Author: Nikunj Gupta

लेखक: इंद्र यादवभारत में हर नागरिक को पारदर्शिता और जवाबदेही का अधिकार है, विशेषकर जब बात सार्वजनिक धन के उपयोग और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों के निर्माण की आती है। सड़कों के निर्माण और रखरखाव में भी जानकारी का अधिकार उतना ही महत्वपूर्ण है जितना किसी उपभोक्ता वस्तु के लिए, जहाँ हर छोटी से छोटी जानकारी हमें उपलब्ध होती है। यह लेख इस गंभीर विषय पर प्रकाश डालता है कि कैसे सड़कों से जुड़ी जानकारी का अभाव न केवल भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है, बल्कि आम जनता को उसके मूलभूत हक से भी वंचित करता है।एक साधारण पांच रुपये वाला बिस्कुट…

Read More

लेखक: सुनील चिंचोलकर भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत में शास्त्रीय नृत्यों का एक अद्वितीय स्थान है, और कथक उनमें से एक प्रमुख शैली है। देशभर में भारतीय शास्त्रीय नृत्यों की प्रतिष्ठा बढ़ाने वाली युवा प्रतिभाओं में एक नया नाम जुड़ गया है। छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले की अनन्या तिवारी ने देहरादून में आयोजित प्रतिष्ठित ऑल इंडिया नेशनल डांस प्रतियोगिता में जूनियर वर्ग में प्रथम स्थान प्राप्त कर राज्य और अपने जिले का गौरव बढ़ाया है। यह उपलब्धि न केवल अनन्या के लिए बल्कि उनके परिवार, विद्यालय और पूरे क्षेत्र के लिए गर्व का विषय है। इस राष्ट्रीय मंच पर उनकी…

Read More

लेखक: देवानंद सिंहभारतीय राजनीति में दल-बदल एक पुरानी परिघटना है, लेकिन हाल के वर्षों में इसका स्वरूप और भी जटिल हो गया है। विशेष रूप से जब लोकसभा चुनाव नजदीक हों, तो राजनीतिक दलों में अंदरूनी कलह और नेताओं की पाला बदलने की खबरें तेजी से सामने आती हैं। ये घटनाक्रम न केवल संबंधित दलों की आंतरिक स्थिरता को चुनौती देते हैं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य को भी गहरा प्रभावित करते हैं।तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में हाल के दिनों में सामने आई बगावत ने राष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। लोकसभा के 19 सांसदों की कथित नाराजगी और राज्यसभा…

Read More

लेखक: डॉ. सत्यवान सौरभ जब मौत बन जाए सोशल मीडिया का कंटेंट हाल के दिनों में एक मासूम बच्चे की निर्मम हत्या और हांसी में एक दुकानदार की दर्दनाक हत्या से जुड़े वीडियो सोशल मीडिया पर धड़ल्ले से पोस्ट और शेयर किए जा रहे हैं। इन वीडियो की एक झलक मात्र ही किसी भी संवेदनशील व्यक्ति की रूह कंपा देने के लिए पर्याप्त है। पूरे वीडियो को देखने की हिम्मत बहुत कम लोग जुटा पा रहे हैं। जो भी इन्हें देख रहा है, वह उनकी भयावहता और अमानवीयता से विचलित हो रहा है। ऐसे वीडियो में न कोई संदेश है,…

Read More

लेखक: ललित गर्गभारतीय समाज में महिलाओं को सशक्त बनाने के दावे लंबे समय से किए जाते रहे हैं। उन्हें ‘आधी आबादी’ और विकास की समान भागीदार कहा जाता है। शिक्षा, रोजगार, राजनीति और नेतृत्व के क्षेत्र में उनकी भागीदारी बढ़ाने के लिए अनेक योजनाएं बनाई जाती हैं। संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की प्रतिबद्धता जताई जाती है। सरकारें महिला सशक्तीकरण को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल करती हैं और समाज भी महिलाओं की उपलब्धियों पर गर्व व्यक्त करता है। लेकिन इन सबके बीच कुछ ऐसे तथ्य सामने आते हैं, जो हमें इस सशक्तीकरण के वास्तविक स्वरूप…

