वित्तीय स्थिरता पर आत्ममुग्धता नहीं, सतर्कता जरूरी
*कर्ज का बढ़ता पहाड़, एआई निवेश का बुलबुला और साइबर हमलों का खतरा भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती संकट आने के बाद नहीं, पहले से तैयारी करनी होगी*
देवानंद सिंह
किसी भी अर्थव्यवस्था की असली ताकत अच्छे दिनों में नहीं, बल्कि संकट के समय सामने आती है। बैंक मुनाफा कमा रहे हों, बाजार में तेजी हो और वित्तीय संस्थानों की बैलेंस शीट मजबूत दिखाई दे रही हो, तो इसे स्थायी सुरक्षा का प्रमाण मान लेना खतरनाक हो सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा की यह चेतावनी कि आज की मजबूती कल के संकट से सुरक्षा की गारंटी नहीं है, इसी वास्तविकता की ओर संकेत करती है। वित्तीय व्यवस्था के सामने सबसे बड़ा खतरा संकट का पैदा होना भर नहीं, बल्कि उसके संकेतों को समय रहते पहचानने में विफल रहना है।
भारत ने बैंकिंग क्षेत्र में लंबे समय तक खराब कर्ज और गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों यानी एनपीए का बोझ झेला है। इस विरासत से उबरने में वर्षों लगे। यह अनुभव बताता है कि वित्तीय क्षेत्र की छोटी दिखने वाली कमजोरियां भी समय के साथ गंभीर संकट में बदल सकती हैं। इसलिए मौजूदा सुधारों और बेहतर वित्तीय संकेतकों पर संतोष करना पर्याप्त नहीं है। सवाल यह है कि क्या हमारी वित्तीय व्यवस्था उन जोखिमों का सामना करने के लिए भी तैयार है, जिनका स्वरूप अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है?
आज वित्तीय संकट का चेहरा बदल रहा है। पहले किसी बैंक की खराब ऋण नीति, कमजोर प्रबंधन या अत्यधिक कर्ज को संकट का प्रमुख कारण माना जाता था। अब वैश्विक घटनाएं, तकनीकी विफलताएं, साइबर हमले, वित्तीय बाजारों की परस्पर निर्भरता और एआई आधारित निवेश में असाधारण तेजी भी संकट का कारण बन सकती है। दुनिया का कोई एक हिस्सा आर्थिक झटके से गुजरता है, तो उसका असर दूसरे देशों के बैंकिंग तंत्र, पूंजी बाजार और भुगतान प्रणालियों तक पहुंच सकता है। ऐसे में वित्तीय स्थिरता को केवल बैंकों की मजबूती तक सीमित करके देखना गंभीर भूल होगी।
सबसे चिंताजनक पहलू कर्ज का लगातार बढ़ता बोझ है। कर्ज विकास का साधन हो सकता है, लेकिन जब उधारी वास्तविक आय और भुगतान क्षमता से आगे निकलने लगे, तब वही कर्ज आर्थिक कमजोरी का कारण बन जाता है। बढ़ता कर्ज-जीडीपी अनुपात, ब्याज भुगतान का दबाव और सरकारी बॉन्ड प्रतिफल में उछाल सरकारों तथा कंपनियों की वित्तीय गुंजाइश को सीमित कर सकते हैं। यदि आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ती है या ब्याज दरों में प्रतिकूल बदलाव आता है, तो कर्ज चुकाने की क्षमता पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। इसका असर निवेश, रोजगार और आम उपभोक्ता की क्रयशक्ति पर भी पड़ सकता है। इसलिए कर्ज के आंकड़ों के साथ उसकी गुणवत्ता और जोखिम का आकलन भी उतना ही जरूरी है।
