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    Home » हिंदी साहित्य में संस्मरण विधा अत्यंत दुर्लभ
    मेहमान का पन्ना शिक्षा संपादकीय साहित्य

    हिंदी साहित्य में संस्मरण विधा अत्यंत दुर्लभ

    Devanand SinghBy Devanand SinghSeptember 17, 2026No Comments4 Mins Read
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    हिंदी साहित्य में संस्मरण विधा अत्यंत दुर्लभ

    हिंदी साहित्य में संस्मरण विधा अत्यंत दुर्लभ है। अब तक जीवनी और आत्मकथा पर कुछ कार्य अवश्य हुआ है, किंतु एसएमएस, मोबाइल इंटरनेट और ईमेल के इस आधुनिक युग में लोगों का एक-दूसरे के गुणों, कमियों, सामर्थ्य और अभावों को आत्मीयता, प्रेम व निकटता से महसूस करना तथा लिखना और भी दुर्लभ हो गया है। इस विरल साहित्यिक धारा में राजशेखर व्यास एक अत्यंत प्रतिष्ठित और सम्मानित नाम हैं। ‘भारतीय ज्ञानपीठ’ द्वारा प्रकाशित उनका पहला संस्मरण ‘यादें’, उनके पिता पद्मभूषण पंडित सूर्यनारायण व्यास के जीवन और कृतित्व पर आधारित था। इसे अपार लोकप्रियता मिली और यह आज भी ‘वाणी प्रकाशन’ के कई संस्करणों में उपलब्ध है। यद्यपि यात्रा-साहित्य पर भी उनकी कई पुस्तकें हैं, किंतु संस्मरण विधा में प्रकाशित उनकी दूसरी पुस्तक ‘यादें आती हैं’ भी उतनी ही लोकप्रिय रही।
    पद्मभूषण पंडित सूर्यनारायण व्यास के पुत्र होने के नाते, उन्हें बाल्यावस्था में ही डॉ. भगवतशरण उपाध्याय और श्री वाकणकर जैसे मनीषियों का स्नेह और सानिध्य प्राप्त हुआ। बड़े होने पर उन्हें डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम, अटल बिहारी वाजपेयी, अशोक जी, रज्जू भैया, माधवराव सिंधिया, राजेंद्र माथुर, प्रभाष जोशी, वेदप्रताप वैदिक, कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, कवि नीरज, ओशो, डॉ. शंकर दयाल शर्मा, प्रतिभा पाटिल, ए. के. हंगल, बासु चटर्जी, एन. चंद्रा, परीक्षत साहनी और अरुण गोविल जैसी महान हस्तियों का संग मिला। दूरदर्शन में ४० वर्षों के व्यापक अनुभव से समृद्ध व्यास जी ने मुंबई, दिल्ली और हॉलीवुड में लगभग ५० वर्ष बिताए तथा वे ‘ऑल इंडिया रेडियो’ (आकाशवाणी) के अपर महानिदेशक पद पर भी कार्यरत रहे।
    राजशेखर व्यास जी का अनुभव-संसार अत्यंत व्यापक रहा है। उनके द्वारा लिखे गए छोटे-छोटे किस्से और संस्मरण पाठकों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। उन्हीं में से कुछ चयनित संस्मरणों को यहाँ ‘छोटी-छोटी यादें’ शीर्षक के अंतर्गत संकलित कर प्रस्तुत किया जा रहा है। आशा है, ये रोचक और हृदयस्पर्शी प्रसंग आपको अवश्य पसंद आएंगे।
    —
    राजशेखर व्यास
    यह नाम अब किसी परिचय का मोहताज नहीं है। न केवल भारत में, बल्कि विश्व के अनेक देशों में अपने बहुआयामी लेखन, निर्माण-निर्देशन, संपादन, मौलिक चिंतन और दर्शन के लिए सुविख्यात श्री व्यास पद्मभूषण, साहित्य वाचस्पति डॉ. (दिवंगत) पंडित सूर्यनारायण जी व्यास के कनिष्ठ पुत्र हैं।