Read More

लेखक: मनीषा शर्मा जीवन के उतार-चढ़ाव में जब काले बादल आसमान को घेर लेते हैं और तूफानों का सामना करना पड़ता है, तब भी जो शख्स अडिग खड़ा रहता है, वही होते हैं मेरे पिता। आँसुओं की बारिश में भी, जो अपने होंठों पर एक मंद मुस्कान बिखेर कर रखता है, वह कोई और नहीं, बल्कि मेरे पिता ही हैं। उनकी उपस्थिति मात्र से ही हर मुश्किल आसान लगने लगती है, और उनकी हिम्मत हमें भी आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। उनका साथ हमें हर चुनौती का सामना करने की शक्ति देता है, और उनके अनुभवों से हम सीखते…

Read More

चापड़, एक किस्म का चाकू ही है। इसका इस्तेमाल सब्जियों को काटने से लेकर मुर्गा-मटन-मछली आदि काटने में किया जाता रहा है। लेकिन, औद्योगिक शहर जमशेदपुर में इस चापड़ से लोगों की हत्याएं तक हो रही हैं। सोचिए, कहां सब्जी काटने वाला चापड़ और उसी से आप किसी का सीना फाड़ दें, किसी का चेहरा काट दें, किसी की गर्दन उतार दें तो समाज में क्या संदेश जाएगा और दहशत किस स्तर का होगा? एकदम नई, बाली उमर के बच्चों-युवाओं के हाथों में चापड़ आ गया है। किसी की स्कूटी की डिग्गी में चापड़ है तो कोई साइकिल की हैंडिल…

Read More

लेखक: इंद्र यादव भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी जागरूक जनता है। संविधान ने नागरिकों को अभिव्यक्ति, विचार और अधिकारों के लिए संघर्ष करने की स्वतंत्रता दी है। लेकिन हाल के वर्षों में एक चिंताजनक प्रवृत्ति देखने को मिल रही है, जहां शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय जैसे मूलभूत मुद्दों की जगह धार्मिक भावनाओं और पहचान की राजनीति अधिक प्रमुख होती जा रही है। ऐसे माहौल में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या समाज युवाओं को अधिकारों के लिए कलम उठाने की प्रेरणा दे रहा है या भावनात्मक मुद्दों पर लाठी उठाने के लिए तैयार कर रहा है।…

Read More

लेखक: देवानंद सिंहझारखंड में राज्यसभा चुनाव की प्रक्रिया के बीच निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवानी के नामांकन को लेकर उत्पन्न विवाद ने राजनीतिक माहौल को गरमा दिया है। कांग्रेस द्वारा नामांकन पत्र में कथित त्रुटियों का मुद्दा उठाते हुए रिटर्निंग ऑफिसर की निष्पक्षता पर सवाल खड़े किए गए हैं, वहीं भाजपा ने इन आरोपों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर दबाव बनाने की कोशिश बताया है। विधानसभा परिसर में दोनों दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच हुई नारेबाजी और नोंकझोंक ने यह संकेत दिया है कि राज्यसभा चुनाव अब केवल संवैधानिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा की राजनीतिक लड़ाई का रूप ले चुका…

Read More

लेखक: प्रो. आरके जैन “अरिजीत” राजनीति में ऐसे क्षण विरले आते हैं, जब कोई वाक्य भाषण की सीमा लांघकर राष्ट्रीय विमर्श का दर्पण बन जाता है। दावों की ऊंचाई और हकीकत की जमीन के बीच खड़े भारत को नागपुर से एक सीधा संदेश मिला। रेशीमबाग में संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि ‘हमारी तैयारी अभी अधूरी है, यही हमें विश्वगुरु बनने से रोक रहा है’। यह कथन इसलिए महत्वपूर्ण नहीं कि इसे संघ प्रमुख ने कहा, बल्कि इसलिए कि यह उस दौर में आया है जब उपलब्धियों का उत्सव अक्सर आत्ममंथन की आवश्यकता को ढंक देता है। राष्ट्रों…

Read More