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    मेहमान का पन्ना संपादकीय

    लोक-कला और कलाकार का संघर्ष

    Devanand SinghBy Devanand SinghSeptember 17, 2026No Comments2 Mins Read
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    लोक-कला और कलाकार का संघर्ष

    मनीषा शर्मा द्वारा रचित तथा गुवाहाटी के प्रमुख प्रकाशन ‘प्रकाशिका’ द्वारा शीघ्र प्रकाशित होने वाला उपन्यास ‘शून्य हाथर मुद्रा’ (शून्य हाथ की मुद्रा) दरांग (असम) की मिट्टी, लोक-संस्कृति और ‘ओजापालि’ लोक-कला के प्रासंगिक विषय पर आधारित एक अत्यंत संवेदनशील एवं यथार्थवादी कृति है।

    लोक-कला और कलाकार का संघर्ष: उपन्यास की कथा दरांग की माटी, लोक-संस्कृति और ओजापालि कला के ताल-संगीत के बीच आकार लेती है। इसके केंद्र में एक सरल, निष्ठावान और स्वाभिमानी ओजा (लोक-कलाकार) है, जिसके लिए ओजापालि केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि उसके जीवन और अस्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। हालांकि, समाज की उपेक्षा, गरीबी और उचित पहचान के अभाव में उसकी साधना धीरे-धीरे एक करुण नियति का रूप ले लेती है।
    आचार्य चाणक्य का कथन—“जंगल में सबसे सीधे पेड़ को सबसे पहले काटा जाता है”—मुख्य पात्र के जीवन का सटीक प्रतिबिंब है। वह चापलूसी या छल-कपट नहीं जानता और न ही सत्ताधीशों के आगे अपने अधिकारों की भीख मांग सकता है। नतीजतन, अद्वितीय प्रतिभा और कठोर साधना के बावजूद वह सरकारी मान्यता, कलाकार पेंशन और सामाजिक सम्मान से वंचित रह जाता है। जिन हाथों ने कभी ओजापालि की मुद्राओं से लोगों को मंत्रमुग्ध किया था, वे अंततः समय की क्रूरता के कारण ‘शून्य हाथ’ बनकर रह जाते हैं।
    यह कथा गाँव और शहर की दो विपरीत दुनियाओं के टकराव को उजागर करती है। एक तरफ गाँव की सोंधी महक, ओजापालि के आध्यात्मिक सुर और मानवीय आत्मीयता है; वहीं दूसरी तरफ शहर की कृत्रिम चकाचौंध, नाइट क्लबों का पश्चिमी संगीत, उपभोक्तावाद और दिखावटी संबंध हैं।
    इसी सांस्कृतिक और आर्थिक संघर्ष के बीच गाँव की एक युवती अपनी सांस्कृतिक पहचान और स्वाभिमान को सीने में समेटे, जीविका चलाने के लिए नाइट क्लब में काम करने पर मजबूर होती है। जिस हाथ को कला की पवित्र मुद्राएं रचनी चाहिए थीं, वही हाथ जब अजनबियों के सामने शराब का गिलास बढ़ाता है, तो यह केवल एक स्त्री की व्यक्तिगत त्रासदी नहीं रहती; बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक गिरावट और आर्थिक विषमता के नग्न यथार्थ पर एक तीखा सवाल खड़ा करती है।
    ” शून्य हाथर मुद्रा’’ केवल एक कलाकार की जीवन-गाथा नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं की उपेक्षा करने वाले समाज के खिलाफ एक मौन विरोध है। यहाँ ‘मुद्रा’ कलाकार की सृजनात्मकता और आत्म-सम्मान का प्रतीक है, जबकि ‘शून्य हाथ’ अधिकारों से वंचित कलाकार की करुण नियति को दर्शाता है। यह उपन्यास विलुप्त होती लोक-संस्कृति, सीमांत कलाकारों के अधिकारों और लोक-कला के संरक्षण का एक सशक्त आह्वान है।

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