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    लोकतंत्र में जब रक्षक ही भक्षक बन जाए तो जनता का करणीय क्या है ?

    dhiraj KumarBy dhiraj KumarJanuary 26, 2026No Comments3 Mins Read
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    लोकतंत्र में जब रक्षक ही भक्षक बन जाए तो जनता का करणीय क्या है ?

    लोकतंत्र एक ऐसी शासन प्रणाली हैं जिसमें प्रत्येक नागरिक को नीतियाँ बनाने या सरकारी प्रतिनिधियों को चुनने का समान अधिकार होता है। लोकतंत्र में, सभी नागरिकों को कानूनों के प्रस्तावना, अधिनियम और कार्यान्वयन में भाग लेने का समान अधिकार होता हैं, जो जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के माध्यम से किया जाता है।

    लोकतंत्र में अगर रक्षक ही भक्षक बन जाए तो जनता का भी कुछ कर्तव्य है। सबसे पहले, हमें यह देखना होगा कि मतदान का अधिकार एक महत्वपूर्ण अधिकार हैं, जो हर नागरिक के पास हैं। प्रत्येक नागरिक को अपनी पसंद का प्रतिनिधि चुनने का अधिकार है। इसलिए, चुनावों में मतदान करना जनता का प्राथमिक कर्तव्य है। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना, सरकार के गलत कामों की आलोचना करना और उस पर सवाल उठाना जनता का अधिकार है। इससे सरकार जवाबदेह बनती है। शांतिपूर्ण आंदोलन में जनता भाग लें। अगर लोग सरकार के किसी भी कार्य से असंतुष्ट हैं, तो उन्हें शांतिपूर्ण आंदोलन करने का अधिकार है। लेकिन आंदोलन हिंसक नहीं होना चाहिए। लोकतंत्र में कानून का सम्मान ज़रूरी है। देश में व्यवस्था तभी बनी रह सकती है जब सभी लोग कानून का पालन करें।

    लोकतंत्र में लोगों का जागरूक होना ज़रूरी है। लोगों को देश के कानूनों, सरकारी नीतियों आदि के बारे में जानकारी होनी चाहिए और लोकतंत्र में समानता, स्वतंत्रता और न्याय के मूल्यों का समर्थन करना चाहिए। लोकतंत्र की सफलता के लिए यह ज़रूरी है कि लोग अपने कर्तव्यों का पालन करें। भारत के विविधतापूर्ण समाज में धर्म, जाति और क्षेत्र के आधार पर विभाजन की राजनीति ने लोकतंत्र की भावना को नुकसान पहुंचाया है तथा सांप्रदायिक झड़पों और घृणास्पद भाषणों ने समाज में विभाजन पैदा किया है।

    उदाहरण के लिए, हाल के वर्षों में धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों के विरुद्ध हिंसा की घटनाओं में वृद्धि हुई है, जो संविधान के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों को चुनौती देती हैं। ऐसी स्थितियाँ लोकतांत्रिक संवाद के माहौल को नष्ट करती हैं और लोगों में भय पैदा करती हैं। हालाँकि, कुछ सख्त कानूनों, जैसे कि गैरकानूनी गतिविधियाँ निवारण अधिनियम के दुरुपयोग ने नागरिकों के अधिकारों को प्रभावित किया है। सोशल मीडिया गलत सूचनाओं और दुष्प्रचार के ज़रिए जनमत को गुमराह कर रहा है।

    एक लोकतांत्रिक देश, भारत का इतिहास महान नेताओं और क्रांतिकारियों की गाथाओं से भरा पड़ा है। देश के संविधान की नींव डॉ. भीमराव अंबेडकर ने रखी थी। हम सभी इस देश के निवासी हैं जो अपने लोकतंत्र के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। यह देश विभिन्न धमों, जातियों, संस्कृतियों और परंपराओं से भरा हुआ है और विविधता में एकता की मिसाल पेश करता है। इसलिये इन्ही देश के रक्षकों को व्यक्तिगत हितों के विपरीत लोगों के हितों के लिए खुद को समर्पित करने में सक्षमता होनी चाहिए। लोकतांत्रिक वातावरण में स्थिरता और मजबूती बनाए रखने के लिए रक्षकों के लिए सभी पक्षों के शिष्टाचार, जिम्मेदारी की भावना और कर्तव्यनिष्ठा का पालन करना आवश्यक है। लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रखा जाना चाहिए और विकास में मौजूदा आचार संहिता का पालन किया जाना चाहिए। यदि रक्षकों की बुरी परंपराएँ जैसे अनैतिकता, कदाचार, असभ्य गतिविधियाँ आदि लोकतांत्रिक व्यवस्था को अस्थिर और बाधित करती हैं, तो आर्थिक विकास ठप हो जाता है और समाज में अराजकता पैदा होती है। इसलिए, यदि लोकतंत्र में रक्षक ही भक्षक हैं, तो लोगों के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है कि वे स्वस्थ और मजबूत लोकतंत्र के लिए सख्त आचार संहिता और शिष्टाचार का संदेश देने के लिए, जागरूकता बढ़ाने के लिए प्रजाओं द्वारा मजबूर किया जाना चाहिए ।

    लोकतंत्र में जब रक्षक ही भक्षक बन जाए तो जनता का करणीय क्या है ?
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