
लेखक: राष्ट्र संवाद संवाददाता
बिहार में राजपूतों के राजनीतिक भरोसे पर सारण से भाजपा सांसद एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री राजीव प्रताप रूढ़ी ने छपरा में बड़ा बयान दिया है। छपरा में दिशा की बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि बिहार में राजपूतों का भरोसा किसी एक राजपूत नेता पर नहीं है। जिन राजनीतिक दलों को समाज ने समर्थन दिया, उन्हीं के भीतर आज समाज का एक वर्ग खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि राजपूत गद्दार नहीं होते, उनके इतिहास और बलिदान को समझने की जरूरत है। रूढ़ी के इस बयान को भाजपा के भीतर भी सामाजिक सम्मान और राजनीतिक हिस्सेदारी को लेकर उठते सवालों से जोड़कर देखा जा रहा है।
बिहार में राजपूतों के राजनीतिक भरोसे पर उठे सवाल
सारण, सिवान, गोपालगंज, चंपारण और महाराजगंज जैसे प्रमुख क्षेत्रों में राजपूत समाज का पारंपरिक राजनीतिक प्रभाव रहा है। इसके बावजूद मंत्री पद, संगठन में जिम्मेदारी और निर्णय प्रक्रिया में पर्याप्त भागीदारी को लेकर असंतोष की चर्चा होती रही है। बिहार विधानसभा में 32 राजपूत विधायकों और लोकसभा की छह सीटों पर राजपूत सांसदों की मौजूदगी के दावों के बीच समाज की वास्तविक राजनीतिक भागीदारी का सवाल भी उठ रहा है। सारण और तिरहुत विधान परिषद चुनावों में जदयू प्रत्याशियों की हार तथा प्रभुनाथ सिंह और पवन सिंह जैसे चेहरों की राजनीतिक सक्रियता ने इस विमर्श को और चर्चा में ला दिया है।
रूढ़ी का यह बयान किसी एक दल के खिलाफ सीधी राजनीतिक घोषणा भले न हो, लेकिन इसने बिहार की राजनीति में राजपूत समाज के सम्मान, प्रतिनिधित्व और राजनीतिक भरोसे की बहस को तेज कर दिया है। अब राजनीतिक दलों के सामने यह बड़ी चुनौती है कि चुनाव के समय मिलने वाले समर्थन को चुनाव के बाद भी सम्मान और हिस्सेदारी में कैसे बदलते हैं। बिहार की राजनीति में इस वर्ग की नाराजगी को दूर करना सभी दलों के लिए एक बड़ी प्राथमिकता बन गया है।
राजनीतिक दलों के लिए सम्मान और हिस्सेदारी की चुनौती
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब तक राजनीतिक दल समाज के इतिहास और बलिदान का सही सम्मान नहीं करेंगे, तब तक विश्वास का यह संकट बना रहेगा। राजीव प्रताप रूढ़ी के इस बयान ने पार्टी के भीतर और बाहर दोनों जगह नई हलचल पैदा कर दी है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि विभिन्न राजनीतिक दल इस असंतोष को दूर करने के लिए क्या कदम उठाते हैं। बिहार की सियासत में जातियों का समीकरण हमेशा से महत्वपूर्ण रहा है और ऐसे में राजपूत समाज की नाराजगी किसी भी दल के लिए भारी पड़ सकती है।
छपरा की इस घटना के बाद से ही राज्य के राजनीतिक गलियारों में बैठकों और चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। स्थानीय नेताओं से लेकर बड़े दिग्गजों तक इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। बिहार की राजनीति में इस समय यह सबसे बड़ा चर्चा का विषय बना हुआ है कि क्या आने वाले चुनावों में इस वर्ग का रुख बदलेगा या राजनीतिक दल इन्हें मनाने में कामयाब होंगे।

