश के सबसे पिछड़े राज्यों की सूची में शीर्ष पर है। यही विरोधाभास राज्य के विकास मॉडल के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय में नीतीश कुमार का फिर से मुख्यमंत्री बनना तय मान लिया गया है, लेकिन आने वाला कार्यकाल पहले से कहीं अधिक कठिन और निर्णायक होगा। भरोसे के साथ-साथ एक बढ़ती हुई अपेक्षा भी जनता ने सरकार के कंधों पर रख दी है, अब बिहार को अगले स्तर पर ले जाना ही होगा। सवाल यह है कि यह छलांग कैसे लगेगी, और किन मोर्चों पर सबसे पहले ध्यान देना होगा?
बिहार चुनाव में रोजगार सबसे बड़ा मुद्दा था, महागठबंधन ने हर परिवार से एक सरकारी नौकरी देने का वादा किया, जबकि एनडीए ने एक करोड़ नौकरियां, लेकिन आंकड़े साफ बताते हैं कि समस्या केवल नौकरी पैदा करने की नहीं है, बल्कि राज्य की संरचनात्मक आर्थिक क्षमता की कमी इसे एक लंबे समय से पलायन-निर्भर अर्थव्यवस्था बना चुकी है।
एक रिपोर्ट के अनुसार, बिहार में तीन में से दो परिवारों का कम से कम एक सदस्य राज्य से बाहर काम करता है। 1981 में जहां केवल लगभग 10–15 प्रतिशत परिवारों में ही कोई प्रवासी मजदूर होता था, 2017 तक यह संख्या 65 प्रतिशत हो गई। 2023 में देश के जो चार सबसे व्यस्त अनरिज़र्व्ड रेल मार्ग थे, वे सभी बिहार से ही शुरू हो रहे थे, यह आंकड़ा बताता है कि राज्य का वर्किंग फोर्स किस स्तर पर बिहार से बाहर निर्बाध रूप से बह रहा है।
छोटी जोतों वाली कृषि, उद्योगों की कमी और कमजोर मैन्युफैक्चरिंग बेस ने मिलकर यह स्थिति पैदा की है। बिहार का 54 प्रतिशत वर्किंग फोर्स अभी भी खेती पर निर्भर है, जबकि राष्ट्रीय औसत 46 प्रतिशत है। वहीं, राज्य के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में मात्र 5 प्रतिशत लोग काम करते हैं, राष्ट्रीय औसत 11 प्रतिशत के मुकाबले यह स्थिति बेहद कमजोर है, जितनी तेजी से बिहार की आबादी कार्यशील आयु वर्ग में प्रवेश कर रही है, उतनी तेजी से रोजगार के अवसर नहीं बढ़ रहे।
भारत के तेज़ी से विकसित हो रहे राज्यों गुजरात, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और केरल के विकास मॉडल का केंद्र शहरीकरण है, लेकिन 2011 की जनगणना के अनुसार, बिहार का शहरीकरण केवल 11.3 प्रतिशत था, जबकि तमिलनाडु में यह लगभग 48 प्रतिशत, गुजरात में 42 प्रतिशत और केरल में करीब 47 प्रतिशत तक पहुंच चुका था।
नीतीश कुमार के शासन काल में सड़कें, पुल, बिजली और स्वास्थ्य सुविधाओं में भारी सुधार अवश्य हुआ, लेकिन शहरीकरण की गति बेहद धीमी रही। 2013 से 2023 के बीच के नाइट लाइट डेटा से स्पष्ट होता है कि बिहार के अधिकांश विधानसभा क्षेत्र आज भी स्पष्ट रूप से ग्रामीण स्वरूप में हैं। रात की रोशनी से दिखने वाली मानव गतिविधियां उद्योग, निर्माण, बाजार, परिवहन बिहार में उतनी तीव्रता से नहीं बढ़ीं, जितनी तेजी से उन्हें बढ़ना चाहिए था।
बिहार में मैन्युफैक्चरिंग जीडीपी में 5–6 प्रतिशत योगदान देती है। यह आंकड़ा बीस साल पहले भी लगभग इतना ही था, यानी इस क्षेत्र में दो दशक में कोई सार्थक प्रगति नहीं हुई। वहीं गुजरात की जीएसडीपी में मैन्युफैक्चरिंग का योगदान 36 प्रतिशत है। यह अंतर बताता है कि बिहार केवल अपेक्षाकृत ही नहीं बल्कि संरचनात्मक रूप से भी पीछे है।
फैक्ट्रियों की सीमित संख्या कौशल विकास को बाधित करती है। राज्य में उद्योगों का न होना युवाओं को स्किल-ट्रेनिंग के बाद भी घर के बाहर काम खोजने पर मजबूर कर देता है। परिणाम—पलायन, कम प्रति व्यक्ति आय, और स्थानीय अर्थव्यवस्था की धीमी वृद्धि।
नीतीश कुमार को जंगल राज समाप्त करने के लिए जिस तरह श्रेय दिया गया, उसी पर अब चुनौती खड़ी हो गई है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि 2015 से 2024 के बीच बिहार में अपराध दर में भारी वृद्धि हुई है, जबकि उसी अवधि में राष्ट्रीय स्तर पर अपराध की वृद्धि दर 24 प्रतिशत रही। 2023 में बिहार में दर्ज हुए 2862 हत्या के मामले उत्तर प्रदेश के बाद
