देवानंद सिंह
झारखंड की धरती आज शोकाकुल है। दिशोम गुरू शिबू सोरेन का जाना केवल एक नेता का निधन नहीं, बल्कि एक युग का अंत है। वे सिर्फ एक राजनीतिक व्यक्तित्व नहीं थे, बल्कि झारखंड की आत्मा, आदिवासी अस्मिता के प्रहरी और जनसंघर्षों के सबसे बड़े योद्धा थे।
नेमरा गांव के साधारण परिवार में जन्मे शिबू सोरेन ने अपनी जिंदगी का हर पल अपने लोगों के हक, जमीन, जंगल और जल की लड़ाई में समर्पित कर दिया। जब आदिवासियों की आवाज कोई सुनने को तैयार नहीं था, तब शिबू सोरेन ने झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन कर आंदोलन की मशाल जलाई। उनके अथक संघर्ष ने 2000 में झारखंड को अलग राज्य का दर्जा दिलाया – यह उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा योगदान रहा।
शिबू सोरेन ने सत्ता को कभी लक्ष्य नहीं बनाया।
गुरुजी 3 बार सीएम बने, दो बार केंद्रीय मंत्री, 8 बार लोकसभा सांसद रहे, 3 बार राज्यसभा और एक बार बिहार विधानसभा के सदस्य। लेकिन उनका असली मुकाम हमेशा जनता के बीच रहा। वे गांव-गांव घूमते, संघर्ष की बात करते और आदिवासियों को उनका हक दिलाने के लिए निडर होकर खड़े रहते।
उनका राजनीतिक जीवन विवादों से अछूता नहीं रहा, लेकिन उनकी निष्ठा और समर्पण पर कभी सवाल नहीं उठे। वे अपने सिद्धांतों पर अडिग रहे और जनता की उम्मीदों पर खरे उतरे।
आज जब दिशोम गुरू हमारे बीच नहीं हैं, तो यह जिम्मेदारी हम सबकी है कि उनके सपनों का झारखंड बनाएं – जहां आदिवासी, दलित, किसान, मजदूर सभी को बराबरी का हक मिले, जहां जल, जंगल और जमीन की रक्षा हो, और जहां जनसरोकारों की राजनीति ही सर्वोच्च हो।
शिबू सोरेन अब भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका संघर्ष, उनकी विचारधारा और उनका सपना हमेशा जिंदा रहेगा। वे झारखंड के इतिहास में हमेशा दिशोम गुरू – मार्गदर्शक और जननायक के रूप में याद किए जाएंगे।

