सरायकेला का ‘मठ’ और कोल्हान की परिक्रमा! शंकराचार्य की कुर्सी बदली, इलाका नहीं
मृत्युंजय बर्मन,
राष्ट्र संवाद संवाददाता, सरायकेला
“एक शंकराचार्य हैं, जिन्हें सरायकेला बहुत पसंद है। पूरा नाम है शंकराचार्य सामद। सरायकेला “मठ” इन्हें रास आ गया है.. और कहीं भी दिल नहीं लगता है। बहुत हुआ तो कभी पूर्वी सिंहभूम जाकर कुछ महीनों की धूनी रमा लेते हैं, फिर घूम-फिरकर सरायकेला लौट आते हैं। आजकल सरायकेला डीटीओ विभाग के मठाधीश हैं।”
व्यंग्य अपनी जगह है, लेकिन इसके पीछे का सवाल बेहद गंभीर है। सरकारी नौकरी में तबादला इसलिए होता है कि अधिकारी नए इलाके, नई परिस्थितियों और नई जिम्मेदारियों के साथ काम करें। लेकिन अगर कुर्सी बदलती रहे, पद बदलते रहें और जिले का दायरा वही रहे, तो सवाल उठना लाजिमी है, क्या यह तबादला है या ‘इलाके की परिक्रमा’? क्या राज्य के बाकी जिले इतने कम आकर्षक हैं? या फिर पोस्टिंग की फाइल में कुछ जिलों का ‘गुरुत्वाकर्षण’ ज्यादा है?
शंकराचार्य जी इससे पहले भी सरायकेला डीटीओ की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। परिवहन विभाग जैसे संवेदनशील विभाग में, जहां परमिट, फिटनेस, वाहन जांच, टैक्स, प्रवर्तन और व्यावसायिक हितों से जुड़े अनेक मामले आते हैं, वहां पोस्टिंग का पारदर्शी रोटेशन और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। जाहिर है शंकराचार्य जी का “सरायकेला मठ” के स्थानीय प्रशासनिक तंत्र, कारोबारी समूहों, जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संपर्कों से उसकी परिचितता स्वाभाविक रूप से बढ़ी रही होगी। यह अनुभव प्रशासन के लिए उपयोगी भी हो सकता है, लेकिन यही लंबी स्थानीय पकड़ निष्पक्षता और स्वतंत्र निर्णय क्षमता पर सवाल खड़े करने की जमीन भी तैयार कर सकती है।
सामद जी का अधिकतर कार्यकाल यहीं पटमदा बीडीओ, नीमडीह प्रखण्ड के बीडीओ, पूर्वी सिंहभूम में जिला कल्याण पदाधिकारी और सरायकेला डीटीओ की कुर्सी पर कूदते फांदते ही बीता है। प्रशासनिक रोटेशन का मकसद सिर्फ एक कुर्सी से दूसरी कुर्सी तक पहुंचना है, या अधिकारी के प्रभाव क्षेत्र का भी समय-समय पर विस्तार होना चाहिए?
इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं कि अधिकारी ने नियम के तहत पांच वर्ष पूरे किए या नहीं। सवाल यह है कि पूरे झारखंड में प्रशासनिक सेवा देने वाले अधिकारी बार-बार कोल्हान के इसी ‘ट्रांसफर त्रिकोण’ सरायकेला, पूर्वी सिंहभूम (पटमदा) और जमशेदपुर में क्यों घूमते दिखाई देते हैं?
क्योंकि अगर अधिकारी का चोला बदलता रहे, कुर्सी बदलती रहे, विभाग बदलता रहे, लेकिन इलाका बार-बार वही रहे, तो सवाल सिर्फ तबादले का नहीं रह जाता। सवाल उठता है क्या झारखंड में ट्रांसफर-पोस्टिंग की भी अपनी कोई ‘तीर्थयात्रा’ है? और यदि है, तो परिवहन विभाग को कम-से-कम इतना जरूर देखना चाहिए कि इस तीर्थयात्रा का असर निष्पक्ष प्रशासन, विभागीय पारदर्शिता और आम नागरिक के भरोसे पर तो नहीं पड़ रहा। जनता भी हतप्रभ है कि यह महज संयोग है या व्यवस्था में कोई सिक्रेट सिस्टम, जिसका पासवर्ड शंकराचार्य जी के पास ही है।

