लेखक: देवनंद सिंह
आतंक के आकाओं के लिए अब सुरक्षित नहीं पाकिस्तान देवानंद सिंह पाकिस्तान वर्षों से आतंकवाद को अपनी रणनीतिक नीति का हिस्सा बनाकर चलता रहा है। भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल आतंकियों को वहां न केवल पनाह मिली, बल्कि उन्हें संरक्षण, प्रशिक्षण और संसाधन भी उपलब्ध कराए गए। लेकिन अब हालात बदलते दिखाई दे रहे हैं। पाकिस्तान और पीओके में लगातार हो रही रहस्यमयी हत्याओं ने यह संकेत दे दिया है कि आतंक का कारोबार चलाने वालों के लिए अब कोई जगह पूरी तरह सुरक्षित नहीं बची है। पुलवामा हमले के मास्टरमाइंड हमजा बुरहान की हत्या इसी श्रृंखला की ताजा कड़ी है। इससे पहले भी लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और अन्य आतंकी संगठनों से जुड़े कई बड़े चेहरे अज्ञात हमलावरों के निशाने पर आ चुके हैं। खास बात यह है कि इन घटनाओं की जिम्मेदारी कोई नहीं लेता, लेकिन हर नई हत्या पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था और उसकी आतंकवाद समर्थक नीति पर गंभीर सवाल खड़े कर देती है। दरअसल, पाकिस्तान लंबे समय तक यह मानता रहा कि आतंकवाद को “रणनीतिक हथियार” की तरह इस्तेमाल कर वह क्षेत्रीय दबाव बना सकता है। लेकिन इतिहास गवाह है कि आतंकवाद कभी किसी का स्थायी साथी नहीं होता। जिन तत्वों को कभी संरक्षण दिया गया, वही अब पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा और उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि के लिए सबसे बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं। इन घटनाओं का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू मनोवैज्ञानिक है। पाकिस्तान में छिपे आतंकियों और उनके आकाओं के बीच भय का वातावरण पैदा हो चुका है। लगातार हो रही टारगेट किलिंग ने यह संदेश दिया है कि सीमाओं के पीछे छिपकर आतंक फैलाने वाले अब पूरी तरह बेफिक्र नहीं रह सकते। हालांकि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून के दायरे और न्यायिक प्रक्रिया का महत्व सर्वोपरि होता है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक स्तर पर अब “शून्य सहिष्णुता” की नीति मजबूत होती जा रही है। दुनिया के कई देश अब आतंक को संरक्षण देने वाले नेटवर्क के खिलाफ कठोर रुख अपना रहे हैं। पाकिस्तान के लिए यह आत्ममंथन का समय है। यदि वह वास्तव में शांति और स्थिरता चाहता है, तो उसे आतंकवाद को संरक्षण देने की नीति पूरी तरह छोड़नी होगी। अन्यथा, आतंक के जिन बीजों को उसने दशकों तक सींचा है, वही उसके लिए लगातार अस्थिरता और भय का कारण बनते रहेंगे।

