योगी को संघ के अप्रत्यक्ष समर्थन के माध्यम से ‘दिल्ली’ को एक सधे हुए राजनीतिक संदेश के मायने
देवानंद सिंह
उत्तर प्रदेश की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। हाल ही में लखनऊ में आयोजित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की उच्च स्तरीय बैठक और उसके बाद राज्य तथा राष्ट्रीय राजनीति में आए उतार-चढ़ाव इस बात के संकेत हैं कि भाजपा की सबसे बड़ी प्रयोगशाला अब उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकती है। इतना ही नहीं, दिल्ली में चल रही संघ की बैठक में जिस तरह यह संदेश मिल रहा कि दिल्ली से यूपी को हांकने की कोशिश न की जाए, वह एक सधा हुआ राजनीतिक संदेश है, जिसमें दिल्ली को चेताया गया है, और योगी को अप्रत्यक्ष समर्थन दिया गया है।

भले ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सार्वजनिक रूप से राजनीतिक टिप्पणियों से दूरी बनाकर चलता हो, लेकिन लखनऊ में संघ की गोपनीय बैठक, और उसके पश्चात् संघ कार्यकर्ताओं की दिल्ली में 72 घंटे की गहन गतिविधि, इस बात को स्पष्ट कर देती है कि संघ अब मूकदर्शक नहीं रहेगा।
सूत्रों के अनुसार, मोहन भागवत ने यह स्पष्ट किया है कि योगी आदित्यनाथ सिर्फ भाजपा के नहीं, बल्कि संघ के राजनीतिक विस्तारवाद का प्रतीक हैं। एक मठाधीश मुख्यमंत्री, जो कठोर निर्णयों के लिए जाने जाते हैं, और जिनके पीछे प्रदेश भर का हिन्दू वोटबैंक खड़ा है, उन्हें दिल्ली से ‘सामूहिक नेतृत्व’ के नाम पर नियंत्रित करना संघ को स्वीकार नहीं है।

यह केवल समर्थन नहीं, एक राजनीतिक परोक्ष असहमति है, विशेषकर उस दिल्ली भाजपा नेतृत्व के प्रति, जो उत्तर प्रदेश में संगठन के नाम पर ‘केंद्र-निर्देशित मॉडल’ लागू कर रहा है। संघ की असहमति का एक बड़ा कारण यह भी बताया जा रहा है कि योगी आदित्यनाथ जैसे मजबूत जनाधार वाले मुख्यमंत्री को डिप्टी सीएम की आवश्यकता क्यों पड़ी? संघ का मानना है कि इससे न केवल नेतृत्व का अवमूल्यन होता है, बल्कि यह एक तरह से भाजपा की ‘दिल्ली बनाम लखनऊ’ रणनीति को उजागर करता है, जिसमें सत्ता का विकेंद्रीकरण दिखाकर, वास्तविक नियंत्रण केंद्र में ही रखा जाता है।

यह मॉडल गुजरात में सफल हो सकता है, लेकिन उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और सामाजिक रूप से जटिल राज्य में यह संघ की मूल रणनीति को कमजोर करता है। लोकसभा चुनाव 2024 में उत्तर प्रदेश में भाजपा को मिली अपेक्षाकृत कम सीटों ने कार्यकर्ताओं के मन में दिल्ली नेतृत्व को लेकर असंतोष भर दिया है। संघ से जुड़े कार्यकर्ता अब खुलकर कह रहे हैं कि दिल्ली से थोपे गए संगठन मंत्रियों ने जमीनी हकीकत को नजरअंदाज कर केवल डेटा-प्रबंधन और सोशल मीडिया के बल पर चुनावी रणनीति बनाई, जिसका परिणाम बुरी तरह असफल रहा।

आरएसएस के ही एक वरिष्ठ प्रचारक ने कहा, “भाजपा संगठन अब जनता से नहीं, एक्सेल शीट से चुनाव जीतना चाहता है।” यह गंभीर टिप्पणी सिर्फ रणनीति पर नहीं, पूरे नेतृत्व पर असहज प्रश्न खड़ा करती है। दक्षिण भारत की भाजपा एक बड़ी वैचारिक खाई के रूप में अब खुलकर सामने आ रही है, जहां संघ की उपस्थिति अपेक्षाकृत सीमित है, और उत्तर भारत की भाजपा, जहां आरएसएस अब भी अपने शाखा-आधारित नेटवर्क के बल पर निर्णायक भूमिका निभाता है।
संघ मानता है कि उत्तर भारत की राजनीति को उसके सांस्कृतिक-सामाजिक संदर्भों से काटकर दिल्ली केंद्रित कॉर्पोरेट राजनीति में नहीं ढाला जा सकता। संघ का यह रुख एक नए राष्ट्रीय संकट की ओर भी इशारा करता है।

