जमीन पर कब्जे से बड़ा सवाल व्यवस्था की चुप्पी का
कानून आवंटित औद्योगिक भूखंड पर 20 साल बाद भी कब्जा नहीं, तो जिम्मेदार कौन?
राष्ट्र संवाद संवाददाता
औद्योगिक विकास के लिए सरकार द्वारा जमीन का आवंटन इसलिए किया जाता है ताकि उस पर उद्योग स्थापित हों, रोजगार पैदा हो और क्षेत्र की अर्थव्यवस्था मजबूत हो। लेकिन जब किसी आवंटित भूखंड पर वर्षों बाद भी कब्जा न हो पाए और प्रशासनिक आदेशों के बावजूद स्थिति जस की तस बनी रहे, तो सवाल केवल जमीन का नहीं रह जाता—सवाल शासन-व्यवस्था की विश्वसनीयता का बन जाता है।
जियाडा से जुड़े इस प्रकरण में उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार करीब दो दशक पहले औद्योगिक प्लॉट आवंटित किया गया था। बाद में जमीन पर दखल को लेकर विवाद सामने आया। अनुमंडल पदाधिकारी स्तर से संबंधित लोगों को नोटिस देकर पक्ष रखने का अवसर दिए जाने की बात भी सामने आती है। यदि सक्षम प्रशासनिक स्तर पर किसी पक्ष का कानूनी आधार स्पष्ट नहीं हो पाया, तो इसके बावजूद भूखंड का वास्तविक कब्जा दिलाने में देरी क्यों हुई—यह प्रश्न स्वाभाविक है।
मामला तब और गंभीर हो जाता है जब आरोप यह हो कि प्रशासनिक कार्रवाई कागजों तक सीमित रह गई और वास्तविक स्थिति बदल नहीं सकी। यदि किसी प्रभावशाली व्यक्ति, जनप्रतिनिधि या समूह का नाम इस विवाद में लिया जा रहा है, तो बिना निष्पक्ष जांच किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। लेकिन यही कारण है कि पूरे मामले की स्वतंत्र, पारदर्शी और दस्तावेज आधारित जांच जरूरी हो जाती है।
सरकार और प्रशासन के सामने स्पष्ट चुनौती है—आवंटित जमीन की वर्तमान स्थिति क्या है? किसके कब्जे में है? किसके पास वैध दस्तावेज हैं? पूर्व में दिए गए आदेशों का पालन क्यों नहीं हुआ? और यदि कहीं नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो जिम्मेदारी किसकी है?
कानून की ताकत व्यक्ति की पहचान से नहीं, उसके समान अनुपालन से साबित होती है। औद्योगिक जमीन उद्योग के लिए है, प्रभाव और दबाव के लिए नहीं। प्रशासन को इस मामले में आरोपों और प्रत्यारोपों से ऊपर उठकर तथ्य सामने रखने चाहिए। यही पारदर्शिता जनता के विश्वास और औद्योगिक क्षेत्र की विश्वसनीयता दोनों के लिए आवश्यक है।

