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    Home » गिरती पत्रकारिता: आईना कब तक तोड़ोगे!
    राष्ट्रीय संपादकीय संवाद की अदालत

    गिरती पत्रकारिता: आईना कब तक तोड़ोगे!

    Nikunj GuptaBy Nikunj GuptaJune 4, 2026No Comments3 Mins Read
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    पत्रकारिता
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    लेखक: इंद्र यादव

    आजकल अखबार खोलें या टीवी देखें, तो एक कड़वा सच सामने आता है—पत्रकारिता अब ‘सवाल पूछने’ के बजाय ‘पक्ष लेने’ का काम कर रही है। यह समझना बहुत जरूरी है कि सच्ची पत्रकारिता की कोई जाति, कोई धर्म या कोई पार्टी नहीं होती। पत्रकार का धर्म सिर्फ जनता को सच बताना होता है।

    पत्रकारिता क्यों गिर रही है! आंकड़े और हकीकत!

    आज भारत की पत्रकारिता पर सवाल क्यों उठ रहे हैं! इसके कुछ मुख्य कारण हैं!

    • विश्व स्तर पर गिरती रैंकिंग: दुनिया भर के मीडिया पर नजर रखने वाली संस्थाओं की रिपोर्ट देखें, तो भारत की प्रेस स्वतंत्रता (प्रेस फ्रीडम) की रैंकिंग लगातार नीचे गिर रही है। यह दिखाता है कि देश में निष्पक्ष रहकर सच बोलना पत्रकारों के लिए पहले से ज्यादा मुश्किल होता जा रहा है।
    • व्यापार और दबाव: आज बड़े मीडिया घरानों के मालिक बड़े बिजनेस चलाते हैं। जब मीडिया का मालिक खुद किसी राजनीतिक दल या बड़ी कंपनी के फायदे के बारे में सोचेगा, तो वह पत्रकारिता स्वतंत्र कैसे रह सकती है? सच तो यह है कि अब ‘खबरें’ कम और ‘प्रोपगैंडा’ (किसी को खुश या बदनाम करने की कोशिश) ज्यादा दिखाया जा रहा है।
    • बहस का बदलता स्तर: टीवी पर होने वाली बहसें अब जानकारी बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि समाज को दो हिस्सों में बांटने के लिए हो रही हैं। वहां धर्म और जाति के नाम पर लड़ाई करवाई जाती है ताकि मुद्दे की बात दब जाए।

    हमें क्या समझने की जरूरत है!

    पत्रकारिता का असली मकसद सत्ता या किसी बड़े आदमी का बचाव करना नहीं, बल्कि आम आदमी की परेशानियों को सरकार तक पहुँचाना है।

    जब कोई पत्रकार सवाल पूछता है, तो उसे ‘राष्ट्रद्रोही’ कह दिया जाता है और जो पत्रकार आंख मूंदकर समर्थन करते हैं, उन्हें ‘देशभक्त’ कहा जाता है। यह खेल बहुत खतरनाक है। हमें यह याद रखना चाहिए कि:

    • सवाल पूछना लोकतंत्र की ताकत है: अगर मीडिया सरकार से सवाल नहीं पूछेगा, तो फिर भ्रष्टाचार और गलतियां कौन उजागर करेगा!
    • खबरें निष्पक्ष होनी चाहिए: अपराधी का कोई धर्म नहीं होता और न ही महंगाई का असर किसी एक जाति पर पड़ता है। फिर मीडिया में खबरें इस तरह क्यों दिखाई जाती हैं जैसे वे किसी एक पक्ष की हों!
    • जागरूक दर्शक बनिए: हम दर्शकों के तौर पर यह पहचानना बंद कर दें कि कौन सी खबर सच है और कौन सी महज एक एजेंडा है। हम जितना ज्यादा ऐसे कार्यक्रमों को देखेंगे, उतना ही यह गलत सिलसिला चलता रहेगा।

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    परिणाम:

    मीडिया का काम आईना दिखाना है। अगर आईना साफ नहीं होगा, तो हमें अपनी कमियां कभी नहीं दिखेंगी। अगर पत्रकारिता डर गई या बिक गई, तो नुकसान देश की जनता का ही होगा। पत्रकारिता को धर्म और जाति की बेड़ियों से मुक्त करना आज वक्त की सबसे बड़ी जरूरत है।

    क्या आपको लगता है कि आजकल टीवी पर आने वाली बहसें देखकर आपको वाकई देश के असली मुद्दों की जानकारी मिलती है या फिर उससे केवल भ्रम बढ़ता है!

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