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    Home » सड़कों पर जानकारी का अधिकार: पारदर्शिता की मांग
    राजनीति राष्ट्रीय संपादकीय संवाद की अदालत

    सड़कों पर जानकारी का अधिकार: पारदर्शिता की मांग

    Nikunj GuptaBy Nikunj GuptaJune 14, 2026No Comments4 Mins Read
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    जानकारी का अधिकार
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    लेखक: इंद्र यादव

    भारत में हर नागरिक को पारदर्शिता और जवाबदेही का अधिकार है, विशेषकर जब बात सार्वजनिक धन के उपयोग और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों के निर्माण की आती है। सड़कों के निर्माण और रखरखाव में भी जानकारी का अधिकार उतना ही महत्वपूर्ण है जितना किसी उपभोक्ता वस्तु के लिए, जहाँ हर छोटी से छोटी जानकारी हमें उपलब्ध होती है। यह लेख इस गंभीर विषय पर प्रकाश डालता है कि कैसे सड़कों से जुड़ी जानकारी का अभाव न केवल भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है, बल्कि आम जनता को उसके मूलभूत हक से भी वंचित करता है।

    एक साधारण पांच रुपये वाला बिस्कुट का पैकेट उठाइए। उस पर सब कुछ साफ-साफ लिखा मिलेगा — कंपनी का नाम, सामग्री, वजन, कीमत, निर्माण तिथि, एक्सपायरी डेट, न्यूट्रिशनल जानकारी और यहां तक कि मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस नंबर भी। अगर बिस्कुट में कुछ गड़बड़ हुई तो उपभोक्ता सीधे शिकायत कर सकता है। कानून इसी लिए बना है कि आम आदमी को जानकारी का अधिकार हो।

    फिर सवाल यह उठता है कि जब आम जनता के टैक्स का पैसा — सैकड़ों-हजारों करोड़ रुपये — सड़क बनाने पर खर्च होता है, तो उस सड़क के किनारे एक साधारण बोर्ड तक क्यों नहीं लगता? उस बोर्ड पर क्यों नहीं लिखा होता कि!

    • इस सड़क का निर्माण कब शुरू हुआ और कब पूरा हुआ!
    • कितने रुपये खर्च हुए!
    • ठेकेदार का नाम और कंपनी क्या है!
    • सड़क की लंबाई, चौड़ाई और गुणवत्ता का मानक क्या था?
    • देखभाल (मेंटेनेंस) की जिम्मेदारी किसकी है और कितने साल तक है!

    यह जानकारी छुपाने की क्या मजबूरी है!

    हर साल सड़क निर्माण और मरम्मत पर हजारों करोड़ रुपये खर्च होते हैं। ये पैसे कहां से आते हैं? आपके-हमारे टैक्स से। पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी, रोड टैक्स, वाहन टैक्स — हर जगह से सरकार पैसा वसूलती है। फिर उसी सड़क पर टोल प्लाजा क्यों! एक के बाद एक टोल नाके। ट्रक वाले, बस वाले, आम कार वाले — हर कोई दोबारा-तिबारा टैक्स दे रहा है।

    क्या सरकार को लगता है कि जनता इतनी बेवकूफ है कि दोहरी वसूली सह लेगी! पहले रोड टैक्स दो, फिर टोल दो, और सड़क फिर भी खस्ताहाल रहे तो चुपचाप सहते रहो!

    वास्तविकता और सच्चाई!

    जब सड़क बनती है तो ठेकेदार को पैसा मिल जाता है। गुणवत्ता जांच की जिम्मेदारी वाली एजेंसी को भी पैसा मिल जाता है। लेकिन छह महीने बाद गड्ढे हो जाते हैं। बरसात में सड़क बह जाती है। फिर नई टेंडर, नया ठेका, नया कमीशन। चक्र चलता रहता है। आम आदमी सिर्फ धूल, गड्ढे और टोल का शिकार होता है।

    बिस्कुट कंपनी अगर एक्सपायरी डेट छुपाए तो जेल जा सकती है। लेकिन सड़क का ठेकेदार अगर छह महीने में ही सड़क को खराब कर दे तो क्या होता है! ज्यादातर मामलों में कुछ नहीं। बस नया प्रोजेक्ट मिल जाता है।

    सड़कों पर जानकारी का अधिकार: जनता का हक

    सड़क जनता की संपत्ति है। इसे बनाने का पैसा जनता का है। इसलिए जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि उसका पैसा कहां और कैसे खर्च हुआ। हर बड़े प्रोजेक्ट (50 करोड़ से ऊपर) पर स्थायी बोर्ड लगाना चाहिए। बोर्ड पर QR कोड भी हो, जिसे स्कैन करके पूरा विवरण, टेंडर डिटेल, ठेकेदार की जानकारी और मेंटेनेंस स्टेटस ऑनलाइन देखा जा सके। भारत में सूचना के अधिकार का एक उत्कृष्ट उदाहरण सत्य जानकारी अधिनियम (RTI) है।

    टोल टैक्स की वसूली भी पारदर्शी होनी चाहिए। जहां-जहां टोल लिया जा रहा है, वहां साफ लिखा होना चाहिए कि इस सड़क पर कितना टोल पहले ही वसूल किया जा चुका है और कितने साल तक टोल लिया जाएगा। मेंटेनेंस की जिम्मेदारी स्पष्ट हो। टोल खत्म होने की तारीख बोर्ड पर चमकनी चाहिए। [INTERNAL_LINK_HOLDER]

    समय आ गया है बदलाव का!

    यह सिर्फ बोर्ड लगाने का सवाल नहीं है। यह जवाबदेही का सवाल है। यह पारदर्शिता का सवाल है। जब पांच रुपये के बिस्कुट पर पूरी जानकारी अनिवार्य है, तो सैकड़ों करोड़ की सड़क पर क्यों नहीं!

    सरकार अगर वाकई “सबका साथ, सबका विकास” चाहती है तो सबसे पहले यही छोटा-सा कदम उठाए। हर सड़क पर बोर्ड लगवाए। ठेकेदारों की जवाबदेही तय करे। दोहरी टैक्स वसूली पर लगाम लगाए। जब तक सड़कें बोलने नहीं लगेंगी, आम आदमी सिर्फ चुपचाप गड्ढों में फंसता रहेगा।

    यह समय है कि सरकारें, संबंधित प्राधिकरण और ठेकेदार इस दिशा में ठोस और निर्णायक कदम उठाएं। जब तक सड़कों पर पूर्ण जानकारी का अधिकार सुनिश्चित नहीं किया जाता और हर प्रोजेक्ट में पारदर्शिता नहीं लाई जाती, तब तक भ्रष्टाचार पर प्रभावी ढंग से लगाम लगाना मुश्किल होगा और आम जनता को सुरक्षित, टिकाऊ और बेहतर सड़कें मिलने की उम्मीद कम रहेगी। पारदर्शिता ही सच्चे विकास और जनहित की नींव है।

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