भारतीय नर्स निमिषा प्रिया मामले में उम्मीद की लौ बुझने न दे भारत
देवानंद सिंह
भारतीय नर्स निमिषा प्रिया की यमन में फांसी की सज़ा का मामला बीते कुछ वर्षों से भारतीय मीडिया, सामाजिक कार्यकर्ताओं और कूटनीतिक हलकों में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। 2017 में यमन में एक हत्या के आरोप में गिरफ़्तारी, 2020 में सुनाई गई मौत की सज़ा, और 2024-25 में फांसी की तारीख़ तय होने के बाद ऐन वक्त पर उसका टल जाना, ये सभी घटनाक्रम इस केस को एक साधारण आपराधिक मामले से कहीं ज़्यादा बड़ा मामला बना चुके हैं। यह मामला अब क़ानून, परंपरा, धर्म, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के पेचीदा जाल में उलझ चुका है।

निमिषा प्रिया एक प्रशिक्षित नर्स है, जो केरल से ताल्लुक रखती हैं और कुछ वर्षों तक यमन में कार्यरत रहीं। उन्होंने स्थानीय नागरिक तलाल अब्दो महदी के साथ मिलकर सना में एक मेडिकल क्लिनिक शुरू किया था। इसी साझेदारी के बीच किसी बिंदु पर रिश्ते बिगड़े और घटनाक्रम इस हद तक पहुंचा कि 2017 में अब्दो महदी की हत्या कर दी गई, और उसका शव टुकड़ों में एक पानी की टंकी से बरामद हुआ। यमन की अदालत ने इस मामले में निमिषा को 2020 में मृत्युदंड की सज़ा सुनाई।
यमन का क़ानून इस्लामी शरिया पर आधारित है, जिसके अनुसार हत्या के मामलों में पीड़ित पक्ष यदि चाहें तो प्रतिशोध स्वरूप सज़ा की बजाय ब्लड मनी के ज़रिए माफ़ी दे सकता है। इसी खिड़की को ध्यान में रखते हुए निमिषा के परिवार ने पीड़ित परिवार को 10 लाख डॉलर (लगभग 83 करोड़ रुपये) की ‘ब्लड मनी’ की पेशकश की, लेकिन अब्दो महदी के परिवार ने इसे सिरे से खारिज कर दिया और स्पष्ट कहा कि उन्हें न्याय चाहिए, सौदा नहीं।

तलाल अब्दो महदी के भाई अब्दुल फतह महदी ने एक फेसबुक पोस्ट में स्पष्ट लिखा कि उन्होंने हर प्रकार की मध्यस्थता को नकारा है और किसी भी तरह की माफ़ी से इनकार किया है। वे भारतीय मीडिया पर इस बात को लेकर भी नाराज़ हैं कि मीडिया ने हत्या के पीछे शोषण और पासपोर्ट ज़ब्ती जैसे कथित कारणों को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया, जबकि यह दावे अदालती प्रक्रिया में प्रस्तुत नहीं किए गए थे। इस केस की एक बड़ी बाधा यह है कि भारत की यमन में राजनयिक उपस्थिति बहुत सीमित है। भारत ने हूती शासन को मान्यता नहीं दी है, जो सना और उत्तरी यमन के बड़े हिस्से पर नियंत्रण रखता है। ऐसे में, भारत सरकार की सीधी कूटनीतिक पहुंच नहीं है और उसे स्थानीय धार्मिक नेताओं और क़बायली मध्यस्थों के माध्यम से ही प्रभाव डालने की कोशिश करनी पड़ रही है।

भारत सरकार ने अपने स्तर पर प्रयास जारी रखे हैं। विदेश मंत्रालय ने कई बार यमन सरकार से संपर्क किया है, लेकिन जिस तरह यमन लंबे समय से गृहयुद्ध और विभाजन का शिकार है, वहां राजनयिक संवाद बेहद कठिन होता जा रहा है। निमिषा प्रिया को फांसी से बचाने के लिए भारत के धार्मिक और सामाजिक संगठनों ने भी पहल की है। ‘सेव निमिषा प्रिया इंटरनेशनल एक्शन काउंसिल’ नामक एक संगठन लगातार अभियान चला रहा है। इसी कड़ी में केरल के प्रतिष्ठित और प्रभावशाली मुस्लिम धर्मगुरु ग्रैंड मुफ़्ती एपी अबूबकर मुसलियार ने यमन के सूफ़ी शेख़ों से संपर्क साधा।

