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    Home » घातक खतरा: सोशल मीडिया पर ऐसी सामग्री का खुलेआम प्रसार
    अपराध राष्ट्रीय संपादकीय

    घातक खतरा: सोशल मीडिया पर ऐसी सामग्री का खुलेआम प्रसार

    Nikunj GuptaBy Nikunj GuptaJune 14, 2026No Comments7 Mins Read
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    सोशल मीडिया पर ऐसी सामग्री का खुलेआम प्रसार
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    लेखक: डॉ. सत्यवान सौरभ

    जब मौत बन जाए सोशल मीडिया का कंटेंट

    हाल के दिनों में एक मासूम बच्चे की निर्मम हत्या और हांसी में एक दुकानदार की दर्दनाक हत्या से जुड़े वीडियो सोशल मीडिया पर धड़ल्ले से पोस्ट और शेयर किए जा रहे हैं। इन वीडियो की एक झलक मात्र ही किसी भी संवेदनशील व्यक्ति की रूह कंपा देने के लिए पर्याप्त है। पूरे वीडियो को देखने की हिम्मत बहुत कम लोग जुटा पा रहे हैं। जो भी इन्हें देख रहा है, वह उनकी भयावहता और अमानवीयता से विचलित हो रहा है। ऐसे वीडियो में न कोई संदेश है, न कोई सकारात्मक उद्देश्य, बल्कि केवल पीड़ा, भय और मानसिक असहजता है। इसलिए यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या सोशल मीडिया पर ऐसी सामग्री का खुलेआम प्रसार उचित है और क्या प्लेटफॉर्म्स को इसे तुरंत हटाने की जिम्मेदारी नहीं निभानी चाहिए?

    डिजिटल युग में सूचना का आदान-प्रदान: संवेदना बनाम सनसनी

    डिजital युग में सूचना का आदान-प्रदान पहले की तुलना में कहीं अधिक तेज हो गया है। कोई भी घटना कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुँच जाती है। यह तकनीक का सकारात्मक पक्ष है, क्योंकि इससे लोगों को त्वरित जानकारी मिलती है। लेकिन जब इसी तकनीक का उपयोग किसी की हत्या, दुर्घटना या व्यक्तिगत त्रासदी के भयावह दृश्यों को फैलाने के लिए होने लगे, तब यह चिंता का विषय बन जाता है। सूचना और सनसनी के बीच एक स्पष्ट अंतर होता है। किसी घटना की जानकारी देना आवश्यक हो सकता है, लेकिन उस घटना के वीभत्स दृश्यों को बार-बार प्रसारित करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता।

    पीड़ित परिवारों पर अतिरिक्त बोझ और गरिमा का हनन

    जब किसी बच्चे की हत्या होती है या किसी व्यक्ति को बेरहमी से मार दिया जाता है, तब वह केवल एक खबर नहीं होती। उसके पीछे एक परिवार का दर्द, असंख्य टूटे हुए सपने और जीवनभर का दुःख छिपा होता है। ऐसे वीडियो वायरल होने पर पीड़ित परिवारों की पीड़ा और बढ़ जाती है। वे लोग जो पहले से ही अपनों को खोने के सदमे में होते हैं, उन्हें बार-बार वही दृश्य सोशल मीडिया पर देखने पड़ते हैं। यह उनके लिए मानसिक यातना से कम नहीं है। किसी भी सभ्य समाज में मृतक और उसके परिवार की गरिमा का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन वायरल संस्कृति ने कई बार इस संवेदनशीलता को पीछे छोड़ दिया है।

    वायरल होने की होड़ और नैतिक पतन

    सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के साथ “वायरल” होने की होड़ भी बढ़ी है। अधिक लाइक, व्यूज़, शेयर और फॉलोअर्स पाने की चाह में कई लोग बिना किसी नैतिक विचार के ऐसी सामग्री साझा कर देते हैं। कई बार लोग यह कहकर वीडियो पोस्ट करते हैं कि वे सच्चाई दिखा रहे हैं, जबकि वास्तविकता यह होती है कि वे अनजाने या जानबूझकर एक दर्दनाक घटना को डिजिटल तमाशे में बदल रहे होते हैं। किसी की मृत्यु या पीड़ा को लोकप्रियता प्राप्त करने का माध्यम बनाना न केवल असंवेदनशीलता का परिचायक है, बल्कि सामाजिक मूल्यों के क्षरण का भी संकेत है।

    सोशल मीडिया पर ऐसी सामग्री के प्रसार का मनोवैज्ञानिक प्रभाव

    मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी ऐसे वीडियो बेहद हानिकारक होते हैं। हिंसक और रक्तरंजित दृश्य देखने से लोगों में तनाव, भय, चिंता और मानसिक बेचैनी बढ़ सकती है। कई संवेदनशील व्यक्तियों को लंबे समय तक ऐसे दृश्य परेशान करते रहते हैं। बच्चों और किशोरों पर इसका प्रभाव और भी गंभीर हो सकता है। वे या तो अत्यधिक भयभीत हो सकते हैं या फिर हिंसा को सामान्य व्यवहार के रूप में स्वीकार करने लगते हैं। इंटरनेट की खुली दुनिया में यह सुनिश्चित करना लगभग असंभव है कि ऐसे वीडियो केवल वयस्कों तक ही सीमित रहें। इसलिए इनका अनियंत्रित प्रसार समाज के मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी खतरा है। सोशल मीडिया के मनोवैज्ञानिक प्रभाव पर विकिपीडिया

