यूपी का सियासी चक्रव्यूह: शाह की बिसात, विपक्ष की ‘सेटिंग’ और सत्ता का खेल!
भाजपा की हैट्रिक की तैयारी, सपा-बसपा-कांग्रेस के सामने अस्तित्व और एकजुटता की चुनौती
देवानंद सिंह
उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनावी शतरंज बिछने लगी है। भाजपा ने सत्ता में हैट्रिक लगाने की तैयारी तेज कर दी है। अमित शाह का सक्रिय होना, प्रदेश पदाधिकारियों और कार्यसमिति की बैठकों के जरिए संगठन की समीक्षा तथा छह संगठनात्मक क्षेत्रों में मैराथन बैठकों की योजना बताती है कि भाजपा चुनाव को लेकर पूरी गंभीरता से मैदान सजा रही है। पार्टी का मकसद साफ है—बूथ मजबूत करो, कार्यकर्ताओं को जगाओ, क्षेत्रीय समीकरण साधो और विपक्ष को मुकाबले से पहले ही उलझा दो।
लेकिन सियासत का असली सवाल यह नहीं कि अमित शाह कितनी बैठकें करेंगे या भाजपा कितनी मजबूत चुनावी बिसात बिछाएगी। असली सवाल यह है कि विपक्ष उस बिसात का जवाब कैसे देगा? समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस के सामने भाजपा को चुनौती देने का दावा तो है, लेकिन क्या उनके पास ऐसा साझा राजनीतिक विकल्प भी है, जो जनता को भरोसा दिला सके? या फिर सत्ता विरोधी मतों का बंटवारा ही भाजपा की सबसे बड़ी ताकत बन जाएगा?
अमित शाह को चुनावी रणनीति और संगठन प्रबंधन का माहिर माना जाता है। उत्तर प्रदेश में भाजपा की पिछली चुनावी सफलताओं में संगठन की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। इस बार भी पार्टी क्षेत्रवार समीक्षा और बूथ स्तर पर पकड़ मजबूत करने में जुटी है। मगर चुनाव केवल रणनीति से नहीं जीते जाते। बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की परेशानी, शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून-व्यवस्था जैसे सवालों पर जनता का रुख भी उतना ही निर्णायक होगा। सत्ता की मशीनरी जितनी मजबूत हो, जनता की नाराजगी को नजरअंदाज करने की कीमत फिर भी चुकानी पड़ सकती है।
दूसरी ओर, अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी पीडीए के सहारे पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों को जोड़ने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस सामाजिक न्याय और संविधान की रक्षा जैसे मुद्दों के साथ अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रही है, जबकि मायावती की बसपा अपने परंपरागत जनाधार के दम पर चुनावी समीकरणों में अहम भूमिका निभा सकती है। लेकिन इन तीनों दलों के सामने सबसे बड़ा संकट यही है कि भाजपा विरोधी राजनीति को एक प्रभावी चुनावी विकल्प में कैसे बदला जाए।
विपक्ष में गठबंधन और पर्दे के पीछे की ‘सेटिंग’ को लेकर चर्चाएं भी कम नहीं हैं। सपा-कांग्रेस के रिश्ते, बसपा की अलग रणनीति और ओवैसी तथा चंद्रशेखर आजाद जैसे नेताओं की संभावित राजनीतिक भूमिका को लेकर तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। सवाल उठता है कि क्या विपक्ष भाजपा के खिलाफ साझा लड़ाई की जमीन तैयार करेगा या हर दल अपनी राजनीतिक दुकान बचाने और सीटों का हिसाब लगाने में ही लगा रहेगा?
यहां एक बात स्पष्ट रहनी चाहिए गठबंधन करना राजनीति है, लेकिन बिना प्रमाण किसी गठबंधन को गुप्त ‘सेटिंग’ कहना निष्पक्षता नहीं। किसी दल पर जानबूझकर वोट काटने या भाजपा को लाभ पहुंचाने का आरोप लगाया जाता है, तो उसके समर्थन में ठोस तथ्य भी होने चाहिए। हालांकि, विपक्षी दलों को यह जवाब जरूर देना होगा कि उनकी रणनीति का वास्तविक लाभ किसे मिल रहा है। अगर आपसी प्रतिस्पर्धा में भाजपा विरोधी मत बिखरते हैं, तो उसका चुनावी फायदा भाजपा को मिल सकता है। यह राजनीतिक गणित है, अपने आप में किसी गुप्त समझौते का प्रमाण नहीं।
सपा को अपनी पीडीए राजनीति को ठोस कार्यक्रम में बदलना होगा। बसपा को अपने जनाधार और संगठन की ताकत साबित करनी होगी। कांग्रेस को तय करना होगा कि वह उत्तर प्रदेश में स्वतंत्र राजनीतिक विस्तार चाहती है या व्यापक विपक्षी तालमेल को प्राथमिकता देगी। तीनों दलों के सामने सवाल एक ही है क्या भाजपा को हराने की इच्छा, उसे हराने की व्यावहारिक रणनीति में बदल पाएगी?
और भाजपा के सामने भी कम चुनौती नहीं है। संगठन की बैठकों में चुनावी जीत का लक्ष्य तय किया जा सकता है, लेकिन जनता के मन का फैसला किसी बैठक में नहीं लिखा जा सकता। मतदाता को रोजगार चाहिए, महंगाई से राहत चाहिए, बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं चाहिए तथा शासन में जवाबदेही चाहिए। चुनाव अगर केवल जातीय समीकरणों, राजनीतिक आरोपों और सत्ता के जोड़-तोड़ तक सीमित रह गया, तो जनता के वास्तविक सवाल फिर पीछे छूट जाएंगे।
उत्तर प्रदेश का चुनाव इसलिए दिलचस्प होगा कि यहां भाजपा की संगठनात्मक ताकत के सामने विपक्ष की एकजुटता ही नहीं, उसकी विश्वसनीयता भी परखी जाएगी। अमित शाह की रणनीति भाजपा को बढ़त दिला सकती है, लेकिन जीत की गारंटी नहीं। इसी तरह सपा, बसपा और कांग्रेस का भाजपा विरोध भी अपने आप में सत्ता परिवर्तन का प्रमाण नहीं है।
आखिरकार, चक्रव्यूह अमित शाह रचें या विपक्ष अपनी बिसात बिछाए, फैसला जनता को करना है। राजनीतिक दलों की असली ‘सेटिंग’ अगर होनी चाहिए, तो जनता के साथ और उसका प्रमाण चुनावी वादों में नहीं, जमीन पर किए गए काम में दिखना चाहिए।