    पुस्तकें एवं लेखन— अब तक उनकी ५९ से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिन्हें व्यापक सराहना और अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। उनकी कई कृतियाँ राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों द्वारा समर्पित अथवा विमोचित की गई हैं। भारत और विदेशों के प्रमुख समाचार पत्रों में उनके ४,००० से अधिक लेख एवं निबंध प्रकाशित हो चुके हैं। देशभक्ति और क्रांतिकारी साहित्य पर उनका कार्य विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
    दूरदर्शन एवं वृत्तचित्र– दूरदर्शन के राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय चैनलों के लिए उन्होंने २०० से अधिक वृत्तचित्रों (डॉक्यूमेंट्रीज़) का निर्माण, निर्देशन, लेखन और प्रसारण किया है।
    उज्जयिनी पर कार्य— केवल अपनी जन्मभूमि उज्जयिनी पर ही उन्होंने १३ से अधिक पुस्तकें तथा ३ महत्वपूर्ण वृत्तचित्र—‘जयति जय उज्जयिनी’, ‘काल’ और ‘द टाइम’ बनाए हैं।सम्मान एवं उपलब्धियाँ—-विश्व के अनेक देशों की यात्रा कर चुके श्री व्यास को फ्रांस सरकार तथा भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से फेलोशिप प्राप्त हुई है। कैम्ब्रिज (इंग्लैंड) के बायोग्राफिकल सेंटर द्वारा ‘इंटरनेशनल मैन ऑफ द ईयर’ और मलेशिया के AIBD द्वारा सम्मानित होने के अलावा, उन्हें दिल्ली की ‘हिंदी अकादमी’ से ‘साहित्यकार सम्मान’ भी प्राप्त हुआ है। वे भारतीय दूरदर्शन के इतिहास में सबसे कम उम्र के अपर महानिदेशक रहे हैं।
    क्रांतिकारी साहित्य— शहीद भगत सिंह के जीवन और कार्य पर की गई उनकी उत्कृष्ट पुस्तक के कारण श्री व्यास देशभर के पाठकों के प्रिय साहित्यकार हैं।
    उग्र पर एक रेखा चित्र –
    एक ही जीवन में अनेक रंगों को जीने वाले ‘उग्र’ (पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’) के व्यक्तित्व और कृतित्व का मूल्यांकन किसी एकरेखीय पैमाने से नहीं किया जा सकता। उनके जीवन और लेखन के विभिन्न आयामों को समझने के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण की आवश्यकता है। वे एक विद्रोही होने के साथ-साथ नई साहित्यिक राहों के निर्माता भी थे। उनका व्यक्तित्व कबीर के हास्य-व्यंग्य, स्वाभिमान और तीक्ष्ण बुद्धिमत्ता से परिपूर्ण था; इसीलिए उनका लेखन पूर्णतः मौलिक था—किसी से प्रभावित या प्रेरित नहीं।
    ‘उग्र’ जी की शैली और शिल्पगत वैशिष्ट्य ने उन्हें अपने समकालीन हिंदी साहित्यकारों से अलग पहचान दी। समाज को जागरूक और सचेत करने के उद्देश्य से उन्होंने तथाकथित सभ्य समाज की कुरीतियों और बुराइयों को बेबाकी से उजागर किया। इसके लिए उन्हें भारी कीमत भी चुकानी पड़ी। साहित्य और समाज के एक वर्ग द्वारा उपेक्षित किए जाने के बावजूद वे अपने सिद्धांतों और साहित्यिक मार्ग पर सदैव अडिग रहे।
    वर्तमान संकलन में ‘उग्र’ जी की सभी श्रेष्ठ या प्रतिनिधि रचनाएँ शामिल नहीं हैं, फिर भी इनके माध्यम से पाठक उनके क्रांतिकारी दृष्टिकोण, जीवन-दर्शन और व्यक्तित्व की विविध छटाओं को भली-भांति समझ सकेंगे। इससे पाठकों को ‘उग्र’ जी के साहित्य से एक गहरा परिचय प्राप्त होगा।

    मनीषा शर्मा
    पता: जालुकबारी (असम)

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