वारदातें बढ़ीं, कमजोर पड़ा पुलिस का सूचना तंत्र?
देवानंद सिंह
जमशेदपुर में लगातार सामने आ रही आपराधिक घटनाओं ने कानून-व्यवस्था के साथ-साथ पुलिस के सूचना तंत्र और अपराध की रोकथाम की क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। गोलमुरी के केनरा बैंक में दिनदहाड़े हुई बड़ी डकैती, गोलीबारी, चोरी और अन्य आपराधिक घटनाओं की खबरें शहरवासियों के बीच सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा रही हैं। हालांकि, अलग-अलग मामलों की परिस्थितियां और पुलिस जांच के निष्कर्ष अलग हो सकते हैं, इसलिए किसी एक घटना के आधार पर पूरे शहर की कानून-व्यवस्था पर अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
लेकिन सवाल केवल वारदात के बाद अपराधियों की गिरफ्तारी का नहीं है। अपराध होने से पहले पुलिस को इसकी भनक क्यों नहीं लगी? बड़े अपराधों में स्थानीय सूचना तंत्र, मुखबिर नेटवर्क, संदिग्ध गतिविधियों की निगरानी और अपराधियों के बीच सक्रिय नेटवर्क की पहचान कितनी प्रभावी है—इन सवालों पर गंभीरता से विचार जरूरी है। केनरा बैंक जैसी बड़ी वारदात में सीसीटीवी फुटेज और तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर जांच आगे बढ़ रही है, लेकिन भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए prevention यानी पूर्व सूचना और रोकथाम की व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
जमशेदपुर में नशे के कारोबार को लेकर भी लंबे समय से शिकायतें और चिंताएं सामने आती रही हैं। यदि किसी इलाके में छोटे-छोटे आपराधिक गिरोह सक्रिय हैं, तो केवल छोटे स्तर के आरोपियों की गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं होगी। पूरे नेटवर्क, वित्तीय स्रोतों, हथियारों की आपूर्ति और संरक्षण देने वालों तक जांच पहुंचाना पुलिस के लिए बड़ी चुनौती है। हालांकि किसी राजनीतिक दल, जनप्रतिनिधि या व्यक्ति पर अपराधियों को संरक्षण देने का आरोप बिना ठोस प्रमाण के लगाना भी उचित नहीं है। ऐसे आरोपों की जांच साक्ष्य के आधार पर होनी चाहिए।
इसी तरह राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों की भी जिम्मेदारी है कि वे कानून-व्यवस्था के मुद्दे को दलगत राजनीति से ऊपर उठाकर जनता की सुरक्षा से जोड़ें। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, अपराध के मामलों में पुलिस पर दबाव बनाने के बजाय पारदर्शी जांच, पीड़ितों को न्याय और प्रभावी पुलिसिंग की मांग लोकतांत्रिक तरीके से उठाना अधिक महत्वपूर्ण है।
जमशेदपुर का औद्योगिक चरित्र, इसकी आबादी और तेजी से फैलता शहरी क्षेत्र पुलिस के सामने लगातार नई चुनौतियां खड़ी कर रहे हैं। इसलिए केवल पुलिस बल बढ़ाना समाधान नहीं है। थाना स्तर पर सूचना तंत्र मजबूत करना, बीट पुलिसिंग को प्रभावी बनाना, संवेदनशील इलाकों की निगरानी, नशे के नेटवर्क की जांच, अपराधियों के वित्तीय स्रोतों पर कार्रवाई और नागरिकों के साथ भरोसेमंद संवाद—इन सभी मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा।
90 के दशक से आज की स्थिति की तुलना भावनात्मक रूप से की जा सकती है, लेकिन नीति और प्रशासन के स्तर पर जरूरी है कि तुलना के बजाय वर्तमान अपराध के प्रमाणित आंकड़ों और वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर रणनीति बनाई जाए।
आखिरकार सवाल किसी एक अधिकारी, सरकार या राजनीतिक दल का नहीं है। सवाल है कि जमशेदपुर का आम नागरिक अपने घर, दुकान, बाजार और सड़क पर खुद को कितना सुरक्षित महसूस करता है। पुलिस को अपराध होने के बाद कार्रवाई करने के साथ-साथ ऐसी विश्वसनीय व्यवस्था विकसित करनी होगी जिससे अपराधियों को वारदात की योजना बनाने से पहले ही कानून की मौजूदगी का एहसास हो।
कानून का इकबाल केवल सख्त कार्रवाई से नहीं, बल्कि समय पर मिली सूचना, निष्पक्ष जांच और अपराध रोकने की प्रभावी क्षमता से स्थापित होता है। जमशेदपुर आज इसी कसौटी पर पुलिस व्यवस्था से जवाब मांग रहा है।

