लेखक: प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
राजनीति में ऐसे क्षण विरले आते हैं, जब कोई वाक्य भाषण की सीमा लांघकर राष्ट्रीय विमर्श का दर्पण बन जाता है। दावों की ऊंचाई और हकीकत की जमीन के बीच खड़े भारत को नागपुर से एक सीधा संदेश मिला। रेशीमबाग में संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि ‘हमारी तैयारी अभी अधूरी है, यही हमें विश्वगुरु बनने से रोक रहा है’। यह कथन इसलिए महत्वपूर्ण नहीं कि इसे संघ प्रमुख ने कहा, बल्कि इसलिए कि यह उस दौर में आया है जब उपलब्धियों का उत्सव अक्सर आत्ममंथन की आवश्यकता को ढंक देता है। राष्ट्रों का उत्थान जयघोषों से नहीं, अपनी कमियों को पहचानने और उन्हें दूर करने की क्षमता से होता है। भागवत ने दरअसल उस असुविधाजनक प्रश्न को सामने रख दिया, जिससे बचने की आदत राजनीति को भी है और समाज को भी—क्या हम वास्तव में उतने तैयार हैं, जितना हमारा दावा है?
विश्वगुरु की राह में सबसे बड़ा सवाल: क्या हम तैयार हैं?
भारत आज केवल एक देश नहीं, बल्कि वैश्विक अपेक्षाओं का केंद्र बनता जा रहा है। पश्चिम आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है, पश्चिम एशिया अस्थिरता की चपेट में है और वैश्विक व्यवस्था नए संतुलन की तलाश में भटक रही है। ऐसे दौर में भारत की सभ्यतागत चेतना, लोकतांत्रिक परंपरा और सांस्कृतिक विस्तार उसे अलग पहचान देते हैं। दुनिया भारतीय दृष्टि को सुनने को तैयार है, लेकिन वैश्विक मंच पर सम्मान केवल विचारों से नहीं, सामर्थ्य से मिलता है। इतिहास गवाह है कि नैतिक नेतृत्व उसी का स्वीकार किया जाता है, जिसके पास आर्थिक ताकत, तकनीकी श्रेष्ठता और मजबूत संस्थाएं हों। भागवत का संकेत स्पष्ट था—विश्वगुरु का स्थान घोषणा से नहीं, योग्यता और तैयारी से हासिल होता है।
उत्सव के उजाले में मोहन भागवत ने परछाइयों की ओर इशारा किया
भारत की उपलब्धियां जितनी बड़ी हैं, उतने ही बड़े उसके सामने खड़े कुछ अनुत्तरित प्रश्न भी हैं। अंतरिक्ष मिशनों से लेकर डिजिटल परिवर्तन, वैश्विक कूटनीति से लेकर आधारभूत विकास तक देश ने उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। इसके बावजूद गुणवत्तापूर्ण रोजगार, उत्कृष्ट शिक्षा, शोध की संस्कृति, न्यायिक दक्षता और सामाजिक समरसता जैसे क्षेत्र अभी और सुदृढ़ीकरण की मांग करते हैं। किसी राष्ट्र की परिपक्वता केवल उसकी सफलताओं से नहीं, बल्कि अपनी कमियों को देखने की क्षमता से भी मापी जाती है। आत्मप्रशंसा प्रगति को धीमा करती है, जबकि आत्ममूल्यांकन उसे नई दिशा देता है।
हमारे सार्वजनिक जीवन की विडंबना यह है कि गंभीर विमर्श भी जल्द ही राजनीतिक संघर्ष का औजार बन जाता है। भागवत के वक्तव्य के साथ भी यही हुआ। विपक्ष ने इसे सत्ता पर परोक्ष प्रश्नचिह्न बताया, तो समर्थकों ने इसे विकास की गति बढ़ाने का संदेश माना। दोनों पक्षों के अपने तर्क हैं, लेकिन इस शोर में मूल मुद्दा ओझल हो गया। विश्वगुरु बनने का लक्ष्य न किसी एक सरकार का एजेंडा है, न किसी दल की उपलब्धि। यह पीढ़ियों के पुरुषार्थ, मजबूत संस्थाओं और समाज की सामूहिक चेतना से साकार होने वाली लंबी राष्ट्रीय यात्रा है। इसे राजनीतिक लाभ-हानि की संकीर्ण कसौटी पर नहीं परखा जा सकता।
