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    Home » शिक्षा रोजगार का टिकट नहीं, जीवन का दर्शन बने -ललित गर्ग-
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    शिक्षा रोजगार का टिकट नहीं, जीवन का दर्शन बने -ललित गर्ग-

    dhiraj KumarBy dhiraj KumarJanuary 24, 2026No Comments7 Mins Read
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    शिक्षा रोजगार का टिकट नहीं, जीवन का दर्शन बने -ललित गर्ग-

     

    विश्व शिक्षा दिवस कोरा उत्सव नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है, यह सोचने का क्षण कि शिक्षा क्या है, किसके लिए है और किस दिशा में समाज को ले जा रही है। भारत इस संदर्भ में केवल एक देश नहीं, बल्कि एक जीवित सभ्यता है, जिसने शिक्षा को कभी भी मात्र रोजगार या सूचना का साधन नहीं माना, बल्कि जीवन-निर्माण, चरित्र-गठन और आत्मबोध की प्रक्रिया के रूप में जिया है। आज जब दुनिया ज्ञान, तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के अभूतपूर्व दौर में खड़ी है, तब भारत की प्राचीन गुरुकुल परंपरा और उसके शैक्षिक सूत्र वैश्विक नेतृत्व का आधार बन सकते हैं। इस वर्ष की थीम ‘शिक्षा के सह-निर्माण में युवाओं की शक्ति’ है, जो शांति और विकास के लिए शिक्षा के महत्व पर केंद्रित है, यह दिन शिक्षा को एक मौलिक अधिकार और भविष्य की पूंजी के रूप में रेखांकित करने के लिए मनाया जाता है, ताकि गरीबी मिटाई जा सके, लैंगिक समानता लाई जा सके और सभी के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित की जा सके। जिसकी आवश्यकता इसलिए भी है क्योंकि लाखों बच्चे एवं युवा शिक्षा से वंचित हैं और यह दिन युवाओं की भूमिका को महत्वपूर्ण बनाता है।

    संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित यह दिवस, शांति और विकास के लिए शिक्षा की भूमिका का जश्न मनाता है। यह शिक्षा को एक मौलिक मानवाधिकार, सार्वजनिक हित और जिम्मेदारी के रूप में स्थापित करता है। यह दिन गरीबी के चक्र को तोड़ने और लैंगिक समानता प्राप्त करने के लिए शिक्षा की आवश्यकता पर जोर देता है। यह दिन शिक्षा को भविष्य की सबसे बड़ी पूंजी मानता है, जो समाज को अंधकार से बाहर निकाल सकती है और भविष्य के निर्माताओं को तैयार कर सकती है। भारत की प्राचीन शिक्षा परंपरा का मूल मंत्र था-“सा विद्या या विमुक्तये”, अर्थात् वही विद्या है जो मुक्त करे। गुरुकुलों में शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं थी; वह आचरण, अनुशासन, प्रकृति के साथ सामंजस्य, गुरु-शिष्य संवाद और जीवनोपयोगी कौशल का समन्वय थी। गुरु केवल विषय का अध्यापक नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टा होता था और शिष्य केवल परीक्षा-उत्तीर्ण करने वाला विद्यार्थी नहीं, बल्कि समाज के प्रति उत्तरदायी नागरिक। आश्रम-व्यवस्था में रहकर विद्यार्थी सेवा, श्रम, ध्यान, तर्क और प्रयोग-इन सबके माध्यम से समग्र व्यक्तित्व का विकास करता था। यह शिक्षा आत्मनिर्भरता सिखाती थी, प्रतिस्पर्धा नहीं बल्कि सह-अस्तित्व का बोध कराती थी और ज्ञान को जीवन से जोड़ती थी।