एआई के क्षेत्र में बढ़ता निवेश भी सावधानी की मांग करता है। इसमें संदेह नहीं कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता उत्पादन, सेवाओं और कारोबार के तौर-तरीकों में व्यापक बदलाव ला सकती है। लेकिन तकनीक की संभावनाओं और कंपनियों के बाजार मूल्यांकन के बीच अंतर को समझना जरूरी है। यदि निवेशकों की उम्मीदें वास्तविक कमाई से बहुत आगे निकल जाती हैं, तो निवेश की गति धीमी पड़ने या लाभ के अनुमान कमजोर होने पर परिसंपत्तियों की कीमतों में तेज गिरावट आ सकती है। और यदि इस निवेश का बड़ा हिस्सा कर्ज के सहारे खड़ा हो, तो बाजार में गिरावट का असर और व्यापक हो सकता है। इतिहास गवाह है कि भविष्य की बड़ी संभावनाओं के नाम पर बने वित्तीय उत्साह में जोखिम अक्सर कम करके आंका जाता है। तकनीकी क्रांति का स्वागत होना चाहिए, लेकिन उसके नाम पर वित्तीय विवेक को तिलांजलि नहीं दी जा सकती।
एक अन्य बड़ा खतरा साइबर सुरक्षा और तकनीकी निर्भरता से जुड़ा है। डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन बैंकिंग ने वित्तीय सेवाओं को आसान बनाया है, लेकिन इनके साथ पूरी व्यवस्था की संवेदनशीलता भी बढ़ी है। यदि किसी महत्वपूर्ण तकनीकी सेवा प्रदाता में खराबी आ जाए या व्यापक साइबर हमला हो, तो उसका प्रभाव एक संस्था तक सीमित रहने के बजाय कई बैंकों, कंपनियों और भुगतान नेटवर्कों तक फैल सकता है। यही कारण है कि वित्तीय सुरक्षा का आकलन केवल अलग-अलग संस्थानों की मजबूती से नहीं, बल्कि उनके बीच मौजूद परस्पर निर्भरता से भी किया जाना चाहिए।
यहां नियामक संस्थाओं की भूमिका निर्णायक हो जाती है। संकट के बाद कार्रवाई करना नियमन का अंतिम विकल्प होना चाहिए, पहला नहीं। इसके लिए बेहतर आंकड़े, समयबद्ध निगरानी, जोखिमों का पूर्व आकलन, नियमित दबाव-परीक्षण और संकट की स्थिति में काम आने वाली प्रभावी समाधान व्यवस्था जरूरी है। बैंकों के साथ गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों, भुगतान प्रणालियों, वित्तीय बाजारों और महत्वपूर्ण तकनीकी सेवा प्रदाताओं को भी व्यापक निगरानी के दायरे में रखना होगा। साथ ही, नियमन इतना प्रभावी हो कि जोखिमों पर अंकुश लगे, लेकिन इतना असंतुलित नहीं कि उत्पादक निवेश और आर्थिक गतिविधियों पर अनावश्यक बाधाएं खड़ी हो जाएं।
सरकार और वित्तीय संस्थानों को भी यह समझना होगा कि वित्तीय स्थिरता केवल आंकड़ों का विषय नहीं, बल्कि जनता के भरोसे का आधार है। बैंकिंग व्यवस्था में गड़बड़ी का खामियाजा अंततः जमाकर्ताओं, छोटे निवेशकों, कारोबारियों और आम परिवारों को भुगतना पड़ता है। इसलिए वित्तीय जोखिमों की अनदेखी केवल आर्थिक लापरवाही नहीं, बल्कि जनहित की अनदेखी भी है।
रिजर्व बैंक गवर्नर की चेतावनी का सार स्पष्ट है संकट को पूरी तरह रोकने का दावा अवास्तविक है, लेकिन उसकी आशंका को कम करना और उसके प्रभाव को सीमित करना संभव है। इसके लिए मजबूत संस्थान, जिम्मेदार कर्ज प्रबंधन, पारदर्शी बाजार, भरोसेमंद तकनीकी ढांचा और दूरदर्शी नियमन जरूरी हैं। वित्तीय व्यवस्था की मजबूती का दावा तभी सार्थक होगा, जब वह अप्रत्याशित झटकों के बीच भी अपना काम करती रहे।
अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा जोखिम केवल कर्ज, बाजार की गिरावट या साइबर हमला नहीं है; सबसे बड़ा जोखिम यह मान लेना है कि ऐसा संकट हमारे यहां आ ही नहीं सकता। आर्थिक आत्मविश्वास जरूरी है, लेकिन आत्मसंतोष घातक हो सकता है। आज की सतर्कता, समय पर सुधार और जोखिमों के प्रति ईमानदार स्वीकार्यता ही कल की वित्तीय सुरक्षा की असली गारंटी बन सकती है।

