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    Home » दक्षिण एशिया में सैन्य रणनीति के नए युग का सूत्रपात
    Breaking News Headlines संपादकीय

    दक्षिण एशिया में सैन्य रणनीति के नए युग का सूत्रपात

    News DeskBy News DeskJune 13, 2025No Comments5 Mins Read
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    देवानंद सिंह
    भारत और पाकिस्तान के बीच मई 2025 में हुआ चार दिवसीय सैन्य संघर्ष भले ही सीमित था, लेकिन इसके प्रभाव बहुआयामी रहे। यह केवल सीमा पर गोलाबारी या हवाई टकराव भर नहीं था, बल्कि इसने दक्षिण एशिया में सैन्य रणनीति के नए युग का सूत्रपात किया। इस टकराव के बाद दोनों देशों के रक्षा प्रतिष्ठानों में तेज़ी से पुनर्मूल्यांकन हुआ, और विशेषकर वायु शक्ति के क्षेत्र में तकनीकी क्रांति की दौड़ तेज हो गई। यह होड़ अब स्टेल्थ टेक्नोलॉजी और फिफ्थ जनरेशन फाइटर जेट्स की है,  यानी अदृश्य युद्धक विमानों की। इस नई प्रतिस्पर्धा ने युद्ध की परंपरागत परिभाषाओं को बदल दिया है और अब यह टैंक, मिसाइल या परमाणु बम की नहीं, बल्कि ‘कौन अधिक देख सकता है और कौन कम दिखाई देता है’ की लड़ाई बन गई है। भारत ने मई 2025 के अंतिम सप्ताह में अपने रक्षा क्षेत्र में एक ऐतिहासिक कदम उठाया, जिसके अंतर्गत स्वदेशी फिफ्थ जनरेशन स्टेल्थ फाइटर जेट परियोजना को मंज़ूरी दी गई। इस परियोजना का नेतृत्व एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी कर रही है, और इसमें निजी क्षेत्र को निर्णायक भागीदारी दी जा रही है। यह निर्णय आत्मनिर्भर भारत अभियान के सैन्य संस्करण का प्रतीक है।

    भारत का AMCA (Advanced Medium Combat Aircraft) प्रोजेक्ट पहले से ही विकास के चरण में है, और अब इसे नीतिगत और वित्तीय समर्थन भी मिलने लगा है। यह स्वदेशी प्रयास भारत को दीर्घकालिक रणनीतिक आत्मनिर्भरता की ओर ले जा सकता है, लेकिन रास्ता आसान नहीं है। भारत के सामने यह भी बड़ा प्रश्न है कि क्या वह AMCA के समानांतर रूस के SU-57 या अमेरिका के F-35 जैसे पहले से ऑपरेशनल स्टेल्थ जेट्स को भी हासिल करने की कोशिश करे? अमेरिका की ओर से F-35 की पेशकश राजनीतिक जटिलताओं से भरी है, खासकर रूस से भारत की S-400 डील के बाद। वहीं, SU-57 पर प्रदर्शन और प्रौद्योगिकीय विश्वसनीयता को लेकर संदेह हैं, इसलिए भारत के लिए अब प्राथमिक रणनीति यही होनी चाहिए कि वह AMCA जैसे स्वदेशी प्लेटफॉर्म को निर्णायक रूप से विकसित करे, और आवश्यकतानुसार सीमित संख्या में विदेशी स्टेल्थ जेट्स भी हासिल करे ताकि अंतरिम सामरिक संतुलन बना रहे।

    पाकिस्तान ने इस क्षेत्रीय होड़ में अपनी पारंपरिक रणनीति को ही दोहराया है। यानी चीन के साथ गहरे सैन्य सहयोग पर भरोसा कायम किया है। पाकिस्तान सरकार की ओर से ‘एक्स’ (पूर्व ट्विटर) पर यह दावा किया गया कि चीन ने उसे 40 J-35 स्टेल्थ जेट, KJ-500 AEW&C, 19 HQ डिफेंस सिस्टम और 3.7 अरब डॉलर की सहायता का प्रस्ताव दिया है, हालांकि इस दावे की चीन द्वारा पुष्टि नहीं की गई, लेकिन ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट और चीनी रक्षा कंपनियों के शेयरों में उछाल इस सहयोग की संभावनाओं को बल देते हैं। AVIC शेनयांग द्वारा निर्मित J-35 चीन का अगली पीढ़ी का स्टेल्थ जेट है, जो अमेरिका के F-35 की टक्कर में माना जाता है। यदि, पाकिस्तान को J-35 और KJ-500 जैसे प्लेटफॉर्म मिलते हैं, तो यह पाकिस्तान को पहली बार स्टेल्थ और नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर की दुनिया में प्रवेश देगा, एक ऐसा क्षेत्र जहां भारत अभी तक अग्रणी था।