    औपनिवेशिक काल में यह समग्र शिक्षा व्यवस्था व्यवस्थित रूप से ध्वस्त की गई। लॉर्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति का उद्देश्य भारतीयों को शिक्षित बनाना नहीं, बल्कि प्रशासन के लिए “क्लर्क” तैयार करना था-ऐसे लोग जो सोच में अंग्रेज़ हों, रंग में भारतीय। इस पद्धति ने शिक्षा को जीवन से अलग कर दिया, भाषा को जड़ों से काट दिया और ज्ञान को रटंत, अंक-केंद्रित और नौकरी-उन्मुख बना दिया। आज़ादी के बाद भी दुर्भाग्यवश, भारत लंबे समय तक उसी ढांचे में फंसा रहा। विद्यालय और विश्वविद्यालय बढ़े, लेकिन शिक्षा की आत्मा कमजोर होती चली गई। डिग्रियों की संख्या बढ़ी, पर कौशल, नैतिकता और नवाचार का संकट गहराता गया। स्वतंत्र भारत की शिक्षा प्रणाली ने कुछ सकारात्मक प्रयास अवश्य किए-सार्वजनिक विश्वविद्यालय, वैज्ञानिक संस्थान, तकनीकी शिक्षा लेकिन व्यापक स्तर पर शिक्षा समाज की आवश्यकताओं से कटती गई। पाठ्यक्रम बोझिल होते गए, परीक्षाएं स्मृति-आधारित बनती गईं और शिक्षक-छात्र संवाद औपचारिकता में सिमट गया। शिक्षा रोजगार का टिकट बन गई, जीवन का दर्शन नहीं। यही कारण है कि आज शिक्षित युवा भी दिशाहीनता, बेरोजगारी और मानसिक तनाव से जूझ रहा है। इसी पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लाई गई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 एक निर्णायक मोड़ के रूप में सामने आती है। यह नीति केवल संरचनात्मक सुधार नहीं, बल्कि वैचारिक बदलाव का संकेत देती है। इसमें भारतीय भाषाओं को शिक्षा का माध्यम बनाने, बहु-विषयक अध्ययन, रटंत विद्या से मुक्ति, कौशल विकास, अनुसंधान, नवाचार और नैतिक शिक्षा पर बल दिया गया है। यह नीति स्पष्ट रूप से मैकाले की शिक्षा पद्धति से बाहर निकलने की दिशा में कदम है-जहां शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी नहीं, बल्कि सक्षम, सृजनशील और संवेदनशील मानव का निर्माण है।

    नई शिक्षा नीति में कौशल विकास, अनुभवात्मक अधिगम, खेल, कला और व्यावसायिक शिक्षा को महत्व देना, उच्च शिक्षा में विषयों की कठोर सीमाओं को तोड़ना-ये सभी कदम गुरुकुल परंपरा की आधुनिक पुनर्व्याख्या जैसे हैं। मातृभाषा में शिक्षा का आग्रह न केवल संज्ञानात्मक विकास को सुदृढ़ करता है, बल्कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास भी लौटाता है। यह नीति भारतीय ज्ञान परंपरा-योग, आयुर्वेद, दर्शन, गणित, खगोल को वैश्विक संदर्भ में पुनर्स्थापित करने का अवसर देती है। फिर भी, यह स्वीकार करना होगा कि नीति और क्रियान्वयन के बीच की दूरी अभी भी बड़ी चुनौती है। व्यापक परिवर्तन की अपेक्षाएं अभी अधूरी हैं। शिक्षा को वास्तव में कौशल विकास का केंद्र बनाना होगाकृजहां विद्यार्थी केवल पढ़े नहीं, बल्कि कर सके, सोच सके, समस्या सुलझा सके। पाठ्यपुस्तकों और रटंत विद्या से हटकर शिक्षा को जीवन-विकास का आधार बनाना होगा। शिक्षक को फिर से “गुरु” की भूमिका में लाना होगा-मार्गदर्शक, प्रेरक और सहयात्री के रूप में।

    तकनीकी विकास, नवाचार और एआई के युग में भारतीय शिक्षा पद्धति के सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर, उसे वैश्विक प्रतिस्पर्धा में सक्षम बनना है-डिजिटल साक्षरता, डेटा, विज्ञान और तकनीक में अग्रणी होना है। दूसरी ओर, उसे मानवीय मूल्यों, करुणा, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व को भी सुरक्षित रखना है। यदि शिक्षा केवल तकनीक सिखाएगी और विवेक नहीं, तो वह विनाश का उपकरण बन सकती है। भारत की शक्ति यही है कि वह विज्ञान और अध्यात्म, तकनीक और तत्त्वज्ञान, नवाचार और नैतिकता-इन सबका संतुलन सिखा सकता है। भारतीय शिक्षा पद्धति में वह सामर्थ्य है कि वह दुनिया को एक नया दर्शन और नया शिक्षा-सूत्र दे सके, जहां शिक्षा उपभोग नहीं, साधना हो; जहां ज्ञान सत्ता नहीं, सेवा बने; जहां प्रतिस्पर्धा के साथ सह-अस्तित्व भी हो। “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना आज वैश्विक शिक्षा का सबसे प्रासंगिक मंत्र बन सकती है।

