केवल राजनीतिक रिवाज़ बनकर न रह जाए शीतकालीन सत्र – देवानंद सिंह
भारत की संसद का शीतकालीन सत्र हर बार इसलिए महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यह वर्ष के अंत में उस दिशा का संकेत देता है, जिसमें आने वाले महीनों में राजनीति और नीति निर्माण आगे बढ़ने वाले होते हैं। इस बार का सत्र उस अर्थ में और भी निर्णायक है कि केंद्र सरकार हालिया विधानसभा चुनावों में सफलता पाकर संसदीय एजेंडा को तेज़ी से लागू करना चाहती है, जबकि विपक्ष चुनावी पराजयों से उबरने की कोशिश करते हुए नए मुद्दों पर खुद को प्रासंगिक बनाए रखना चाहता है। परिणामस्वरूप, सत्र की शुरुआत से ही टकराव, संदेश और राजनीतिक रणनीति तीनों समानांतर रूप से दिखाई देते हैं।
सत्र के पहले ही दिन एसआईआर और वोट चोरी के आरोपों को लेकर विपक्ष ने दोनों सदनों में जमकर हंगामा किया। वर्षों से यह प्रवृत्ति सामने आ रही है कि विपक्ष अपनी प्राथमिकताओं को केंद्र में लाने के लिए संसदीय उपकरणों की बजाय हंगामे को ज्यादा प्रभावी मानता है। वास्तविकता यह है कि ऐसा करने से न तो विपक्ष की स्थिति मजबूत होती है और न ही सरकार पर किसी सार्थक दबाव का निर्माण हो पाता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में बहस वह मुख्य माध्यम है, जिसके जरिए कानूनों का परीक्षण होता है और जनता की आवाज़ सदन तक पहुंचती है, लेकिन लगातार शोरगुल, नारेबाज़ी और स्थगन इस प्रक्रिया को क्षति पहुंचाते हैं।
पहले ही दिन लोकसभा की कार्यवाही दिनभर के लिए स्थगित हो जाना इसी विफलता का उदाहरण है। यह विडंबना है कि जिस मुद्दे को विपक्ष गंभीर बताने की कोशिश करता है, उसी मुद्दे पर बहस की अनुमति खुद विपक्ष के आक्रामक व्यवहार के कारण नहीं मिल पाती।
सत्र शुरू होने से पहले प्रधानमंत्री द्वारा मीडिया से की गई टिप्पणी ने एक प्रतीकात्मक दिशा अवश्य तय कर दी। उन्होंने विपक्ष को रचनात्मक भूमिका निभाने का आह्वान किया और संसद को संघर्ष का नहीं, नीति निर्माण का मंच बताया। उनकी बातों का सार यह था कि संसद में दिखावे से ज्यादा कामकाज होना चाहिए, और बहस मुद्दों पर केंद्रित हो।
यही राजनीतिक संकेत है, और सरकार यह दर्शाना चाहती है कि उसका एजेंडा व्यवस्थित है, और उसे संसद में बाधा की अपेक्षा सहयोग की जरूरत है। सरकार के लिए यह रणनीति इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि आने वाले महीनों में कई बड़े विधेयक और नीतिगत बदलाव प्रस्तावित हैं, जिनका गंभीर परीक्षण होना अनिवार्य है। राज्यसभा में नए सभापति के स्वागत के दौरान विपक्ष के नेता खड़गे ने अचानक इस्तीफा देने वाले पूर्व सभापति को फेयरवेल न मिलने पर असंतोष जताया। यह मुद्दा सतही तौर पर भावनात्मक प्रतीत हो सकता है, लेकिन इसके पीछे गहरी चिंता संसदीय परंपराओं को लेकर है। भारतीय संसद में पद का सम्मान और प्रक्रिया का पालन हमेशा उसकी गरिमा का आधार रहा है। ऐसे में, किसी शीर्ष पदाधिकारी के विदा होने की परंपरागत प्रक्रियाएं न पूरी होना वाकई एक गंभीर संकेत है, हालांकि सत्ता पक्ष ने इसे विपक्ष की राजनीतिक निराशा से जोड़कर खारिज कर दिया। यह प्रतिक्रिया बताती है कि संसद के भीतर हो रही बहसें केवल मुद्दों पर आधारित नहीं हैं, बल्कि राजनीतिक मनोस्थिति और चुनावी परिणामों का प्रभाव भी उन पर हावी है, इसीलिए सत्ता पक्ष विपक्ष की हर आलोचना को पराजयजनित निराशा बताकर हटने की कोशिश करता है, जबकि विपक्ष सत्ता पक्ष की हर टिप्पणी को अहंकार के रूप में प्रस्तुत करता है।
