
लेखक: देवानंद सिंह
शराब माफिया के आगे बेबस कानून के रखवाले, आखिर पुलिसकर्मियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी?
यह शहादत नहीं, कानून-व्यवस्था पर सीधा हमला है!
मध्य प्रदेश के देवास में पुलिस निरीक्षक दिलीप पुरी की शराब माफिया द्वारा कथित रूप से वाहन से कुचलकर हत्या किए जाने की घटना बेहद शर्मनाक और चिंताजनक है। यह सिर्फ एक पुलिस अधिकारी की मौत नहीं, बल्कि कानून के इकबाल को चुनौती देने वाली वारदात है। अपने अधीनस्थ अधिकारी के पार्थिव शरीर को कंधा देते हुए देवास के एसपी आदित्य मिश्रा की नम आंखें उस दर्द को बयां कर रही हैं, जिसे शब्दों में व्यक्त करना मुश्किल है।
सवाल है कि आखिर अपराधियों के हौसले इतने बुलंद कैसे हो रहे हैं कि वे कानून के रखवालों को ही निशाना बनाने लगे हैं? क्या शराब माफिया को कानून का कोई भय नहीं रह गया है? अवैध कारोबार के पीछे राजनीतिक संरक्षण और प्रशासनिक मिलीभगत की आशंकाओं की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
कानून-व्यवस्था और सुरक्षा पर गंभीर सवाल
इस घटना से देश की सभी राज्य सरकारों को सबक लेने की जरूरत है। माफिया किसी भी राजनीतिक दल से जुड़ा हो, किसी भी सत्ता का संरक्षण प्राप्त करता हो, उसकी पहचान केवल एक है वह माफिया है। अपराध का कोई राजनीतिक रंग नहीं होना चाहिए और न ही सत्ता के प्रभाव में अपराधियों को बचाने की कोशिश होनी चाहिए। कानून की नजर में सभी समान हैं। सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन कानून का राज सर्वोपरि रहना चाहिए।
सरकार की जिम्मेदारी केवल श्रद्धांजलि देने तक सीमित नहीं हो सकती। दोषियों को कठोर सजा मिले, उनके राजनीतिक और आर्थिक नेटवर्क की जांच हो तथा पुलिसकर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। जब रक्षक ही सुरक्षित नहीं होंगे, तो आम नागरिकों की सुरक्षा की गारंटी कौन देगा? अब न्याय केवल आश्वासन में नहीं, ठोस कार्रवाई में दिखाई देना चाहिए।
मध्य प्रदेश की इस वीभत्स घटना ने एक बार फिर पूरे देश में खाकी की सुरक्षा पर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। राज्य के विभिन्न हिस्सों में अवैध शराब का कारोबार धड़ल्ले से चल रहा है, और जब कभी पुलिस इस पर लगाम कसने की कोशिश करती है, तो माफिया इस प्रकार के खूनी खेल खेलने से पीछे नहीं हटते हैं। स्थानीय प्रशासन और पुलिस मुख्यालय को मिलकर एक ठोस रणनीति तैयार करनी होगी ताकि भविष्य में ऐसी किसी भी घटना की पुनरावृत्ति न हो सके।
जनता की उम्मीदें केवल प्रशासनिक आश्ोवासनों से पूरी नहीं हो सकतीं। पुलिस विभाग के भीतर भी मनोबल बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि दोषियों के खिलाफ ऐसी नजीर पेश की जाए कि कोई भी अपराधी कानून के रखवालों पर हाथ उठाने की हिम्मत दोबारा न कर सके। न्याय की इस लड़ाई में मीडिया, न्यायपालिका और समाज तीनों को अपनी भूमिका पूरी ईमानदारी से निभानी होगी ताकि लोकतंत्र के इन स्तंभों की रक्षा की जा सके।