    इक्कीसवीं सदी का मानव और मानव समाज केवल तकनीकी दक्षता या आर्थिक प्रगति से पूर्ण नहीं हो सकता। उसकी संरचना तब तक अधूरी रहेगी, जब तक शिक्षा परिपक्व, समग्र और मूल्यनिष्ठ न हो। आज दुनिया को ऐसे अभिनव मानव की आवश्यकता है जो आध्यात्मिक चेतना से संपन्न हो और वैज्ञानिक दृष्टि से सक्षम भी। शिक्षा का स्वरूप ऐसा हो, जिसमें ज्ञान केवल सूचना न बने, बल्कि विवेक, संवेदना और उत्तरदायित्व का विस्तार करे। मूल्यप्रवाहित शिक्षा व्यक्ति को मानवीय बनाती है और योग शिक्षा उसे आत्म-संयम, संतुलन तथा अंतर्दृष्टि प्रदान करती है। इन दोनों का समन्वय ही ऐसी शिक्षा को जन्म दे सकता है, जो व्यक्ति को आत्मकेंद्रित नहीं, बल्कि विश्वकल्याण की दिशा में उन्मुख करे। भारत के अनेक आध्यात्मिक संत महापुरुषों ने शिक्षा को समग्रता देने के लिये इस विषय पर गंभीर चिन्तन-मंथन किया।

    महान् दार्शनिक संत आचार्य श्री महाप्रज्ञ ने जीवन विज्ञान के रूप में एक समग्र चिन्तन एवं योजना शिक्षा को परिपूर्णता देने के लिये प्रस्तुत की है। उनके अनुसार मानवता का भविष्य श्रम, अर्थ और संयम-इन तीनों के सामंजस्यपूर्ण विकास पर निर्भर है। श्रम और अर्थ जीवन के मौलिक एवं व्यावहारिक पक्ष हैं, जो समाज की गतिशीलता और आत्मनिर्भरता को सुनिश्चित करते हैं; वहीं संयम जीवन का आध्यात्मिक पक्ष है, जो भोग की अंधी दौड़ को रोककर संतुलन और शांति की स्थापना करता है। यदि शिक्षा अथवा प्रशिक्षण इन तीनों आधारों पर निर्मित नहीं होता, तो जीवन की समग्रता केवल एक कल्पना बनकर रह जाती है। अतः शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार सृजन नहीं, बल्कि ऐसे मनुष्य का निर्माण होना चाहिए जो श्रमशील हो, अर्थसचेत हो और संयमशील भी-यही समग्र शिक्षा, समग्र मानव और समग्र समाज की आधारशिला है। जरूरत है यदि भारत अपनी प्राचीन गुरुकुल परंपरा की आत्मा को आधुनिक संदर्भ में पुनर्जीवित कर सके, नई शिक्षा नीति को जमीनी सच्चाई में बदल सके और शिक्षा को जीवन, समाज और प्रकृति से जोड़ सके, तो वह निश्चय ही विश्व का मार्गदर्शन करने में सक्षम होगा। यह केवल भारत की आवश्यकता नहीं, बल्कि मानवता की आवश्यकता है। विश्व शिक्षा दिवस पर भारत का आह्वान यही हो सकता है कि शिक्षा मनुष्य को मशीन नहीं, मानव बनाए; उसे केवल कुशल नहीं, संवेदनशील बनाए; और उसे केवल वर्तमान के लिए नहीं, भविष्य के लिए तैयार करे।

    जीवन का दर्शन बने -ललित गर्ग- शिक्षा रोजगार का टिकट नहीं
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