    यह तकनीकी छलांग भारत के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है, खासकर जब यह चीन-पाकिस्तान सैन्य गठबंधन की पृष्ठभूमि में हो रही हो। फिफ्थ जनरेशन जेट्स केवल हवाई युद्धक विमान नहीं हैं, वे एक संपूर्ण युद्ध प्रणाली हैं। इनकी विशेषताएं उन्हें पारंपरिक चौथी पीढ़ी के विमानों से बहुत आगे ले जाती हैं। इन विमानों की संरचना रडार से बचने के लिए डिजाइन की जाती है। रडार-अवशोषक सामग्री, खास कोणों वाला ढांचा और आंतरिक हथियार प्रणाली इनकी पहचान को न्यूनतम कर देती है।

    रडार, इंफ्रारेड सिस्टम, कम्युनिकेशन और फायर कंट्रोल सिस्टम का एकीकरण पायलट को 360 डिग्री की सिचुएशनल अवेयरनेस देता है। बिना आफ्टरबर्नर के सुपरसोनिक गति प्राप्त करना इन्हें ईंधन दक्षता और उच्च गति बनाए रखने में सक्षम बनाता है। ये विमान अन्य विमानों, ड्रोन, ग्राउंड कंट्रोल और AEW&C प्लेटफॉर्म से जुड़कर युद्ध को एकीकृत नेटवर्क में बदल देते हैं, इन्हें इंफ्रारेड और रेडियो ट्रैकिंग से बचाना आसान नहीं होता, जिससे दुश्मन की पहचान प्रणाली विफल हो जाती है। अगर, पाकिस्तान J-35 और KJ-500 को अपनी वायुसेना में शामिल कर लेता है, तो यह भारत के लिए एक ‘टू-फ्रंट एयर पावर थ्रेट’ बन जाएगा। चीन पहले से पूर्वी सीमा पर चुनौती बना हुआ है। पाकिस्तान की वायुशक्ति में यह तकनीकी छलांग उसे भारत की पश्चिमी सीमा पर भी स्टेल्थ क्षमताओं वाला प्रतिद्वंद्वी बना देगी।

    यह तकनीकी-सामरिक गठबंधन भारत के लिए कूटनीतिक स्तर पर भी चिंता का विषय है, क्योंकि इसमें चीन की तकनीक और पाकिस्तान की ज़मीन का संयोजन दोनों मोर्चों पर भारत की सतर्कता को बढ़ाता है।
    इस समय भारत के सामने तीन विकल्प हैं, जो दीर्घकालिक दृष्टि से निर्णायक हो सकते हैं। इनमें पहला,
    AMCA प्रोजेक्ट को प्राथमिकता देना, इसमें सार्वजनिक और निजी भागीदारी का विस्तार कर अनुसंधान एवं उत्पादन समयबद्ध ढंग से तेज किया जाना चाहिए।
    दूसरा, स्वदेशी तकनीक रडार, इंजन, कंपोज़िट। भारत को इंजन निर्माण, स्टेल्थ रडार और एडवांस कंपोज़िट मटीरियल पर विशेष अनुसंधान केंद्र स्थापित करने चाहिए, जिससे विदेशी तकनीक पर निर्भरता घटे। तीसरा,
    AI और डिजिटल वॉरफेयर में निवेश, क्योंकि फिफ्थ जनरेशन विमानों की असली शक्ति उनके डेटा प्रोसेसिंग और नेटवर्किंग क्षमताओं में होती है। भारत को AI आधारित युद्ध प्रबंधन प्रणाली, कनेक्टेड बैटल ग्रिड और साइबर-सुरक्षा को सामरिक रणनीति में शामिल करना होगा।

    कुल मिलाकर, वर्तमान में चल रही भारत-पाकिस्तान की प्रतिस्पर्धा अब सिर्फ़ सैन्य ताक़त की नहीं, बल्कि तकनीकी नेतृत्व की है। फिफ्थ जनरेशन स्टेल्थ जेट्स का अधिग्रहण और विकास आने वाले वर्षों में इस क्षेत्र की हवाई शक्ति के संतुलन को परिभाषित करेगा। यह दौर युद्धक विमानों की संख्या का नहीं, उनकी गुणवत्ता और अदृश्यता का है। भारत के पास संसाधन, वैज्ञानिक प्रतिभा और रणनीतिक दृष्टि है, आवश्यकता केवल संकल्प, समन्वय और समयबद्ध कार्यान्वयन की है।
    अगर, भारत इस तकनीकी युद्ध में आत्मनिर्भरता और नवाचार के पथ पर लगातार आगे बढ़ता है, तो वह न केवल दक्षिण एशिया में बल्कि वैश्विक स्तर पर एक स्टेल्थ शक्ति बनकर उभरेगा।

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