पैसा हाथों का मैल है… तो फिर ये मैल चरित्र क्यों चट कर जाता है!
इंद्र यादव/मुंबई-/कहते हैं ना—पैसा हाथों का मैल है। यानी कमाओ, खर्च करो, धूल-मिट्टी की तरह झाड़ दो। लेकिन साला सच पूछो तो ये “मैल” इतना खतरनाक निकला कि आदमी का पूरा चरित्र ही मैला कर देता है। जैसे कोई कीड़े वाला कचरा देखकर गंदगी फैल जाए, वैसे ही नोट के बंडल देखकर इंसान का दिमाग, नैतिकता, रिश्ते—सब फटने लगते हैं।
देखो यार, गरीब आदमी जब जेब में दस-बीस रुपये होते हैं तो वो सादा-सीधा रहता है। पड़ोसी की मदद करता है, दोस्त का साथ देता है, झूठ नहीं बोलता। लेकिन जैसे ही बैंक बैलेंस चार अंकों में पहुँचा, या कोई प्रॉपर्टी-कार दिखी, तो दिमाग में शैतान घुस जाता है। “अब मैं बड़ा आदमी हूँ” वाले नखरे शुरू। पहले जो दोस्त थे, वो “फालतू” लगने लगते हैं। माँ-बाप की बातें “पुराने जमाने की” लगने लगती हैं। पत्नी-बच्चे सिर्फ स्टेटस सिंबल बन जाते हैं। और ईमानदारी! वो तो सबसे पहले कूड़े में फेंक दी जाती है।
ये मैल इतना चालाक है कि चुपके से घुसता है। पहले छोटी-छोटी चीजें—थोड़ा घूस ले लो, थोड़ा टैक्स बचा लो, थोड़ा झूठा बिल बना लो। फिर आदत पड़ जाती है। फिर बड़े-बड़े घोटाले, जमीन हड़पना, दोस्त को धोखा देना, रिश्तेदारों को ठगना—सब “बिजनस” लगने लगता है। चरित्र जो पहले सफेद था, वो काला-काला हो जाता है। लोग कहते हैं “पैसे ने बिगाड़ दिया”, लेकिन सच्चाई ये है कि पैसे ने सिर्फ असली चेहरा दिखा दिया। जो अंदर पहले से मैला था, वो बाहर निकल आया।
देखो आसपास। कोई सरकारी बाबू था, ईमानदार था। नोटों की गड्डियाँ देखीं तो रिश्वत लेने लगा। कोई व्यापारी था, मेहनत से कमाता था। मुनाफा बढ़ते ही मजदूरों को लूटने लगा, क्वालिटी गिरा दी। कोई नेता था, जनता का सेवक बनने का दावा करता था। कुर्सी मिली तो पावर और पैसा दोनों हड़पने लगा। रिश्ते भी इसी मैल में डूब जाते हैं। भाई-भाई में जमीन के लिए झगड़ा, बाप-बेटे में प्रॉपर्टी के लिए केस, दोस्त-दोस्त में बिजनस पार्टनरशिप तोड़कर धोखा। साला पैसा आते ही “हमारा” “मेरा” बन जाता है।
और सबसे मजेदार बात—ये मैल दिखते ही लोग अचानक “समझदार” हो जाते हैं। पहले जो नैतिकता की बातें करते थे, अब “दुनिया ऐसी ही है” कहने लगते हैं। पहले जो गरीबों की मदद करते थे, अब “ये लोग आलसी हैं” कहकर मुँह फेर लेते हैं। सोशल मीडिया पर फोटो डालो महंगी कार की, लाइक्स हजारों आ जाते हैं। लेकिन असली दोस्त खो जाते हैं। रिश्ते खो जाते हैं। नींद खो जाती है। क्योंकि ये मैल चैन से सोने नहीं देता। रात को भी हिसाब चलता रहता है—कितना और कमाऊँ, किसको कैसे ठगूँ।
अरे यार, पैसा जरूरी है, कोई इनकार नहीं कर रहा। रोटी-कपड़ा-मकान सब इसी से चलता है। लेकिन जब पैसा हाथ का मैल न रहकर दिमाग का मालिक बन जाए, तब तबाही शुरू होती है। जो इंसान पैसे को इस्तेमाल करता है, वो मालिक रहता है। जो पैसा इंसान को इस्तेमाल करने लगता है, वो गुलाम हो जाता है। और गुलाम का चरित्र हमेशा मैला ही रहता है।
तो सोचो जरा—क्या वाकई पैसा हाथों का मैल है? या ये मैल है जो आदमी के अंदर छुपे हुए स्वार्थ, लालच और कमजोरी को बाहर निकाल देता है? सच तो ये है कि नोट खुद कुछ नहीं करते। नोट सिर्फ आईना हैं। जो चेहरा मैला है, वही दिखता है। साफ चेहरा वाला नोट देखकर भी साफ रहता है। मैला वाला नोट देखकर और मैला हो जाता है।
आखिर में एक बात याद रखो भई—पैसा कमाओ, लेकिन चरित्र मत बेचो। क्योंकि चरित्र एक बार मैला हो गया तो साबुन-पानी से भी साफ नहीं होता। और जब मौत आएगी, तो बैंक बैलेंस नहीं, सिर्फ चरित्र साथ जाएगा। बाकी सब मैल यहीं रह जाएगा।

