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    Home » विपक्ष द्वारा तर्कसंगत विधेयकों का विरोध करना उचित नहीं
    Breaking News Headlines जमशेदपुर संपादकीय

    विपक्ष द्वारा तर्कसंगत विधेयकों का विरोध करना उचित नहीं

    News DeskBy News DeskAugust 24, 2025No Comments8 Mins Read
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    कालियाचक घटना
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    देवानंद सिंह
    लोकसभा का मानसून सत्र भारतीय राजनीति में हमेशा से विशेष महत्व रखता रहा है। यह वह अवसर होता है, जब सरकार पूरे वर्ष की नीतियों का हिसाब-किताब जनता और विपक्ष के सामने प्रस्तुत करती है और साथ ही आने वाले समय के लिए अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने का प्रयास करती है। विपक्ष भी इस समय को अपनी असहमति दर्ज कराने और सरकार को कठघरे में खड़ा करने का सबसे उपयुक्त अवसर मानता है। इस बार का सत्र भी कुछ इसी तरह की हलचलों से भरा रहा। केंद्र सरकार ने तीन अहम विधेयक संसद के सामने रखे, केंद्र शासित प्रदेश सरकार (संशोधन) विधेयक, 2025, संविधान (130वां संशोधन) विधेयक, 2025, और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक, 2025। पहली नज़र में ये सभी विधेयक तर्कसंगत दिखाई देते हैं। सरकार का कहना है कि यदि, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री जैसे संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्ति गंभीर आरोपों के तहत न्यायिक हिरासत में हों और लगातार 30 दिनों तक जेल में रहें, तो उन्हें पद पर बने रहने का अधिकार नहीं होना चाहिए। यह तर्क निश्चित रूप से आकर्षक लगता है, क्योंकि लोकतंत्र का सार ही जनविश्वास पर आधारित है और यदि, जनता को यह लगे कि उनके चुने हुए नेता स्वयं गंभीर मामलों में आरोपी हैं, तो राजनीति की साख डगमगा जाती है।

    लेकिन भारतीय राजनीति केवल सतही तर्कों पर नहीं चलती। हर विधेयक के पीछे निहितार्थ और राजनीतिक उपयोगिताएं छिपी होती हैं। यही कारण है कि विपक्ष ने इन विधेयकों को लेकर गहरी आशंकाएं व्यक्त कीं। तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने विशेष रूप से 130वें संविधान संशोधन विधेयक को लेकर तीखा विरोध जताया और संसद की संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास इसे भेजने के फैसले को तमाशा बताया। उनका कहना था कि जेपीसी वस्तुतः सत्ता पक्ष के नियंत्रण में होती हैं, और उसकी रिपोर्टें अक्सर पूर्व निर्धारित नतीजों के साथ आती हैं, इसीलिए उनकी पार्टी ने समिति में कोई प्रतिनिधि न भेजने का फ़ैसला किया।

    ओ’ब्रायन की आपत्ति का मुख्य आधार यह था कि यह प्रावधान राज्यों की चुनी हुई सरकारों को अस्थिर करने का एक नया औज़ार बन सकता है। यदि, किसी मुख्यमंत्री को राजनीतिक कारणों से फंसाकर गिरफ्तार कर लिया गया और वह 30 दिनों तक जेल से बाहर न आ सका, तो उसकी सरकार स्वतः संकट में पड़ जाएगी। भारतीय राजनीति में यह आशंका कोई काल्पनिक भय नहीं है। स्वतंत्रता के बाद से ही भारतीय संघीय ढांचे में केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन को लेकर लगातार विवाद रहे हैं। अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग कर केंद्र सरकारें कई बार विपक्ष शासित राज्यों की सरकारें बर्खास्त करती रही हैं। राज्यपालों की भूमिका भी अक्सर केंद्र के एजेंट जैसी मानी जाती रही है। ऐसे में, यदि अब एक नया संवैधानिक प्रावधान राज्यों की सरकारों को अस्थिर करने के लिए जुड़ गया, तो संघीय ढांचे की जड़ें और कमजोर हो सकती हैं।

