केंद्रीय एजेंसियां, सियासत और संवैधानिक मर्यादा देवानंद सिंह
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और प्रवर्तन निदेशालय (ED) के बीच टकराव ने एक बार फिर देश की राजनीति में केंद्रीय जांच एजेंसियों की भूमिका को बहस के केंद्र में ला दिया है। इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (I-PAC) के दफ्तर पर ईडी की छापेमारी के दौरान ममता बनर्जी का स्वयं वहां पहुंचना, एजेंसी के काम में हस्तक्षेप के आरोप और फाइलें व मोबाइल साथ ले जाने जैसे घटनाक्रम अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुके हैं। अदालत की शुरुआती टिप्पणियों से संकेत मिलता है कि वह इस पूरे घटनाक्रम को सामान्य राजनीतिक विरोध से अलग, संस्थागत मर्यादाओं के उल्लंघन के रूप में देख रही है।
ममता बनर्जी का तर्क है कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार विपक्षी दलों को दबाने के लिए ईडी और सीबीआई जैसी एजेंसियों का राजनीतिक इस्तेमाल कर रही है। यह आरोप नया नहीं है और देश के कई गैर-भाजपा शासित राज्यों में यह भावना लगातार सामने आती रही है। दूसरी ओर, केंद्र और जांच एजेंसियों का दावा है कि कार्रवाई पूरी तरह कानून के दायरे में है और भ्रष्टाचार के मामलों में राजनीतिक पद या हैसियत किसी को ढाल नहीं दे सकती। यही टकराव लोकतंत्र में सत्ता और संस्थानों के बीच संतुलन की सबसे बड़ी कसौटी बन जाता है।
इतिहास बताता है कि केंद्रीय एजेंसियों से सीधी भिड़ंत का रास्ता अक्सर सियासी तौर पर भारी पड़ा है। बिहार में मुख्यमंत्री रहते लालू प्रसाद यादव ने जब सीबीआई जांच को राजनीतिक साजिश बताया, तब भी कानून की प्रक्रिया रुकी नहीं और अंततः गिरफ्तारी व सजा का सामना करना पड़ा। दिल्ली में मुख्यमंत्री रहते अरविंद केजरीवाल ने ईडी के नोटिसों की अनदेखी की, जिसका नतीजा उनकी गिरफ्तारी और लंबे समय तक जेल में रहने के रूप में सामने आया। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी अदालतों से राहत की उम्मीद में एजेंसी के समन को हल्के में लिया, लेकिन अंततः उन्हें भी गिरफ्तारी झेलनी पड़ी। इन तीनों उदाहरणों में साझा बात यही रही कि राजनीतिक टकराव ने कानूनी मुश्किलों को कम नहीं, बल्कि और गहरा किया।
ममता बनर्जी की स्थिति इसलिए भी अहम है क्योंकि वे पिछले डेढ़ दशक से बंगाल की राजनीति की सबसे प्रभावशाली चेहरा रही हैं। 2011 में वामपंथी किले को ध्वस्त करने के बाद 2021 में तीसरी बार सत्ता में लौटना उनकी राजनीतिक ताकत का प्रमाण है। अब 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा पूरी ताकत झोंक चुकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के लगातार दौरों ने चुनावी माहौल को तीखा बना दिया है। ऐसे समय में केंद्रीय एजेंसियों से टकराव ममता के लिए राजनीतिक सहानुभूति भी पैदा कर सकता है, लेकिन अगर अदालत का रुख प्रतिकूल हुआ तो यही टकराव उनकी सबसे बड़ी कमजोरी भी बन सकता है।
लोकतंत्र में निर्वाचित सरकारों की आलोचना और विरोध का अधिकार जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी जांच एजेंसियों की कार्यवाही में संवैधानिक मर्यादा का पालन। सड़कों पर या छापेमारी के दौरान सीधी भिड़ंत संस्थानों की गरिमा को ठेस पहुंचाती है और राजनीतिक संदेश भले मजबूत हो, कानूनी स्थिति कमजोर कर देती है। अंततः फैसले अदालतों में होते हैं, न कि राजनीतिक मंचों पर।
इस पूरे घटनाक्रम का सार यही है कि ममता बनर्जी के सामने अब राजनीतिक संघर्ष से अधिक संवैधानिक संयम की परीक्षा है। इतिहास गवाह है कि केंद्रीय एजेंसियों से ‘पंगा’ लेने का अंजाम अक्सर सत्ता में बैठे नेताओं के लिए कठिन रहा है। बंगाल की राजनीति का भविष्य जनता तय करेगी, लेकिन कानून के साथ टकराव में धैर्य और दूरी ही अब तक सबसे सुरक्षित रास्ता साबित हुई है।

