लेखक: देवानंद सिंह
दिल्ली में हुए हालिया मालवीय नगर अग्निकांड ने पूरे देश को झकझोर दिया है। इस भयावह घटना ने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। दिल्ली के मालवीय नगर स्थित एक होटल में लगी भीषण आग ने 21 लोगों की जान ले ली, जिनमें 12 विदेशी नागरिक भी शामिल हैं। यह केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही, नियमों की अनदेखी और भ्रष्ट तंत्र की संयुक्त विफलता का भयावह परिणाम है। हर बड़ी त्रासदी के बाद शोक संदेश, मुआवजे की घोषणा और जांच के आदेश जारी कर दिए जाते हैं, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न हमेशा अधूरा रह जाता है—आखिर इन मौतों का जिम्मेदार कौन है?
अग्नि सुरक्षा नियमों की अनदेखी
प्रारंभिक जानकारी बताती है कि जिस इमारत में आग लगी, उसके पास अग्नि सुरक्षा संबंधी अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) नहीं था। होटल को केवल छह कमरों की अनुमति थी, लेकिन उसमें 25 कमरे संचालित किए जा रहे थे। तहखाने तक को कमरों में बदल दिया गया था। इमारत में प्रवेश और निकास का केवल एक रास्ता था, खिड़कियां स्थायी रूप से बंद थीं और मुख्य द्वार सेंसर आधारित था। ऐसे में आग लगने के बाद वहां मौजूद लोगों के लिए बाहर निकलना लगभग असंभव हो गया। सवाल यह है कि यदि इतनी गंभीर अनियमितताएं थीं तो संबंधित विभाग इतने वर्षों तक क्या कर रहे थे?
प्रशासनिक विफलता और भ्रष्टाचार
दिल्ली जैसे महानगर में कोई भी व्यावसायिक प्रतिष्ठान बिना विभिन्न विभागों की जानकारी के नहीं चल सकता। भवन निर्माण से लेकर व्यापार लाइसेंस, पर्यटन विभाग का पंजीकरण, स्थानीय निकाय की अनुमति और अग्निशमन विभाग की स्वीकृति जैसी कई प्रक्रियाएं होती हैं। यदि होटल नियमों के विरुद्ध संचालित हो रहा था तो यह मान लेना कठिन है कि प्रशासन पूरी तरह अनभिज्ञ था। अधिक संभावना यही है कि कहीं न कहीं निगरानी तंत्र विफल हुआ या जानबूझकर आंखें मूंद ली गईं।
शहरी विकास मॉडल पर सवाल
इस घटना ने एक बार फिर भारत के शहरी विकास मॉडल पर भी गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। संकरी गलियां, अवैध निर्माण, क्षमता से अधिक मंजिलें और सुरक्षा मानकों की अनदेखी अब देश के अधिकांश शहरों की पहचान बन चुके हैं। जब तक कोई बड़ा हादसा नहीं होता, तब तक प्रशासनिक मशीनरी सक्रिय नहीं होती। हादसे के बाद बुलडोजर, सीलिंग और गिरफ्तारी का अभियान शुरू होता है, लेकिन कुछ महीनों बाद सब कुछ फिर सामान्य हो जाता है। यही कारण है कि उपहार सिनेमा अग्निकांड, सूरत कोचिंग सेंटर हादसा, अस्पतालों में आग की घटनाएं और अब मालवीय नगर जैसी त्रासदियां बार-बार सामने आती हैं।
जवाबदेही किसकी: सिर्फ मालिक या पूरा तंत्र?
होटल मालिक की गिरफ्तारी निश्चित रूप से आवश्यक है, लेकिन केवल उसे दोषी ठहराकर सरकार और प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते। यदि अवैध निर्माण हुआ, अतिरिक्त मंजिलें बनाई गईं, नियमों के विपरीत कमरे संचालित हुए और वर्षों तक कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। जिन विभागों की जिम्मेदारी निरीक्षण और निगरानी की थी, उनके अधिकारियों से भी यह पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की।
त्रासदी का मानवीय पहलू
इस त्रासदी का एक मानवीय पक्ष भी है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जिन लोगों की मौत हुई, उनमें कई ऐसे थे जो अपने बीमार परिजनों के इलाज के लिए दिल्ली आए थे और पास के अस्पताल में भर्ती रिश्तेदारों की देखभाल के लिए इस होटल में ठहरे हुए थे। कुछ विदेशी नागरिक चिकित्सा संबंधी कारणों से यहां मौजूद थे। वे किसी अपराध के कारण नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता के कारण अपनी जान गंवा बैठे। कई परिवारों ने एक ही दिन में अपने अनेक सदस्यों को खो दिया। यह केवल आंकड़ों की खबर नहीं, बल्कि दर्जनों परिवारों की जिंदगी में हमेशा के लिए उतर आया अंधकार है।
लापरवाही से हुई मौतें
सबसे दुखद तथ्य यह है कि इस हादसे के अधिकांश कारण रोके जा सकते थे। यदि अग्नि सुरक्षा मानकों का पालन होता, यदि पर्याप्त निकास मार्ग होते, यदि खिड़कियां सील न होतीं, यदि नियमित निरीक्षण होता, तो संभव है कि इतनी बड़ी जनहानि न होती। इसलिए यह केवल आग से हुई मौत नहीं है; यह लापरवाही से हुई मौत है।
मालवीय नगर अग्निकांड: सबक और जवाबदेही
अब आवश्यकता केवल जांच आयोग बनाने की नहीं, बल्कि जवाबदेही की संस्कृति विकसित करने की है। दोषी होटल मालिकों के साथ-साथ उन अधिकारियों पर भी आपराधिक कार्रवाई होनी चाहिए जिनकी निगरानी में यह अवैध व्यवस्था फलती-फूलती रही। साथ ही देशभर के होटल, गेस्ट हाउस, अस्पताल, मॉल और बहुमंजिला इमारतों का व्यापक सुरक्षा ऑडिट कराया जाना चाहिए। [INTERNAL_LINK_HOLDER]
मालवीय नगर अग्निकांड का सबसे बड़ा सबक यही है कि हादसे अचानक नहीं होते, उन्हें लापरवाही धीरे-धीरे जन्म देती है। 21 लोगों की मौत का जिम्मेदार केवल वह आग नहीं है जिसने इमारत को घेरा, बल्कि वह पूरा तंत्र है जिसने नियमों को कागजों में कैद रहने दिया। यदि इस बार भी जवाबदेही तय नहीं हुई, तो अगली त्रासदी केवल समय का इंतजार होगी।

