BRICS की तस्वीरों से बेचैन अमेरिका? भारत पर 100% टैरिफ की धमकी के पीछे बदलती विश्व राजनीति
देवानंद सिंह
नई दिल्ली में आयोजित BRICS सम्मेलन की तस्वीरें भले ही कूटनीतिक मेल-मिलाप और वैश्विक सहयोग का संदेश देती हों, लेकिन इन तस्वीरों के पीछे अंतरराष्ट्रीय राजनीति का एक गहरा संदेश भी छिपा है। भारत, रूस और चीन के नेताओं की बढ़ती नजदीकी, रूस से भारत की लगातार तेल खरीद और BRICS के विस्तार ने अमेरिका के सामने एक नई रणनीतिक चुनौती खड़ी की है। इसी बीच भारत पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने वाले अमेरिकी प्रस्ताव की चर्चा ने सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या वाशिंगटन भारत के प्रति अपनी व्यापार नीति को और कठोर करने की तैयारी में है?
यहां सबसे पहले एक तथ्य स्पष्ट होना चाहिए—भारत पर 100 प्रतिशत नया टैरिफ अभी लागू नहीं हुआ है। अमेरिकी कांग्रेस में रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने से संबंधित विधायी प्रस्ताव पर प्रक्रिया चल रही है। इसलिए इसे तत्काल लागू फैसला बताना सही नहीं होगा। लेकिन प्रस्ताव जिस दिशा की ओर संकेत करता है, वह निश्चित रूप से गंभीर है।
अमेरिका का तर्क रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने और उसकी ऊर्जा आय को सीमित करने से जुड़ा है। भारत का पक्ष इससे अलग है। भारत के लिए रूस से कच्चे तेल की खरीद मुख्यतः अपनी विशाल ऊर्जा जरूरतों, उपलब्धता और आर्थिक हितों से जुड़ी है। भारत किसी युद्ध का पक्षकार बने बिना अपने नागरिकों और अर्थव्यवस्था के लिए ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने की नीति पर चलता रहा है।
यहीं से भारत-अमेरिका संबंधों की सबसे बड़ी परीक्षा शुरू होती है। अमेरिका भारत को एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार के रूप में देखता है, जबकि व्यापार के मोर्चे पर दोनों देशों के हित हमेशा एक जैसे नहीं रहे हैं। यदि रूस से तेल खरीदने के कारण भारत के निर्यात पर भारी अतिरिक्त शुल्क लगाने का विकल्प वास्तव में नीति बनता है, तो यह केवल व्यापार का मुद्दा नहीं रहेगा; इसका असर व्यापक भारत-अमेरिका संबंधों पर भी पड़ सकता है।
BRICS की तस्वीरों को लेकर भी एक दिलचस्प राजनीतिक संदेश सामने आता है। भारत एक तरफ अमेरिका, यूरोप और अन्य पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंध मजबूत कर रहा है, तो दूसरी तरफ रूस और चीन के साथ भी संवाद बनाए हुए है। यह विरोधाभास नहीं, बल्कि आज की बहुध्रुवीय दुनिया की वास्तविकता है। भारत किसी एक शक्ति-गुट में बंधने के बजाय अलग-अलग देशों के साथ अपने हितों के अनुसार संबंध आगे बढ़ाना चाहता है।
यही भारत की कूटनीतिक परीक्षा है।
अमेरिका यदि टैरिफ को दबाव के हथियार के रूप में इस्तेमाल करता है, तो भारत को भी भावनात्मक प्रतिक्रिया के बजाय आर्थिक और कूटनीतिक विकल्पों पर विचार करना होगा। भारतीय निर्यातकों के लिए अमेरिकी बाजार महत्वपूर्ण है। अत्यधिक टैरिफ से भारतीय उत्पादों की कीमत बढ़ सकती है और कुछ क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धात्मक दबाव पैदा हो सकता है। इसलिए व्यापारिक बातचीत को मजबूत करना भारत के हित में होगा।
साथ ही भारत को अपनी ऊर्जा रणनीति को और व्यापक बनाना होगा। किसी एक देश या सीमित स्रोत पर अत्यधिक निर्भरता भविष्य में बाहरी दबाव की संभावना बढ़ा सकती है। रूस से तेल खरीद भारत की तत्काल ऊर्जा जरूरतों का हिस्सा हो सकती है, लेकिन दीर्घकालिक समाधान ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण, नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार और घरेलू ऊर्जा क्षमता को मजबूत करना है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत को यह तय करने का अधिकार अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर रखना होगा कि वह ऊर्जा कहां से खरीदे और किन देशों के साथ व्यापार करे। अमेरिका और भारत दोनों बड़े लोकतांत्रिक देश हैं और दोनों के बीच संवाद के पर्याप्त रास्ते मौजूद हैं। मतभेदों को आर्थिक टकराव में बदलने के बजाय बातचीत से हल करना ही दोनों के लिए अधिक व्यावहारिक रास्ता होगा।
BRICS की तस्वीरें चाहे अमेरिकी नीति को प्रभावित करें या नहीं, उन्होंने एक वास्तविकता जरूर सामने रख दी है—विश्व व्यवस्था तेजी से बदल रही है और भारत अब केवल किसी दूसरे शक्ति-केंद्र के साथ खड़े होने वाला देश नहीं, बल्कि अपने हितों के आधार पर संबंधों का संतुलन तय करने वाली प्रमुख शक्ति है।
100 प्रतिशत टैरिफ की चर्चा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत को अपनी आर्थिक ताकत, निर्यात क्षमता और कूटनीतिक स्वायत्तता—तीनों को और मजबूत करने की याद दिलाती है। आने वाले दिनों में अमेरिकी प्रतिनिधि सभा और उसके बाद की प्रक्रिया ही स्पष्ट करेगी कि यह प्रस्ताव कितना आगे बढ़ता है। फिलहाल भारत के लिए सबसे जरूरी है—घबराहट नहीं, सतर्कता; टकराव नहीं, संवाद; और दबाव में निर्णय नहीं, राष्ट्रीय हित के आधार पर रणनीति।