देश में दूसरा सबसे बड़ा आंकड़ा है। पुलिस और सरकारी कर्मचारियों पर हमलों में बिहार शीर्ष पर है, जो प्रशासनिक ढांचे पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। सुशासन का आधार केवल विकास नहीं, बल्कि सुरक्षा भी है। यदि, कानून-व्यवस्था मजबूत नहीं होती, तो कोई भी बड़ा निवेश बिहार की ओर नहीं आएगा, और यह चक्र फिर से पलायन, बेरोजगारी और आर्थिक ठहराव की ओर लौटेगा।
भारत की प्रति व्यक्ति आय जहां 1.89 लाख रुपये पार कर चुकी है, वहीं बिहार की प्रति व्यक्ति आय 60,000 रुपये के आसपास है, जो राष्ट्रीय औसत का एक-तिहाई है। राज्य के भीतर भी आय का अंतर चौंकाने वाला है।
पटना की प्रति व्यक्ति आय 2,15,049 रुपये है, शिवहर की प्रति व्यक्ति आय 33,399 रुपये है। चार गुना का यह अंतर बताता है कि बिहार में विकास केवल कुछ शहरी पॉकेट्स में सिमटा हुआ है। ग्रामीण क्षेत्रों में अवसरों की कमी, कमजोर बाजार, सीमित औद्योगिक नेटवर्क और इंफ्रास्ट्रक्चर की असमानता इस दूरी को और बढ़ा देती है।
बिहार में स्कूल छोड़ने की दर चिंताजनक रूप से अधिक है। बड़ी संख्या में बच्चे मिडिल स्कूल से आगे नहीं बढ़ पा रहे। यह केवल शिक्षा का संकट नहीं, बल्कि भविष्य की आर्थिक क्षमता का भी संकट है। राज्य के हेल्थ इंडिकेटर बेहतर हुए हैं, लेकिन शिक्षा का कमजोर आधार किसी भी लंबे आर्थिक विकास की संभावनाओं पर भारी पड़ सकता है। बिहार युवा है, लेकिन यह ऊर्जा तभी लाभ बनती है जब उसे सही दिशा, शिक्षा और कौशल मिले। राज्य में प्रजनन दर 2.8 है, जो राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है। मृत्यु दर कम होने से जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है।
तेजी से बढ़ती आबादी का अर्थ है शिक्षा पर दबाव,
स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव, रोजगार की बढ़ती आवश्यकता और शहरी ढांचे पर जनसंख्या भार, यानी बिहार को अगले दशक में विशाल बुनियादी और सामाजिक निवेश की जरूरत पड़ेगी। नीतीश कुमार का नया कार्यकाल बिहार के लिए निर्णायक साबित हो सकता है। कम से कम 2–3 बड़े औद्योगिक कॉरिडोर विकसित करने होंगे। एग्रो-बेस्ड, टेक्सटाइल, फ़ूड प्रोसेसिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे सेक्टर प्राथमिकता बन सकते हैं। माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइज (MSME) का मजबूत नेटवर्क बनाना होगा। टियर–2 और टियर–3 शहरों को आर्थिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में विकसित करना होगा।
कानून-व्यवस्था में बड़े सुधार के अंतर्गत पुलिस तंत्र का आधुनिकीकरण हो, तेजी से ट्रायल हो, अपराध नियंत्रण में तकनीकी हस्तक्षेप हो और गैंग-लिंक्ड अपराध पर सख्त कार्रवाई हो। शिक्षा में संरचनात्मक क्रांति के अंतर्गत
सरकारी स्कूलों में गुणवत्ता सुधार, हाई स्कूल और कॉलेजों में तकनीकी शिक्षा, स्किल डेवलपमेंट को उद्योग से सीधे जोड़ना जरूरी है, वहीं, स्वास्थ्य और जनसंख्या प्रबंधन के तहत परिवार नियोजन को नए सिरे से मजबूत करना, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य पर प्राथमिक निवेश,
जिला स्तर पर स्वास्थ्य ढांचे का विस्तार आवश्यक है।
बिहार ने दो दशक में लंबी यात्रा तय की है, लेकिन इससे लंबी यात्रा उसके सामने खड़ी है। पलायन के सहारे चलने वाली अर्थव्यवस्था को अब आत्मनिर्भर बनाना होगा। शहरीकरण बढ़ाना होगा। मैन्युफैक्चरिंग को व्यापक रूप से स्थापित करना होगा। शिक्षा–स्वास्थ्य पर बड़े निवेश करने होंगे, और कानून-व्यवस्था को स्थायी रूप से सुधारना होगा। बिहार की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी है, और यही उसकी सबसे बड़ी चुनौती भी।
अब सवाल यह नहीं कि नीतीश कुमार जीत पाए या नहीं, या वे फिर मुख्यमंत्री बनेंगे या नहीं। सवाल यह है कि क्या बिहार आने वाले पांच वर्षों में अपने विकास मॉडल को पुनर्परिभाषित कर पाएगा? अगर, यह परिवर्तन हुआ, तो बिहार पलायन की मजबूरी को अवसर में बदल सकता है।
अगर, नहीं हुआ, तो राज्य अपनी ही आबादी के बोझ तले दबता रहेगा। बिहार की नई सरकार के लिए यही असली परीक्षा है।