हंगामों के बीच भी सदन में कुछ महत्त्वपूर्ण विधायी कार्य हुआ। मणिपुर गुड्स एंड सर्विस टैक्स (दूसरा संशोधन) बिल का पारित होना यह दर्शाता है कि क्षेत्रीय-संवेदनशील मुद्दों को लेकर सरकार अधूरे राज्य के ढांचे में सुधार करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहती है। इसी प्रकार उत्पाद शुल्क संशोधन और स्वास्थ्य सुरक्षा जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा सेस से जुड़े विधेयक सरकार के राजस्व ढांचे के पुनर्गठन की ओर इशारा करते हैं।
इन दो विधेयकों से यह भी स्पष्ट है कि सरकार भविष्य में तंबाकू, पान मसाला और अन्य स्वास्थ्य-हानिकारक उत्पादों पर कर-वृद्धि को एक बड़ा नीति आधार बनाना चाहती है। यह जन-स्वास्थ्य की दिशा में उठाया गया कदम है, किंतु इसका वास्तविक प्रभाव राज्यों के राजस्व, उत्पाद उद्योग और छोटे उत्पादकों पर पड़ने वाले परिणामों पर निर्भर करेगा। इसके अलावा, दो महत्वपूर्ण संसदीय समितियों को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए अतिरिक्त समय दिया गया। दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता पर संशोधन का मसौदा हो या जन विश्वास बिल, ये दोनों ऐसे व्यापक सुधार हैं, जो देश में उद्यमिता वातावरण को प्रभावित करने वाले हैं, हालांकि इन सुधारों का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब समिति की रिपोर्टों और विपक्षी चिंताओं पर गहराई से चर्चा हो सके।
भारतीय लोकतंत्र में विपक्ष संसद का एक अनिवार्य स्तंभ है। वह सरकार को जवाबदेह बनाने का उपकरण है, न कि केवल असंतोष का माध्यम, लेकिन वर्षों से विपक्ष अपनी रणनीति में स्पष्टता की कमी से जूझता रहा है। चाहे वो मुद्दों की प्राथमिकता हो, सदन में प्रभावी दलीलें प्रस्तुत करना हो, या सरकार को मजबूती से घेरने की रणनीति हर मोर्चे पर विपक्ष अक्सर प्रतिक्रिया-प्रधान होता है, न कि एजेंडा-निर्माता।
सत्र के पहले दिन का हंगामा इस कमजोरी का एक और उदाहरण है। अगर, विपक्ष एसआईआर या चुनावी अनियमितताओं के मुद्दे को गंभीर मानता है, तो उसे स्थगन के बजाय विस्तृत बहस की मांग करनी चाहिए थी। सदन का मंच वह स्थान है जहां तर्क, आकंड़ों और सवालों के माध्यम से सरकार पर दबाव बनाया जा सकता है, लेकिन जब बहस ही नहीं होगी, तो सवाल उठाने वाला भी कमजोर पड़ेगा और जवाब देने वाला भी।
दूसरी ओर, सरकार के सामने चुनौती यह है कि वह अपने संख्याबल के इतर सहमति की राजनीति भी साधे। भारतीय संसद की संरचना बहुमत के निर्णय पर आधारित जरूर है, लेकिन उसकी आत्मा सहमति और संवाद में निहित है। सरकार यदि बड़े सुधार लागू करना चाहती है, तो उसे विपक्ष को सहयोगी बनाना ही होगा, भले ही प्रतीकात्मक स्तर पर ही क्यों न हो। संसदीय समितियों की भूमिका को मजबूत करना, विपक्षी सदस्यों को विधेयक निर्माण में शामिल करना और कुछ मुद्दों पर सांझा बयान देना ऐसी परंपराएं हैं जो आज भी बहुत प्रभावी हो सकती हैं।
