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    महत्वपूर्ण ये नहीं कि रावण कितना बड़ा विद्वान था।

    Devanand SinghBy Devanand SinghOctober 27, 2026No Comments3 Mins Read
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    महत्वपूर्ण ये नहीं कि रावण कितना बड़ा विद्वान था।
    महत्वपूर्ण ये है कि विद्वान होकर भी आदमी रावण बन सकता है।

    इंद्र यादव/मुंबई! अरे भई, ज़रा ठंडे दिमाग से सोचो! सदियों से हम एक ही रट लगाते आ रहे हैं—”अरे, रावण बहुत बड़ा विद्वान था भाई! चारों वेदों का ज्ञाता, ज्योतिष का पक्का खिलाड़ी, और महाज्ञानी शिवभक्त।” लोग आज भी उसकी विद्वान होने की डींगें हांकते हैं।
    लेकिन आज के इस ज़माने में, जहाँ मुंबई की लोकल ट्रेन की तरह हर कोई बस आगे निकलने की भागदौड़ में लगा है, असली मुद्दा वो है ही नहीं! असली और सबसे बड़ा कड़वा सच तो यह है कि एक पढ़ा-लिखा विद्वान आदमी भी ‘रावण’ बन सकता है… बल्कि कई बार तो बनता ही वही है!
    आजकल चारों तरफ ऐसे ‘तेज़ दिमाग’ लोगों की भरमार है। किसी के पास लंदन की डिग्री है, तो कोई बड़ी-बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों में सीईओ बैठा है। भाषण ऐसे झाड़ते हैं कि बड़े-बड़े ज्ञानी पानी मांग लें।
    मगर भाईसाहब, असली लोच कहाँ है? लोच इनकी नीयत और अक्कल के इस्तेमाल में है!
    जब दिमाग में ज्ञान भर जाता है और दिल में अहंकार, तब इंसान भूल जाता है कि जमीन पर कैसे पैर रखते हैं। उसे लगने लगता है कि “मुझसे ज़्यादा समझदार इस दुनिया में कोई पैदा ही नहीं हुआ।” बस, यहीं से उस इंसान के भीतर का ‘रावण’ जाग जाता है। फिर वो ज्ञान का इस्तेमाल लोगों की भलाई के लिए नहीं, बल्कि दूसरों को कुचलने, उन्हें छोटा दिखाने और अपना उल्लू सीधा करने के लिए करता है।
    सोचिए ज़रा, क्या रावण सिर्फ त्रेतायुग में था! बिल्कुल नहीं! बस उसका हुलिया और स्टाइल बदल गया है।
    पुराना रावण: दस सिर और बीस हाथ लेकर घूमता था, सीताजी का हरण करके ले गया था।
    आज का रावण: ब्रांडेड सूट पहनता है, एसी केबिन में बैठकर फाइलें चलाता है, और दूसरों की मेहनत, उनका हक़ और उनका भरोसा चुरा लेता है।
    फर्क सिर्फ इतना है कि पहले वाले के पास सोने की लंका थी, और आज वाले के पास बैंक बैलेंस, पावर और पोजीशन का घमंड है। अक्कल दोनों के पास कूट-कूट कर भरी थी, लेकिन दोनों का पतन अहंकार की वजह से ही हुआ।
    सिर्फ बड़ी डिग्रियां या भारी-भरकम ज्ञान इंसान को ‘महान’ नहीं बनाते। महान इंसान बनता है अपने संस्कारों से, अपनी इंसानियत से और अपनी विनम्रता से।
    ज्ञान और डिग्रियां तो महज़ एक हथियार जैसी हैं। अब ये आपके ऊपर है कि आप उस हथियार से किसी का घर बसाते हो या किसी की छाती पर मूंग दलते हो।
    इसलिए भाई, पढ़ाई करो, तरक्की की सीढ़ियाँ चढ़ो, आसमान छूओ… लेकिन इस बात को कभी मत भूलना कि दिमाग में चाहे जितनी भी बड़ी-बड़ी डिग्रियां हों, छाती में अहंकार का रावण नहीं पलना चाहिए!
    दिमाग का ज्ञानी होना आसान है, इंसान का ज्ञानी होना मुश्किल… और जब अहंकार सिर पर चढ़ जाए, तो बड़े-बड़े वेदों के ज्ञाता भी राख बन जाते हैं!

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