लेखक: डॉ. अनीता शर्मा
“प्रकृति केवल हमारे जीवन का आधार नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और सभ्यता की आत्मा भी है।”
विश्व पर्यावरण दिवस की पूर्व संध्या पर एक समाचार पढ़ने को मिला कि चारधाम यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं द्वारा लगभग 250 टन कचरा फैलाया गया। समाचार पढ़ते ही मन में एक प्रश्न कौंध गया— “क्या हम वास्तव में पुण्य कमाकर लौटते हैं, या अनजाने में प्रकृति के प्रति अपने दायित्वों की उपेक्षा कर पाप के भागीदार बन जाते हैं?”
इसी विचार ने मुझे अपनी हाल की यात्रा की ओर लौटा दिया। जब झारखंड के औद्योगिक नगर जमशेदपुर की 41 डिग्री तापमान वाली तपती गर्मी से व्याकुल मन मेघालय की शीतल वादियों में पहुँचा, तो केवल मौसम का ही नहीं, बल्कि मानवीय व्यवहार और पर्यावरण के प्रति दृष्टिकोण का भी एक गहरा अंतर देखने को मिला। विश्व पर्यावरण दिवस का यह अवसर हमें केवल पौधे लगाने की याद नहीं दिलाता, बल्कि यह भी पूछता है कि हम अपने आसपास के वातावरण के साथ कैसा व्यवहार कर रहे हैं।
जमशेदपुर बनाम मेघालय: पर्यावरण के प्रति दृष्टिकोण
भारत विविधताओं का देश है। यहाँ की जीवनशैली, खान-पान, रहन-सहन और प्रकृति के प्रति सोच भी क्षेत्रानुसार बदलती रहती है। यदि मैं जमशेदपुर और मेघालय की तुलना करूँ, तो पर्यावरण के प्रति लोगों की आदतों और संवेदनशीलता में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है।
जमशेदपुर झारखंड का प्रमुख औद्योगिक नगर है। यहाँ बड़े-बड़े कारखाने, व्यस्त सड़कें, वाहनों की भीड़ और तेज़ रफ्तार जीवनशैली दिखाई देती है। आधुनिक सुविधाओं ने जीवन को सहज तो बनाया है, लेकिन इसके साथ प्रदूषण और पर्यावरणीय चुनौतियाँ भी बढ़ी हैं। आज स्वच्छता का अर्थ अक्सर केवल अपने घर की सफाई तक सीमित होकर रह गया है। घर का कचरा बाहर सड़क पर डाल देना मानो सामान्य बात हो गई है। जहाँ नज़र डालिए, प्लास्टिक का बढ़ता उपयोग और उसका अव्यवस्थित निष्पादन दिखाई देता है।
स्वच्छता और विश्व पर्यावरण दिवस का महत्व
दुख इस बात का है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाने में पीछे रह जाते हैं। जबकि कुछ छोटे-छोटे प्रयास भी बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं। मेघालय में मैंने देखा कि अधिकांश घरों और दुकानों के सामने कूड़ादान अवश्य रखा होता है और लोग कचरा उसी में डालते हैं। यह कोई बड़ा अभियान नहीं, बल्कि एक सामान्य आदत है। यदि हम भी दूध की थैलियों, तेल के पाउच या अन्य प्लास्टिक सामग्री का जिम्मेदारी से उपयोग और निपटान करें, तो बहुत बड़ा अंतर आ सकता है। [INTERNAL_LINK_HOLDER]
मेघालय की प्रकृति-प्रेमी जीवनशैली से प्रेरणा
मेघालय का जनजीवन प्रकृति के अत्यंत निकट है। पहाड़, झरने, घने वन और स्वच्छ वातावरण वहाँ की पहचान हैं। वहाँ के लोग प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का अभिन्न साथी मानते हैं। गाँवों में वर्षा जल संरक्षण की परंपरा आज भी जीवित है। बाँस, लकड़ी और अन्य प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग किया जाता है। प्लास्टिक का प्रयोग अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है और स्वच्छता के प्रति लोगों की सजगता सहज ही मन को प्रभावित करती है।
विशेष रूप से यह देखकर अच्छा लगा कि वहाँ आने वाले पर्यटकों से भी विनम्रता से आग्रह किया जाता है कि वे पहाड़ों और प्राकृतिक धरोहरों को सुरक्षित रखें। मेघालय का प्रसिद्ध लिविंग रूट ब्रिज केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि प्रकृति और मानव के अद्भुत सहअस्तित्व का प्रतीक है। यह हमें सिखाता है कि विकास का अर्थ प्रकृति पर विजय पाना नहीं, बल्कि उसके साथ मिलकर आगे बढ़ना है।
अनुशासन और धैर्य: जीवन का दर्शन
एक और बात जिसने विशेष रूप से ध्यान खींचा, वह थी वहाँ के यातायात व्यवस्था में अनुशासन। पहाड़ी क्षेत्रों में वाहनों की संख्या कम नहीं है, क्योंकि यह उन लोगों की आजीविका का महत्वपूर्ण साधन हैं। फिर भी सड़क पर अनावश्यक हॉर्न सुनाई नहीं देते। वाहन कतारबद्ध चलते हैं और यातायात में धैर्य दिखाई देता है। इसी दौरान सड़क किनारे लिखी एक पंक्ति मन में गहराई तक उतर गई—
“जिन्हें जल्दी थी, वे ” चले गए “।
यह वाक्य केवल सड़क सुरक्षा का संदेश नहीं, बल्कि जीवन का भी दर्शन है। हम घूमने निकलते हैं, प्रकृति का आनंद लेने निकलते हैं, फिर इतनी जल्दबाज़ी किस बात की?
यदि हम यात्रा के दौरान केवल एक पानी की बोतल साथ रखें और उसे बार-बार भरकर उपयोग करें, तो न केवल पैसे बचेंगे, बल्कि अनगिनत प्लास्टिक की बोतलें भी कूड़े में जाने से बचेंगी। ये छोटी-छोटी आदतें ही भविष्य की बड़ी चुनौतियों का समाधान बन सकती हैं।
विकास और पर्यावरण संतुलन: भविष्य की राह
आज जमशेदपुर जैसे औद्योगिक नगरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित करने की है। यदि वृक्षारोपण, जल संरक्षण, सार्वजनिक परिवहन और प्लास्टिक-मुक्त जीवनशैली को बढ़ावा दिया जाए, तो विकास और पर्यावरण दोनों साथ-साथ आगे बढ़ सकते हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम मेघालय की प्रकृति-प्रेमी जीवनशैली से प्रेरणा लें और आधुनिकता के साथ पर्यावरणीय जिम्मेदारी को भी अपनाएँ। विश्व पर्यावरण दिवस केवल एक दिवस नहीं, बल्कि पृथ्वी के प्रति हमारी प्रतिबद्धता का स्मरण है। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपनी दैनिक आदतों में थोड़ा-सा परिवर्तन कर ले, तो आने वाली पीढ़ियों को एक स्वच्छ, सुंदर और सुरक्षित धरती सौंपना संभव होगा।
अंततः यही कहा जा सकता है कि प्रकृति से जुड़कर ही मानव जीवन वास्तव में सुखद, संतुलित और सुरक्षित बन सकता है।
“धरती बचाएँ, पर्यावरण अपनाएँ — यही मानवता का सच्चा दायित्व है।”

