Close Menu
Rashtra SamvadRashtra Samvad
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Rashtra SamvadRashtra Samvad
    • होम
    • राष्ट्रीय
    • अन्तर्राष्ट्रीय
    • राज्यों से
      • झारखंड
      • बिहार
      • उत्तर प्रदेश
      • ओड़िशा
    • संपादकीय
      • मेहमान का पन्ना
      • साहित्य
      • खबरीलाल
    • खेल
    • वीडियो
    • ईपेपर
    Topics:
    • रांची
    • जमशेदपुर
    • चाईबासा
    • सरायकेला-खरसावां
    • धनबाद
    • हजारीबाग
    • जामताड़ा
    Rashtra SamvadRashtra Samvad
    • रांची
    • जमशेदपुर
    • चाईबासा
    • सरायकेला-खरसावां
    • धनबाद
    • हजारीबाग
    • जामताड़ा
    Home » रूढ़ियों को धूल चटाकर स्वर्ण छीनने वालीं..
    Breaking News Business Headlines कारोबार मेहमान का पन्ना राजनीति राष्ट्रीय संपादकीय

    रूढ़ियों को धूल चटाकर स्वर्ण छीनने वालीं..

    Devanand SinghBy Devanand SinghOctober 3, 2026No Comments5 Mins Read
    Share Facebook Twitter Telegram WhatsApp Copy Link
    Share
    Facebook Twitter Telegram WhatsApp Copy Link

    रूढ़ियों को धूल चटाकर स्वर्ण छीनने वालीं..

    [स्वर्णिम चमक के पीछे संघर्ष की अनकही दास्तान]

    [पदक नहीं, नई पहचान गढ़ी नागोया में भारतीय बेटियों ने]

    नागोया में भारतीय बेटियों ने स्वर्णिम सफलताओं से ऐसा इतिहास रचा, जिसकी गूंज पदकों की खनक से कहीं आगे तक सुनाई देती है। हॉकी के मैदान पर निर्णायक गोल, शूटिंग रेंज में अचूक निशाना और गोल्फ कोर्स पर असाधारण कौशल ने एशियाई खेलों में भारत की महिला शक्ति का नया अध्याय खोल दिया। लालरेमसियामी, नीरू धांदा और प्रणवी उर्स की उपलब्धियां महज खेल विजय नहीं, बल्कि उन सपनों की शानदार परिणति हैं, जो सामाजिक रूढ़ियों और अवसरों के अभाव के बीच भी पलते रहे। इन बेटियों ने अपने दमखम, दृढ़ संकल्प और बेजोड़ प्रतिभा से साबित कर दिया कि भारतीय महिलाएं अब केवल संभावनाओं की प्रतीक नहीं, बल्कि हर चुनौती को भेदकर इतिहास रचने वाली शक्ति हैं।

    चार दशक से अधिक की कसक को भारतीय महिला हॉकी टीम ने चीन के खिलाफ ऐतिहासिक गोल से स्वर्णिम विजय में बदल दिया। एशियन गेम्स के फाइनल में 1-0 की जीत के साथ भारत ने 1982 के बाद पहली बार हॉकी का स्वर्ण हासिल किया। दसवें मिनट में लालरेमसियामी के टॉमहॉक शॉट ने चीन की रक्षापंक्ति को भेदकर भारत को निर्णायक बढ़त दिलाई। इसके बाद चीन ने बराबरी के लिए पूरी ताकत झोंक दी, लेकिन गोलकीपर सविता पूनिया की शानदार सेव्स और रक्षापंक्ति की मुस्तैदी ने उसके हर वार को नाकाम कर दिया। भारतीय खिलाड़ियों का अनुशासन, तालमेल और आखिरी दम तक संघर्ष इस जीत की असली ताकत बना। इस कामयाबी ने 44 वर्षों का इंतजार खत्म करने के साथ भारत के लिए 2028 लॉस एंजिल्स ओलंपिक का सीधा टिकट भी पक्का कर दिया।

