क्या धनखड़ का इस्तीफ़ा स्वास्थ्य बहाना या एक राजनीतिक पुनर्संयोजन का संकेत?
देवानंद सिंह
भारत के 14वें उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने सोमवार को अपने पद से अचानक इस्तीफ़ा देकर राजनीतिक हलकों में जबरदस्त हलचल पैदा कर दी है। उन्होंने इस्तीफ़े का कारण ‘स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों’ को बताया, लेकिन इस तर्क को लेकर खुद सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों खेमों में शंका की गुंजाइश बनी हुई है। राजनीति में इस तरह के अचानक हुए निर्णय प्रायः सिर्फ़ एक निजी कारण से प्रेरित नहीं होते, इनके पीछे सत्ता समीकरण, आंतरिक असहमति और रणनीतिक पुनर्संरचना जैसे कारक भी सक्रिय रहते हैं। जगदीप धनखड़ की राजनीतिक पृष्ठभूमि और उनके कार्यकाल की प्रकृति को देखते हुए यह इस्तीफ़ा केवल एक स्वास्थ्य संकट के चलते आया हो, यह स्वीकार कर पाना राजनीतिक दृष्टि से कठिन है।

धनखड़ ने 11 अगस्त 2022 को भारत के उपराष्ट्रपति पद की शपथ ली थी। राज्यसभा के सभापति के रूप में उनका कार्यकाल शुरू से ही टकराव और विवादों से भरा रहा। यह टकराव न केवल विपक्षी दलों, बल्कि कई बार न्यायपालिका से भी रहा। अप्रैल 2025 में उनकी वह टिप्पणी विशेष रूप से विवादास्पद रही, जिसमें उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 142 की तुलना ‘परमाणु मिसाइल’ से की, जो न्यायपालिका के पास हमेशा लोकतांत्रिक संस्थाओं के विरुद्ध तैनात रहती है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रपति और राज्यपालों को विधेयकों पर मंज़ूरी देने की समयसीमा तय करने पर धनखड़ ने सार्वजनिक रूप से विरोध प्रकट किया, जो पद की गरिमा और न्यायपालिका-संविधान संतुलन के लिहाज़ से असाधारण था।

इन घटनाओं से उपराष्ट्रपति के रूप में उनकी ‘निरपेक्षता’ पर सवाल उठने लगे। यह आरोप लगाया गया कि वे सत्ता पक्ष की भाषा बोलते हैं और राज्यसभा के संचालन में स्पीकर जैसे पक्षपातपूर्ण रवैये को बढ़ावा देते हैं। शीतकालीन सत्र के दौरान इंडिया गठबंधन द्वारा लाया गया अविश्वास प्रस्ताव इसका प्रमाण था कि विपक्ष उनके व्यवहार से कितनी असहमति रखता है। धनखड़ ने अपने इस्तीफ़े के लिए स्वास्थ्य को कारण बताया, और वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी का भी मानना है कि यह कारण असत्य नहीं हो सकता है, क्योंकि वे हाल ही में अस्पताल में भर्ती हुए थे, लेकिन सवाल यह उठता है कि यदि स्वास्थ्य ही मुख्य वजह होती तो संसद के सत्र के ठीक पहले, या सत्र के बाद इस्तीफ़ा दिया जा सकता था। एक सक्रिय सत्र के बीच, बिना किसी सार्वजनिक चेतावनी या पूर्व सूचना के दिया गया इस्तीफ़ा राजनीतिक रूप से स्वाभाविक नहीं लगता।

कांग्रेस नेता जयराम रमेश का यह बयान कि शाम 5 बजे तक धनखड़ अन्य सांसदों के साथ थे और 7:30 बजे उन्होंने फोन पर बातचीत भी की थी, यह बताता है कि यह निर्णय उसी दिन अचानक लिया गया, जिसके पीछे तत्काल कोई राजनीतिक घटनाक्रम होना अधिक संभावित प्रतीत होता है। धनखड़ का राजनीतिक जीवन बहुपक्षीय रहा है। वे जनता दल से राजनीति में आए, फिर कांग्रेस में गए और अंततः 2003 में भारतीय जनता पार्टी का दामन थामा। वकील से राजनेता बने धनखड़ ने राजस्थान हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में वकालत की, और 1990 में केंद्रीय राज्य मंत्री के रूप में भी कार्य किया। 2019 में उन्हें पश्चिम बंगाल का राज्यपाल बनाया गया, जहां ममता बनर्जी सरकार के साथ उनका टकराव लगभग लगातार बना रहा।