    संवेदनहीनता में वृद्धि: एक सामाजिक खतरा

    एक और गंभीर समस्या यह है कि लगातार हिंसक सामग्री देखने से लोगों में संवेदनहीनता बढ़ने लगती है। जो दृश्य पहले मन को झकझोर देते थे, वे धीरे-धीरे सामान्य लगने लगते हैं। बार-बार हत्या, दुर्घटना और रक्तपात के दृश्य देखने से मनुष्य के भीतर करुणा और सहानुभूति की भावना कमजोर पड़ सकती है। यह किसी भी समाज के लिए शुभ संकेत नहीं है। एक स्वस्थ समाज की पहचान उसकी संवेदनशीलता होती है। यदि लोग दूसरों के दुःख को महसूस करना छोड़ दें, तो सामाजिक संबंधों और मानवीय मूल्यों की नींव कमजोर होने लगती है।

    सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जिम्मेदारी और समाधान

    यहाँ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जिम्मेदारी भी अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स, यूट्यूब और अन्य डिजिटल मंचों के पास आधुनिक तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के ऐसे साधन उपलब्ध हैं, जिनकी मदद से हिंसक सामग्री की पहचान की जा सकती है। फिर भी अनेक भयावह वीडियो घंटों और कभी-कभी दिनों तक प्लेटफॉर्म पर बने रहते हैं और लाखों लोगों तक पहुँच जाते हैं। यह स्थिति स्वीकार्य नहीं है। जिन वीडियो में हत्या, गंभीर हिंसा या बच्चों के विरुद्ध अपराध के दृश्य हों, उन्हें तत्काल हटाया जाना चाहिए। साथ ही ऐसे कंटेंट को अपलोड और प्रसारित करने वालों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई भी होनी चाहिए।

    मीडिया की भूमिका: जिम्मेदारी और नैतिकता

    मीडिया की भूमिका भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। पत्रकारिता का उद्देश्य केवल दर्शकों का ध्यान आकर्षित करना नहीं, बल्कि जिम्मेदार तरीके से सूचना देना भी है। वर्षों से पत्रकारिता में कुछ नैतिक मानदंड स्थापित रहे हैं, जिनके तहत मृतकों की गरिमा, पीड़ितों की निजता और दर्शकों की मानसिक सुरक्षा का ध्यान रखा जाता है। डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया पर भी इन्हीं मूल्यों का पालन आवश्यक है। किसी घटना के बारे में जानकारी दी जा सकती है, लेकिन उसकी भयावहता को बार-बार प्रदर्शित करना पत्रकारिता नहीं, बल्कि सनसनीखेज प्रस्तुति कहलाएगी।

    नागरिकों की भी है अहम जिम्मेदारी

    हालाँकि केवल प्लेटफॉर्म्स और मीडिया को दोष देना पर्याप्त नहीं है। दर्शकों और सामान्य नागरिकों की भी जिम्मेदारी है। किसी भी हिंसक वीडियो को देखने या प्राप्त करने के बाद उसे आगे साझा करना आवश्यक नहीं होता। यदि लोग ऐसे वीडियो को रिपोर्ट करें, उन्हें आगे न बढ़ाएँ और दूसरों को भी ऐसा न करने के लिए प्रेरित करें, तो इनके प्रसार को काफी हद तक रोका जा सकता है। डिजिटल नागरिकता का अर्थ केवल इंटरनेट का उपयोग करना नहीं, बल्कि उसका जिम्मेदारीपूर्वक उपयोग करना भी है। [INTERNAL_LINK_HOLDER]

    मानवता और संवेदना को वायरल करने की आवश्यकता

    आज आवश्यकता इस बात की है कि हम तकनीक का उपयोग मानवता को मजबूत करने के लिए करें, न कि पीड़ा को तमाशे में बदलने के लिए। किसी दुखद घटना पर हमारी पहली प्रतिक्रिया संवेदना, सहानुभूति और न्याय की मांग होनी चाहिए, न कि भयावह वीडियो को आगे भेजने की। किसी मासूम बच्चे की हत्या या किसी निर्दोष व्यक्ति की मौत समाज के लिए शोक और आत्ममंथन का विषय है, मनोरंजन या जिज्ञासा का नहीं।

    वास्तव में, किसी भी सभ्य और संवेदनशील समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर और पीड़ित लोगों के प्रति कितना सम्मान और करुणा रखता है। यदि हम किसी की अंतिम पीड़ा को सोशल मीडिया की सामग्री बनाकर प्रसारित करते हैं, तो हम केवल एक वीडियो साझा नहीं कर रहे होते, बल्कि अपनी संवेदनशीलता का भी एक हिस्सा खो रहे होते हैं। इसलिए समय की मांग है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ऐसी सामग्री को तुरंत हटाएँ, कानून अपना कार्य करे और समाज स्वयं भी यह संकल्प ले कि किसी की त्रासदी को वायरल नहीं, बल्कि मानवता और संवेदना को वायरल करना है। यही डिजिटल युग की सबसे बड़ी नैतिक आवश्यकता है।

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