    नीरू धांदा ने ट्रैप शूटिंग में स्वर्ण जीतकर भारतीय खेल इतिहास में नया कीर्तिमान रच दिया। एशियन गेम्स की व्यक्तिगत स्पर्धा में स्वर्ण हासिल करने वाली वे पहली भारतीय महिला बनीं। अटूट एकाग्रता, मानसिक दृढ़ता और अचूक निशाने के दम पर उन्होंने वर्षों की साधना को ऐतिहासिक सफलता में बदला। शूटिंग में जरा-सी चूक भी जीत छीन सकती है, लेकिन नीरू ने साबित किया कि लक्ष्य पर नजर के साथ मन पर नियंत्रण भी जरूरी है। उनकी उपलब्धि गांवों और छोटे शहरों में सीमित संसाधनों के बीच बड़े सपने देखने वाली हजारों लड़कियों के लिए प्रेरणा है। उन्होंने दिखाया कि दृढ़ संकल्प और अवसर से कठिन से कठिन लक्ष्य भी हासिल किया जा सकता है।

    गोल्फ के मैदान पर प्रणवी उर्स ने अपने धैर्य, कौशल और एकाग्रता से भारतीय खेल इतिहास में स्वर्णिम अध्याय जोड़ दिया। एशियन गेम्स की व्यक्तिगत स्ट्रोक प्ले स्पर्धा में स्वर्ण जीतकर वे यह उपलब्धि हासिल करने वाली पहली भारतीय महिला बनीं। हर शॉट में तकनीक, परिस्थितियों के आकलन और रणनीति की कसौटी पर खरी उतरते हुए प्रणवी ने प्रतिद्वंद्वियों को पीछे छोड़ दिया। उनके प्रदर्शन ने साबित किया कि गोल्फ में ताकत से अधिक सूझबूझ, धैर्य और आत्मसंयम मायने रखते हैं। उनकी जीत ने इस धारणा को भी तोड़ा कि गोल्फ कुछ खास वर्गों तक सीमित खेल है। प्रणवी की यह उपलब्धि उन युवतियों के लिए नई राह है, जो गोल्फ में अपना भविष्य तलाश रही हैं।

    स्वर्णिम सफलताओं की यह लहर तीरंदाजी से मुक्केबाजी तक पहुंची। अंकिता भकत, कीर्ति शर्मा और कुमकुम मोहोद की रिकर्व टीम ने दक्षिण कोरिया को 5-3 से हराकर पहली बार एशियन गेम्स का स्वर्ण जीता। कुमकुम ने व्यक्तिगत रिकर्व स्पर्धा में भी स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया। मुक्केबाजी में लवलीना बोरगोहेन ने अपने जन्मदिन पर 75 किलोग्राम वर्ग में चीन की बाओ जियी को 5-0 से हराकर स्वर्ण पदक जीता, जबकि परवीन हुड्डा ने 65 किलोग्राम वर्ग में चीनी ताइपेई की चेन निएन-चिन को 3-2 से हराकर खिताब पक्का किया। इन जीतों में अचूक निशाने, दमदार मुक्कों और दबाव में फैसले लेने के कौशल की झलक दिखी। इन उपलब्धियों ने साबित किया कि भारतीय बेटियां तीरंदाजी से मुक्केबाजी तक हर खेल में अपनी प्रतिभा और परिश्रम से पहचान बना रही हैं।

    मैदान पर चमकते पदकों के पीछे वर्षों की मेहनत और मजबूत खेल व्यवस्था की भूमिका है। बेहतर प्रशिक्षण, सरकारी सहायता, निजी प्रायोजन, आधुनिक तकनीक और मानसिक प्रशिक्षण ने खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों के लिए तैयार किया है। अब सफलता शारीरिक क्षमता के साथ पोषण, रणनीति, अनुशासन और मानसिक मजबूती पर भी निर्भर है। हालांकि, प्रतिभा और अवसर के बीच की खाई अब भी बनी हुई है। अनेक लड़कियां सामाजिक रूढ़ियों, आर्थिक तंगी और संसाधनों की कमी से जूझ रही हैं। परिवार का प्रोत्साहन, प्रशिक्षकों का मार्गदर्शन और संस्थागत सहयोग उनकी राह आसान बना सकते हैं। नागोया की उपलब्धियां बताती हैं कि बेटियों को अवसर मिलने पर उनकी जीत पदकों से आगे बढ़कर समाज की सोच भी बदल सकती है।