भारत की असली कमी पूंजी या प्रतिभा की नहीं, राष्ट्रीय दृष्टि और अनुशासन की है। देश के पास विशाल युवा आधार, बड़ा बाजार, कुशल मानव संसाधन और ऐतिहासिक अवसर मौजूद हैं। चुनौती इन्हें संगठित राष्ट्रीय शक्ति में बदलने की है। विश्वविद्यालयों को ज्ञान-सृजन का केंद्र बनना होगा, उद्योगों को नवाचार का, राजनीति को दीर्घदृष्टि का और समाज को सहअस्तित्व का। यदि सामाजिक ध्रुवीकरण गहराता रहा, शिक्षा औसत स्तर पर अटकी रही और शोध उधार के विचारों पर टिका रहा, तो केवल ऊंची विकास दर भी भारत को वह वैश्विक प्रतिष्ठा नहीं दिला सकेगी जिसकी कल्पना की जाती है। विश्वगुरु होने का अर्थ उपदेश देना नहीं, बल्कि ऐसा राष्ट्रीय आचरण गढ़ना है जिसे दुनिया उदाहरण मानकर अपनाना चाहे।
भागवत के वक्तव्य का सबसे महत्वपूर्ण संदेश आत्मसंतोष के खतरे को लेकर है। इतिहास बताता है कि सभ्यताओं को बाहरी चुनौतियों से अधिक नुकसान भीतर पनपी आत्ममुग्धता पहुंचाती है। जिस क्षण कोई समाज स्वयं को पूर्ण और निर्विवाद मान लेता है, उसी क्षण उसकी प्रगति की गति मंद पड़ने लगती है। भारत के लिए यह आत्मप्रशंसा नहीं, आत्मसंस्कार का समय है। यह मान लेना कि अभी कई मंजिलें बाकी हैं, कमजोरी नहीं बल्कि परिपक्वता का प्रमाण है। अपनी कमियों को पहचानने वाले राष्ट्र उन्हें दूर करने का मार्ग भी खोज लेते हैं, जबकि उन्हें नजरअंदाज करने वाले अंततः उन्हीं सीमाओं में घिर जाते हैं।
संघ प्रमुख के बयान का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि इसमें उपलब्धियों पर प्रश्न नहीं, उन्हें टिकाऊ बनाने की चिंता दिखाई देती है। यह निराशा नहीं, दूरदृष्टि का स्वर है। यदि भारत वैश्विक व्यवस्था में प्रभावी नेतृत्व की आकांक्षा रखता है, तो उसे केवल आर्थिक शक्ति तक सीमित नहीं रहना होगा; ज्ञान, नवाचार और सामाजिक भरोसे में भी अग्रणी बनना पड़ेगा। विश्व नेतृत्व का आधार सामर्थ्य से बनता है, लेकिन उसकी स्वीकार्यता नैतिक विश्वसनीयता से तय होती है। भारत के पास दोनों हासिल करने की क्षमता है, शर्त केवल इतनी है कि वह दावों और धरातल के बीच मौजूद अंतर को ईमानदारी से पहचाने।
इतिहास हर राष्ट्र को अवसर देता है, लेकिन नेतृत्व का अधिकार वही राष्ट्र अर्जित करते हैं जो अपनी आकांक्षाओं को उपलब्धियों में बदलने का सामर्थ्य रखते हैं। भागवत का वक्तव्य इसी सत्य की याद दिलाता है। भारत के पास गौरवशाली विरासत, व्यापक संभावनाएं और अपार शक्ति है। लेकिन इन्हें वैश्विक नेतृत्व में बदलने के लिए अभी लंबी तैयारी और निरंतर सुधार की आवश्यकता है। यह समय आत्मसंतोष का नहीं, आत्मनिर्माण का है। विश्वगुरु का स्थान नारों दावों या प्रतीकों से नहीं मिलता; उसे ज्ञान, सामर्थ्य, अनुशासन, नवाचार और उपलब्धियों की निरंतर साधना से अर्जित करना पड़ता है। भारत के सामने मंजिल स्पष्ट है, अब उसकी गति और तैयारी ही तय करेगी कि वह इतिहास में एक संभावना बनकर दर्ज होगा या एक उपलब्धि बनकर।
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