प्रधानमंत्री का यह कहना कि सदन में नारे नहीं, नीतियां हों केवल विपक्ष के लिए संदेश नहीं है। यह संदेश सत्ता पक्ष पर भी उतना ही लागू होता है। यदि, सदन में शांतिपूर्ण और तथ्य-आधारित बहस चाहिए, तो सत्ता पक्ष को भी उकसावे या तीखी प्रतिक्रियाओं से बचना होगा। नए सभापति का चयन और स्वागत इस सत्र का एक स्थायी प्रभाव छोड़ने वाला कदम है। राज्यसभा वह मंच है, जहां दीर्घकालिक और गहन बहसें होती हैं। नए सभापति के सामने चुनौती यह है कि वे सदन की गरिमा और संतुलन को बनाए रखते हुए हंगामों पर नियंत्रण रखें।
विपक्ष की चिंताओं को सुनने की क्षमता और सदन में अनुशासन बनाए रखने की सख़्ती, यह दोनों गुण बेहद आवश्यक हैं। पिछले वर्षों में हमने देखा है कि सभापति का व्यक्तिगत आचरण और उनकी निष्पक्षता का आकलन राजनीतिक बहसों का एक बड़ा विषय बन गया है, इसलिए नए सभापति के लिए यह जिम्मेदारी और भी महत्वपूर्ण है कि वे अपने पद की गरिमा को सबसे ऊपर रखें।
सत्र लगभग तीन सप्ताह का है, और इसमें कई ऐसे विधेयक शामिल हैं, जिनका सीधा संबंध आम लोगों के जीवन, देश की अर्थव्यवस्था और प्रशासनिक ढांचे से है। प्रश्न यह है कि सत्ता और विपक्ष दोनों क्या इस अवधि को केवल राजनीतिक संघर्ष की रणभूमि बनाए रखेंगे, या फिर इसे नीतिगत संवाद का अवसर? कुछ क्षेत्रीय दलों जैसे बीजेडी ने संकेत दिया है कि वे सत्र को रचनात्मक बनाने के पक्षधर हैं। इन दलों की भूमिका अक्सर संसद में मध्यस्थ और संतुलन साधने वाली होती है। यह उनके लिए भी अवसर है कि वे केंद्र-राज्य संबंधों, क्षेत्रीय जरूरतों और समावेशी नीति निर्माण पर अपनी भूमिका को मजबूत करें।
भारतीय संसद का हर सत्र लोकतंत्र की एक परीक्षा है। यह परीक्षा न सिर्फ सरकार की है, बल्कि विपक्ष की भी। पहले दिन का हंगामा, आरोप-प्रत्यारोप और तीखी टिप्पणियां इस ओर संकेत करती हैं कि दोनों पक्षों को अपनी प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। जनता उन मुद्दों पर समाधान चाहती है, जो उसके जीवन को प्रभावित करते हैं, महंगाई, रोजगार, सुरक्षा, आर्थिक सुधार, क्षेत्रीय असंतुलन और प्रशासनिक दक्षता।
यदि, संसद लगातार शोरगुल और स्थगन का मंच बनी रही, तो जनता का भरोसा संसदीय प्रक्रिया से कम होना स्वाभाविक है। यह गिरावट किसी एक दल या नेता की जिम्मेदारी नहीं होगी, यह पूरे राजनीतिक तंत्र की सामूहिक विफलता होगी, इसलिए अपेक्षा यही है कि शीतकालीन सत्र केवल एक राजनीतिक रिवाज़ बनकर न रह जाए, बल्कि ऐसा मंच बने जहां संवाद की ऊर्जा, नीति निर्माण की गंभीरता और लोकतांत्रिक परिपक्वता दर्शायी जा सके। भारत के लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती
नारे कम, नीतियां अधिक, संघर्ष कम, समाधान अधिक, और राजनीति कम, जनहित अधिक में निहित है, इसीलिए इसका पक्ष-विपक्ष दोनों को ध्यान रखना होगा।