उनकी सार्वजनिक छवि एक स्पष्टवादी, संविधान और सनातन धर्म के पक्षधर, किंतु विवादास्पद व्यक्ति की बन गई। यह छवि एक ओर सत्ता पक्ष की विचारधारा के साथ मेल खाती थी, लेकिन दूसरी ओर यह उन्हें ‘पोलाराइजिंग फ़िगर’ बना देती थी, एक ऐसा चरित्र जो सत्ता पक्ष के लिए भी रणनीतिक रूप से असहज बन सकता है। विशेषज्ञों ने सवाल उठाया कि क्या यह इस्तीफ़ा बीजेपी और आरएसएस के अंदरूनी समीकरणों से जुड़ा है? बीजेपी में लंबे समय से संगठनात्मक पुनर्गठन की अटकलें चल रही हैं। मौजूदा अध्यक्ष जेपी नड्डा का कार्यकाल कई बार बढ़ाया जा चुका है, लेकिन पार्टी में नए अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर स्पष्टता नहीं है। क्या जगदीप धनखड़ को संगठन में कोई नई भूमिका देने की योजना है? या फिर वे संगठन के कार्यपद्धति से असहज होकर अलग हुए हैं? साथ ही, यह भी संभव है कि 2026 या 2027 के आम चुनावों को ध्यान में रखते हुए बीजेपी एक ‘कूलिंग ऑफ़ पीरियड’ की रणनीति अपना रही हो, जिसमें विवादास्पद चेहरों को सार्वजनिक संस्थानों से हटाकर भविष्य के लिए तैयार किया जा रहा हो। यदि ऐसा है, तो धनखड़ का इस्तीफ़ा एक राजनीतिक पुनर्संयोजन का संकेत है।

धनखड़ पर लगातार आरोप लगता रहा कि वे राज्यसभा में निष्पक्षता की परंपरा को तोड़ते रहे। वे विपक्ष की बातों को ‘रिकॉर्ड से बाहर’ रखने की प्रक्रिया को सहजता से लागू करते दिखे। हाल ही में संसद के एक सत्र के दौरान जेपी नड्डा द्वारा यह कहना कि जो मैं कह रहा हूं वही रिकॉर्ड में जाएगा, एक गंभीर संकेत है, क्योंकि ऐसा कथन आमतौर पर सभापति द्वारा किया जाता है। यह घटनाक्रम दर्शाता है कि सत्ता पक्ष और सभापति की भूमिका में टकराव या उलझाव उत्पन्न हो रहा था।

कुल मिलाकर, धनखड़ का इस्तीफ़ा सिर्फ़ एक पद से नहीं, बल्कि एक भूमिका से दूरी का प्रतीक है, एक ऐसी भूमिका, जिसमें वे एक राजनीतिक संदेशवाहक की तरह काम कर रहे थे, लेकिन अब शायद उस संदेश को सत्ता के भीतर ही पुनर्परिभाषित किया जा रहा है। यह इस्तीफ़ा भारत की वर्तमान राजनीतिक संस्कृति में पारदर्शिता की कमी और संस्थागत संतुलन की चुनौतियों को उजागर करता है। धनखड़ ने भले ही अपने इस्तीफ़े को निजी और स्वास्थ्य से जुड़ा बताया हो, लेकिन प्रसंगवश यह एक सार्वजनिक और राजनीतिक निर्णय है, जिसकी पृष्ठभूमि में संविधान, सत्ता, संगठन और संतुलन जैसे कई तत्व मौजूद हैं। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि यह इस्तीफ़ा सत्ता के केंद्र में एक नई व्यवस्था की तैयारी है या किसी असहमति का सार्वजनिक रूपांतरण। फिलहाल, यह सिर्फ़ एक पद नहीं, बल्कि एक दौर के अंत की घोषणा है, और शायद एक नए दौर की भी शुरुआत हो।

