प्रिय मित्र
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प्रिय मित्र,
सकुशल तो हो न?
कविता न लिखने की ठान कर भी,
मैंने फिर से कलम थाम ली है।
प्रिय मित्र,
भूला नहीं हूँ आज भी,
हृदय की तूलिका (कूची) से उकेरे गए,
अपने प्रेम, अपने गाँव और अपने खेतों को।
प्रिय मित्र,
आज भी संजोकर रखा है,
अपने इस वीरान हृदय में,
अपने प्रेम, अपने गाँव और अपने खेतों को।
प्रिय मित्र,
एक दिन इन्हीं धड़कनों ने,
सिखाया था मेरे प्रेम, मेरे गाँव और मेरे खेतों को,
हरियाली की फसल से लहलहाना।
पर आज, घोर अनिश्चितता के बीच,
मैंने शहर के इस अकेलेपन को गले लगा लिया है।
प्रिय मित्र,
अपने प्रेम, अपने गाँव, अपने खेतों,
अपने चाँद और जुगनुओं से,
मुझे कोई बदले में कुछ नहीं चाहिए।
प्रिय मित्र,
मेरा प्रेम, मेरा गाँव, मेरे खेत,
ये सब तो बस मेरी कलम के होठों से,
निसृत (बहती) हुई एक कविता हैं।
मूल लेखिका
मनीषा शर्मा
अनुवादक:– रितेश शर्मा
पता- जलुकबाड़ी, गुवाहाटी