निमिषा प्रिया का मामला अंतरराष्ट्रीय न्याय व्यवस्था और इस्लामी क़ानून के बीच एक गहरी अंतर्विरोधी स्थिति को दर्शाता है। एक ओर यमन का शरिया आधारित न्याय व्यवस्था ‘क़ीसास’ (बदले की सज़ा) को न्याय का अंतिम रूप मानती है, वहीं दूसरी ओर भारत का संविधान और उसकी सामाजिक चेतना न्याय में सुधार और पुनर्वास की अवधारणा को महत्व देती है। यह फर्क तब और बढ़ जाता है, जब मामला महिला और विदेश में कार्यरत किसी भारतीय नागरिक का हो, जो कई बार सामाजिक, भाषाई और सांस्कृतिक अवरोधों के चलते खुद को असहाय पाता है।
इस प्रकरण ने यह भी सिद्ध किया है कि जब मामला भावनात्मक और सांप्रदायिक दृष्टिकोण से जुड़ जाए, तब केवल कानूनी तर्क अपर्याप्त साबित होते हैं। यही कारण है कि भारत सरकार को राजनयिक संवाद के बजाय धार्मिक नेताओं और सामाजिक प्रभावशाली व्यक्तियों की सहायता लेनी पड़ी। निमिषा प्रिया एक प्रवासी भारतीय हैं। इस मामले ने भारत सरकार की उन नीतियों की भी आलोचना की है, जो संकट की स्थिति में प्रवासी भारतीयों की रक्षा को लेकर अक्सर निष्क्रिय नज़र आती हैं। यमन जैसे युद्धग्रस्त देश में किसी भारतीय नागरिक को काम की अनुमति देना, फिर उसकी सुरक्षा, कांसुलर सेवा और क़ानूनी सहायता को सुनिश्चित न कर पाना, ये सब बड़ी नीतिगत विफलताएं हैं।
प्रवासी भारतीय मामलों के मंत्रालय को ऐसे देशों की सूची तैयार करनी चाहिए, जहां राजनीतिक स्थायित्व नहीं है, और वहां भारतीयों को काम पर जाने से पहले कड़ा परामर्श देना चाहिए। निमिषा जैसी घटनाएं भारत को यह चेतावनी देती हैं कि विश्व के हर कोने में अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए केवल कूटनीति नहीं, बल्कि स्पष्ट नीति और रणनीतिक तैयारी की भी ज़रूरत होती है।

भारत के भीतर भी इस केस पर दो राय बनती नज़र आई। एक तबका है, जो निमिषा को निर्दोष या आत्मरक्षा में फंसी महिला मानता है, जबकि दूसरा वर्ग मानता है कि हत्या किसी भी सूरत में उचित नहीं ठहराई जा सकती, चाहे परिस्थितियां कैसी भी रही हों। एक और महत्वपूर्ण पहलू है धार्मिक मध्यस्थता का, जो निमिषा प्रिया के मामले में एक निर्णायक कारक बनता जा रहा है। ग्रैंड मुफ़्ती कंथापुरम मुसलियार, सूफ़ी नेता शेख़ हबीब उमर और अन्य प्रभावशाली धार्मिक नेताओं का हस्तक्षेप यह दर्शाता है कि पश्चिम एशियाई देशों में अभी भी धार्मिक सम्मान और ‘इज्ज़त की सुलह’ क़ानून से ऊपर प्रभाव रखती है।
यह एक तरह से यमन की कबीलाई संरचना और इस्लामी न्याय प्रणाली के एक पहलू को उजागर करता है, जहां ‘मुआवज़ा और माफ़ी’ एक सामाजिक प्रक्रिया है न कि केवल कानूनी विकल्प। भारत जैसे बहुलतावादी और धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में यह अवधारणा थोड़ी असहज हो सकती है, लेकिन यमन जैसे समाज में यह ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से स्वीकृत है। यह मामला भारत की पारंपरिक कूटनीति के सामने एक चुनौती के रूप में आया है। जब किसी देश के साथ औपचारिक राजनयिक रिश्ते नहीं होते, तब विकल्प सीमित हो जाते हैं। हूती शासन के साथ भारत का संवाद न होना, या राजनीतिक मान्यता न देना, इस केस में भारत की एक तरह से कूटनीतिक असहायता को दर्शाता है। आने वाले वर्षों में भारत को यह गंभीरता से सोचने की ज़रूरत है कि जिन देशों में वह अपने नागरिकों को व्यापार या रोज़गार के लिए भेजता है, वहां उनकी राजनयिक सुरक्षा, कानूनी सहायता और जीवन की रक्षा के लिए किस स्तर तक तैयारी की जानी चाहिए।

कुल मिलाकर, निमिषा प्रिया की ज़िंदगी अब एक डोर से बंधी है, वह डोर है यमनी समाज में प्रभावशाली धार्मिक और कबीलाई व्यक्तित्वों की कृपा और पीड़ित परिवार की माफ़ी। यह स्थिति एक आधुनिक राष्ट्र-राज्य के लिए विडंबनात्मक है, जहां क़ानून और संविधान के माध्यम से न्याय सुनिश्चित किया जाता है, वहां किसी भारतीय नागरिक की जान बचाने के लिए भारत को धर्म और परंपरा की शरण में जाना पड़ रहा है, लेकिन यही इस मामले की सबसे बड़ी सीख भी है, जब क़ानून, धर्म, कूटनीति और भावनाएं आपस में टकराते हैं, तब केवल संवाद, संयम और संवेदना से ही समाधान निकल सकता है। अभी भी उम्मीद बाकी है, लेकिन वह उम्मीद हर गुजरते दिन के साथ क्षीण हो रही है। भारत को चाहिए कि वह इस उम्मीद की लौ को बुझने न दे, चाहे इसके लिए उसे हर गैर-परंपरागत रास्ता क्यों न अपनाना पड़े। निमिषा प्रिया के लिए अब सिर्फ़ ‘क़ानून’ काफी नहीं, इंसानियत और एक वैश्विक नैतिक दृष्टिकोण की ज़रूरत है।