अगर, यह खींचतान यूं ही जारी रहती है और योगी बनाम दिल्ली संघर्ष और गहराता है, तो 2027 के विधानसभा चुनावों में अखिलेश यादव के लिए अभूतपूर्व अवसर बन सकता है। सपा के एक रणनीतिकार का कहना है कि हमारे लिए सबसे बड़ा वरदान है भाजपा का आपसी असंतुलन। जब शिखर में फूट हो, तब ज़मीन जीतना आसान होता है।
अखिलेश यादव अब अधिक आक्रामक, संगठित और सांस्कृतिक प्रतीकों के साथ मैदान में उतर रहे हैं। यदि, भाजपा की यह अंदरूनी खींचतान जारी रही, तो वह न केवल सत्ता में वापसी कर सकते हैं, बल्कि अपने खोए जनाधार को फिर से प्राप्त भी कर सकते हैं।
एक महत्वपूर्ण सूत्र के अनुसार, संघ के भीतर अब यह आत्मविश्लेषण चल रहा है कि वह जिस ज़मीन पर खड़ा था, वह भाजपा की नई राजनीति के चलते खिसक रही है।
छत्तीसगढ़, झारखंड, राजस्थान जैसे राज्यों के सेवकों ने संघ नेतृत्व को यह बताया कि स्थानीय भाजपा नेता अब केवल सत्ता-लोलुपता के लिए काम कर रहे हैं, विचारधारा या समाजसेवा उनके लिए गौण हो गई है। 72 घंटे तक लगातार चले संवाद और फीडबैक से संघ प्रमुख आहत हुए हैं, और इसीलिए उन्होंने अब सीधे उत्तर प्रदेश में मोर्चा संभाल लिया है। मोहन भागवत को गोरखपुर और लखनऊ के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने स्पष्ट कर दिया कि राजधानी लखनऊ और दिल्ली के बीच समन्वय नहीं है।
राज्य स्तर पर कई निर्णय दिल्ली से आते हैं, जिन्हें कार्यकर्ता स्वीकार नहीं कर पा रहे। इसी वजह से जमीन पर भाजपा का काडर बेस कमजोर हो रहा है, और यह 2024 के चुनावों में दिख भी चुका है।

कुल मिलाकर, संघ ने योगी आदित्यनाथ को दिए अप्रत्यक्ष समर्थन के माध्यम से यह स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी भूमिका को किंगमेकर से हटाकर निर्णायक बनाना चाहता है। अगर, यह खींचतान यथावत रहती है, और भाजपा नेतृत्व इसे संगठनात्मक चुनौती समझने की बजाय व्यक्तिवादी प्रतिस्पर्धा मानता रहा, तो इसका सबसे बड़ा लाभ विपक्ष विशेषकर अखिलेश यादव को मिलेगा।

2017 में योगी का चयन संघ और भाजपा के बीच तालमेल का प्रतीक था, लिहाजा 2019 में इसकी परिणति अभूतपूर्व सफलता में हुई। 2022 में एक बार फिर सत्ता दोहराई गई, लेकिन 2024 में गिरावट और अंतर्विरोध ने यह दिखा दिया कि यह तालमेल अब बिगड़ रहा है। 2025 में संघ की सक्रियता और संकेत स्पष्ट हैं कि दिशा ठीक करो, नहीं तो 2027 की राह मुश्किल होगी। कुल मिलाकर, उत्तर प्रदेश अब सिर्फ भाजपा की सत्ता की प्रयोगशाला नहीं, संघ की राजनीतिक आत्मा की परीक्षा बन चुकी है। और यही परीक्षा यह तय करेगी कि 2027 में लखनऊ में कौन बैठेगा- योगी, अखिलेश या कोई तीसरा।