    विपक्ष की शंकाएं तीन स्तरों पर केंद्रित दिखाई देती हैं। पहला, लोकतांत्रिक असंतुलन का। जनता अपने नेताओं को वोट देकर चुनती है। यदि, केवल गिरफ्तारी की स्थिति, और वह भी बिना अंतिम दोषसिद्धि के, किसी जनप्रतिनिधि को पद से हटाने का आधार बन जाए, तो यह जनादेश पर सीधा प्रहार होगा। लोकतंत्र में दोषसिद्धि और केवल गिरफ्तारी के बीच बहुत बड़ा अंतर है। दूसरा, राज्यों के अधिकारों पर चोट का। भारत का संविधान संघीय ढांचे को मान्यता देता है, और यदि केंद्र चाहे तो राज्यपाल या केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग कर विपक्षी नेताओं को फंसाकर राज्य सरकारों को गिरा सकता है। तीसरा, कानूनी दुरुपयोग की आशंका। भारतीय राजनीति का इतिहास गवाह है कि कानूनों का इस्तेमाल राजनीतिक प्रतिशोध के लिए बार-बार किया गया है, चाहे वह आपातकाल का दौर हो, पीडीपीपी एक्ट का प्रयोग हो या फिर हाल के समय में प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई जैसी एजेंसियों की कार्यवाहियां। विपक्ष को लगता है कि नया संशोधन भी उसी परंपरा को और मजबूती देगा।

    दूसरी ओर, सत्ता पक्ष का तर्क भी कमज़ोर नहीं है। उनका कहना है कि लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों को आम नागरिक से अलग कोई विशेषाधिकार नहीं मिलना चाहिए। यदि, एक साधारण सरकारी कर्मचारी किसी अपराध में जेल चला जाता है, तो वह अपनी नौकरी पर नहीं रह सकता। फिर प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री जैसे बड़े संवैधानिक पदों पर बैठे लोग क्यों अपवाद बने रहें? सत्ता पक्ष का दूसरा बड़ा तर्क यह है कि भ्रष्टाचार और आपराधिक राजनीति ने जनता का विश्वास डगमगाया है। यदि यह कानून लागू होता है, तो जनता के मन में राजनीति के प्रति विश्वास दोबारा बहाल हो सकता है और जनता को लगेगा कि कानून सब पर समान रूप से लागू होता है।

    इस बहस का सबसे पेचीदा पहलू संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी की भूमिका है। जेपीसी भारतीय संसदीय राजनीति का एक विवादित अध्याय रही है। बोफोर्स घोटाले से लेकर 2जी स्पेक्ट्रम और कोयला आवंटन तक, हर बड़े घोटाले पर जेपीसी गठित हुई, लेकिन लगभग हर बार उसकी रिपोर्ट सत्ता और विपक्ष की खींचतान में उलझकर रह गई। बोफोर्स मामले में जेपीसी ने तत्कालीन सरकार को बचाने का काम किया, 2जी स्पेक्ट्रम मामले में रिपोर्ट पर सवाल उठे और इसे सत्ता पक्ष का बचाव माना गया, वहीं कोयला आवंटन मामले में समिति की बैठकों का विपक्ष ने बहिष्कार किया। ऐसे में, विपक्ष का यह तर्क अनुचित नहीं लगता कि जेपीसी हमेशा सत्ता पक्ष के नियंत्रण में रहती है। यही कारण है कि इस बार भी विपक्ष को लगता है कि जेपीसी की कार्यवाही महज औपचारिकता होगी और इसका इस्तेमाल सरकार अपनी नीतियों को वैध ठहराने के लिए करेगी।

    डेरेक ओ’ब्रायन ने संसद के बाहर भी सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि पूरा मानसून सत्र सरकार की रक्षात्मक मुद्रा में बीता। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उपराष्ट्रपति पूरे सत्र के दौरान लगभग लापता रहे, भाजपा अब तक नया राष्ट्रीय अध्यक्ष तय नहीं कर पाई और वोट चोरी घोटाले ने सत्ता पक्ष की साख को गहरी चोट पहुंचाई। उनके मुताबिक, सरकार ने विपक्ष के दबाव से बचने के लिए सत्र की कार्यवाही बाधित करने की रणनीति अपनाई। इन बयानों से विपक्ष के आत्मविश्वास का संकेत तो मिलता ही है, साथ ही यह भी समझ आता है कि सत्तारूढ़ गठबंधन बहुमत होने के बावजूद मनोवैज्ञानिक रूप से दबाव में है।

