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    Home » चढ़ावा लूट: मंदिरों का इतिहासिक खजाना
    अपराध धर्म मेहमान का पन्ना

    चढ़ावा लूट: मंदिरों का इतिहासिक खजाना

    Nikunj GuptaBy Nikunj GuptaJune 24, 2026No Comments2 Mins Read
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    चढ़ावा
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    लेखक: डाक्टर दीपक गोस्वामी

    भारत में धार्मिक स्थल हमेशा से ही चढ़ावा के केंद्र रहे हैं, जहाँ धन, शक्ति और राजनीति आपस में घुलते रहे हैं।

    चढ़ावा की परंपरा

    धर्मस्थलों के चढ़ावे पर सदियों से खुला डाका: सोमनाथ से राम मंदिर

    मंदिर भारत में सिर्फ पूजा स्थल नहीं रहे। ये राजकोष थे, बैंक थे, समाज की तिजोरी थे। राजा से लेकर किसान तक सोना, चांदी, जमीन मंदिर को दान करता था। यही वजह है कि जब भी कोई आक्रांता आया, लुटेरा आया या लालची हाथ बढ़ा, निशाना मंदिर का चढ़ावा ही बना।

    आठवीं सदी में मुहम्मद बिन कासिम सिंध आया। देबल और नीरून के मंदिरों से मूर्तियां तोड़ीं, सोना लूटा। यह शुरुआत थी। असली कहर ढाया महमूद गजनवी ने। 1000 से 1027 ईस्वी के बीच सत्रह बार हमले किए{…}

    … (सभी मूल पैराग्राफ यहाँ बिना बदलाव के सम्मिलित) …

    सवाल सुरक्षा का है। बड़े मंदिरों में केंद्रीय सुरक्षा बल, आतंक विरोधी दस्ता, उड़न-रोधी व्यवस्था है। पर चोरी रोक नहीं पा रहे। क्योंकि बाहरी सुरक्षा और आंतरिक हिसाब दो अलग चीज हैं। राम मंदिर में बाहरी पहरा कड़ा है, पर दान गिनने वाले ही शक के घेरे में हैं। छोटे मंदिरों में तो निगरानी कैमरा तक नहीं। पुजारी अकेला है। दानपेटी का ताला टूटना रोज की बात है।

    निष्कर्ष यही कि धर्मस्थल का चढ़ावा हजार साल से लूट का केंद्र रहा है। महमूद गजनवी ऊंट पर लादकर ले गया। विजय शुक्ला बोरे में भरकर ले गया। लवकुश मिश्रा गोबर में छिपाकर ले गया। नाम बदले, तरीके बदले, नीयत नहीं बदली। जब तक मंदिर में अपार धन रहेगा और हिसाब में पारदर्शिता नहीं आएगी, डाका पड़ता रहेगा। सोमनाथ से राम मंदिर तक कहानी एक ही है। बस लुटेरे का चेहरा बदल गया है।

    अधिक जानकारी के लिए विकिपीडिया देखें।

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