    एशियन गेम्स के स्वर्ण पदक नई मंजिलों की राह खोल रहे हैं। महिला हॉकी टीम के सामने 2028 लॉस एंजिल्स ओलंपिक में इस सफलता को विश्वस्तरीय प्रदर्शन में बदलने की चुनौती है। नीरू धांदा और प्रणवी उर्स जैसी खिलाड़ियों की उपलब्धियां नई पीढ़ी की लड़कियों को शूटिंग, गोल्फ, हॉकी, तीरंदाजी और मुक्केबाजी के लिए प्रेरित कर सकती हैं। इसके लिए सफलताओं को भविष्य की तैयारी में बदलते हुए खिलाड़ियों को निरंतर प्रशिक्षण, संसाधन और अंतरराष्ट्रीय अनुभव देना होगा। पदकों के साथ ऐसी खेल व्यवस्था बनाना भी जरूरी है, जहां अगली पीढ़ी को प्रतिभा साबित करने में अनावश्यक बाधाएं न झेलनी पड़ें।

    किसी भी जीत की असली ताकत उस बदलाव में होती है, जो वह अपने पीछे छोड़ती है। नागोया में भारतीय बेटियों के प्रदर्शन को भी इसी कसौटी पर परखा जाएगा। उनकी कामयाबी तभी दूरगामी असर छोड़ेगी, जब खेल को लड़कियों के लिए असाधारण विकल्प नहीं, सहज अवसर माना जाएगा। इसके लिए जरूरी है कि परिवारों का भरोसा मजबूत हो, सामाजिक सोच बदले और खेल संस्थाएं प्रतिभा को आगे बढ़ने का निष्पक्ष अवसर दें। मैदान पर बेटियों ने अपनी क्षमता का प्रमाण दे दिया है; अब उन्हें आगे बढ़ने के लिए अनुकूल माहौल देना देश की जिम्मेदारी है। यही बदलाव इन उपलब्धियों को स्थायी विरासत में बदलेगा।

    प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

    शिक्षाविद्

    बड़वानी (मप्र)

    ईमेल: rtirkjain@gmail.com

    Share. Facebook Twitter Telegram WhatsApp Copy Link
    Previous Articleवित्तीय स्थिरता पर आत्ममुग्धता नहीं, सतर्कता जरूरी

    Related Posts

    वित्तीय स्थिरता पर आत्ममुग्धता नहीं, सतर्कता जरूरी

    October 3, 2026

    एसआईआर: लोकतंत्र की शुचिता और विश्वास की कसौटी

    October 3, 2026

    जिउतिया की खुशियों के बीच मातम, मानगो में दो बहनें नदी में डूबीं; एक लापता, दूसरी अस्पताल में भर्ती

    October 3, 2026

    Comments are closed.

    अभी-अभी

    रूढ़ियों को धूल चटाकर स्वर्ण छीनने वालीं..

    वित्तीय स्थिरता पर आत्ममुग्धता नहीं, सतर्कता जरूरी

    एसआईआर: लोकतंत्र की शुचिता और विश्वास की कसौटी

    जिउतिया की खुशियों के बीच मातम, मानगो में दो बहनें नदी में डूबीं; एक लापता, दूसरी अस्पताल में भर्ती

    बेगूसराय /03/10/2026 (शनिवार)/ बिहार स्टेट टीचर्स एसोसिएशन गोपगुट बेगूसराय जिला कार्यकारिणी ने 31/03

    ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पर दिल्ली से मुंबई तक प्रदर्शन, कई नेता हिरासत में

    मां रूपी सोरेन से मिलने अस्पताल पहुंचे मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, सुरक्षा काफिले के बिना पहुंचने की चर

    पद से हटाने की मांग के बाद सीतारामडेरा थाना प्रभारी आनंद मिश्रा निलंबित

    मानगो में पेयजल व्यवस्था सुधारने की पहल, 9 योजनाओं की टेंडर प्रक्रिया पूरी

    अनंत सिंह पर कार्रवाई कर जदयू खुद को कितना नुकसान पहुंचाएगी?

    Facebook X (Twitter) Telegram WhatsApp
    © 2026 News Samvad. Designed by Cryptonix Labs .

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.