    असल प्रश्न यही है कि यह प्रस्ताव अच्छा है या बुरा नहीं, बल्कि इसका क्रियान्वयन कैसे होगा। यदि, यह कानून वाकई भ्रष्टाचार और अपराध को राजनीति से बाहर करने का औजार बनेगा तो इसे ऐतिहासिक सुधार कहा जाएगा। लेकिन यदि इसका इस्तेमाल विपक्षी सरकारों को गिराने और नेताओं को फंसाने के लिए हुआ, तो यह लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा होगा। लोकतंत्र का सार यही है कि सत्ता और विपक्ष, दोनों के पास निष्पक्ष खेल का अवसर हो। यदि मैदान ही असमान बना दिया जाए, तो चुनाव, बहुमत और जनादेश सब बेकार हो जाएंगे।

    यहां संघीय ढांचे पर संभावित प्रभाव भी नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। भारत का संविधान यद्यपि संघीय ढांचे को मान्यता देता है, लेकिन व्यवहार में केंद्र हमेशा अपेक्षाकृत मजबूत रहा है। अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग के उदाहरण हमारे सामने हैं। कई बार राज्यों की चुनी हुई सरकारें केवल राजनीतिक असहमति के कारण बर्खास्त कर दी गईं। अब यदि नया प्रावधान लागू हो गया तो राज्य सरकारों की संवैधानिक स्थिति और भी कमजोर हो सकती है। केंद्र चाहे तो किसी भी मुख्यमंत्री को गिरफ्तार करवा कर उनकी सरकार गिरा सकता है। यह स्थिति न केवल राज्यों की स्वायत्तता बल्कि भारतीय संघीय ढांचे के भविष्य पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करेगी।

    जनता की दृष्टि से यह मुद्दा जटिल है। एक ओर जनता चाहती है कि भ्रष्ट नेता और अपराधी प्रवृत्ति के लोग सत्ता से बाहर हों, लेकिन दूसरी ओर यह भी चिंता है कि कहीं यह प्रावधान राजनीतिक प्रतिशोध का औजार न बन जाए। जनता के मन में दो बुनियादी प्रश्न हैं। पहला, क्या कोई ऐसी स्वतंत्र व्यवस्था होगी जो तय करेगी कि गिरफ्तारी असली अपराध पर आधारित है, न कि राजनीतिक दबाव पर? दूसरा, निर्णय का अधिकार किसके पास होगा? क्या संसद यह तय करेगी कि किसी नेता को पद से हटाया जाए, या यह अधिकार न्यायपालिका के पास होगा? जब तक इन सवालों का स्पष्ट और संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता, जनता असमंजस में रहेगी।

    संविधान संशोधन की जटिलता भी ध्यान देने योग्य है। किसी भी संशोधन के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत आवश्यक है, और यदि वह संघीय ढांचे को प्रभावित करता है तो आधे राज्यों की मंजूरी भी चाहिए। 130वां संशोधन निस्संदेह संघीय ढांचे को छूता है। ऐसे में, राज्यों का रुख निर्णायक होगा। यदि, राज्य सरकारें इसे केंद्र की शक्ति वृद्धि के रूप में देखेंगी, तो इसे आसानी से मंजूरी नहीं मिलेगी। लेकिन यदि इसे भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति के साधन के रूप में देखा गया, तो शायद समर्थन भी मिल जाए। यही इस संशोधन का असली इम्तिहान होगा।

    इतिहास बताता है कि जब भी किसी कानून या प्रावधान का इस्तेमाल राजनीतिक हथियार के रूप में हुआ है, उसने लोकतंत्र को कमजोर किया है। आपातकाल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। उसी तरह, यदि 130वें संशोधन का इस्तेमाल विपक्ष को कमजोर करने के लिए किया गया, तो यह लोकतंत्र की आत्मा के खिलाफ होगा, लेकिन यदि इसे निष्पक्ष और पारदर्शी ढंग से लागू किया गया, तो यह भारतीय लोकतंत्र को स्वच्छ और मज़बूत बनाने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है।

    आख़िरकार लोकतंत्र की असली परीक्षा यही है कि क्या हम ऐसा संतुलन बना पाते हैं जिसमें राजनीतिक शुचिता भी बनी रहे और लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन भी न हो। यदि, यह संतुलन बिगड़ गया, तो भारत का संघीय ढांचा और लोकतांत्रिक परंपराएं गहरी चोट खा सकती हैं। लेकिन यदि संसद, न्यायपालिका और जनता मिलकर इसे संतुलित करने में सफल हुए, तो यह प्रस्ताव भारतीय राजनीति में ऐतिहासिक सुधार की तरह दर्ज होगा।

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