हनीट्रैप से सिस्टम तक: जब डर, कानून और नैतिकता तीनों हार गए
इंदिरा यादव
गोरखपुर से सामने आया अंशिका सिंह का मामला सिर्फ एक साइबर ठगी या हनीट्रैप की कहानी नहीं है, बल्कि यह हमारे कानून, पुलिस व्यवस्था और सामाजिक व्यवहार—तीनों पर एक साथ सवाल खड़ा करता है। वीडियो कॉल, रिकॉर्डिंग और फिर दुष्कर्म व पॉक्सो जैसे गंभीर कानूनों की धमकी देकर उगाही का यह खेल जितना चौंकाने वाला है, उतना ही शर्मनाक भी। खास बात यह कि इस जाल में सिर्फ आम नागरिक नहीं, बल्कि सीओ और दारोगा स्तर के पुलिस अधिकारी तक फंसे। 165 लोगों की सूची यह बताने के लिए काफी है कि मामला अपवाद नहीं, बल्कि एक लंबे समय से चल रहा सुनियोजित धंधा था।

सबसे गंभीर चिंता कानून के दुरुपयोग को लेकर है। दुष्कर्म और पॉक्सो जैसे कानून समाज की सबसे कमजोर पीड़िताओं को सुरक्षा और न्याय देने के लिए बनाए गए थे। लेकिन जब इन्हीं कानूनों को डराने और पैसे वसूलने का हथियार बना दिया जाए, तो असली पीड़ितों की लड़ाई भी कमजोर पड़ती है। अंशिका पर आरोप है कि उसने 2021 से 2025 के बीच मुकदमों और सेटलमेंट के जरिए लाखों रुपये वसूले। यह न्याय व्यवस्था के चेहरे पर करारा तमाचा है।
इस प्रकरण में पुलिस की भूमिका और भी ज्यादा परेशान करने वाली है। जब कानून के रखवाले ही ब्लैकमेल होकर सोने की चेन और पैसे देने लगें, तो आम आदमी का भरोसा सिस्टम से कैसे बचेगा? वर्दी का डर यहां फेल हुआ, क्योंकि नैतिकता पहले ही हार चुकी थी। सवाल यह नहीं कि पुलिसकर्मी फंसे कैसे, सवाल यह है कि फंसने के बाद भी चुप्पी और ‘सेटलमेंट’ का रास्ता क्यों चुना गया।
मामले का तीसरा पहलू सत्ता और दिखावे की संस्कृति से जुड़ा है। नेताओं और अफसरों के साथ फोटो डालकर प्रभाव जमाना, और इसी ‘सेटिंग’ के भरोसे डर पैदा करना—यह सोशल मीडिया युग की नई बीमारी है। मकान मालिक द्वारा सीसीटीवी लगाने पर केस दर्ज कराना और जेल से भी उगाही की कोशिश बताती है कि डर का यह कारोबार कितना बेखौफ हो चुका था।
अब जब आरोपी पुलिस कस्टडी में है और मोबाइल से परत-दर-परत सच सामने आ रहा है, तो यह जरूरी है कि कार्रवाई आधी-अधूरी न हो। यह मामला सिर्फ एक महिला के अपराध का नहीं, बल्कि उस पूरे सिस्टम का है, जिसने डर, लालच और नैतिक कमजोरी को पनपने दिया।
निष्कर्ष साफ है—डिजिटल दौर में सतर्कता व्यक्तिगत जिम्मेदारी है, लेकिन कानून और व्यवस्था की साख बचाना राज्य की। अगर कानून के दुरुपयोग और अंदरूनी मिलीभगत पर सख्त, पारदर्शी कार्रवाई नहीं हुई, तो आज की अंशिका कल किसी और नाम से लौट आएगी। और तब नुकसान सिर्फ कुछ लोगों का नहीं, पूरे समाज का होगा।

