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    Home » झारखंड कांग्रेस की गुटबाजी एक चुनावी संकट
    Breaking News Headlines राष्ट्रीय संपादकीय

    झारखंड कांग्रेस की गुटबाजी एक चुनावी संकट

    Devanand SinghBy Devanand SinghSeptember 11, 2024No Comments5 Mins Read
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    झारखंड कांग्रेस की गुटबाजी एक चुनावी संकट
    देवानंद सिंह
    चुनावों के नजदीक आते ही झारखंड कांग्रेस में टिकटों को लेकर होड़ मचने लगी है, गुटबाजी का आलम यह है कि बात हाथापाई तक पहुंच गई है। ऐसा लग रहा है कि चुनाव आने तक और भी खराब स्थिति देखने को मिलेगी। पिछले दिनों प्रदेश अध्यक्ष कोल्हान के दौरे पर थे पश्चिम सिंहभूम और सरायकेला में तो सब कुछ ठीक था. पूर्वी सिंहभूम जिले में यह गुटबाजी जिस तरह उभरकर सामने आई है, उसने हाईकमान के सामने एक गंभीर चुनौती पेश की है। ऐसे में, देखना होगा कि इस समस्या को कैसे मैनेज किया जाता है।  पूर्वी सिंहभूम जिले में कांग्रेस के कई गुट दावेदारी कर रहे हैं। यहां जिले से लेकर प्रदेश और अखिल भारतीय स्तर पर भी लाबिंग जारी है, जिससे निश्चित ही कांग्रेसियों की एकता तार-तार हो रही है। कांग्रेस में चली आ रही गुटबाजी विधानसभा चुनाव के नजदीक आते-आते जिस तरह चरम पर पहुंच गई है, वह बिल्कुल भी अच्छा संकेत नहीं है।

     

     

    जिस तरह गत दिनों इस गुटबाजी के क्रम में बिष्टुपुर स्थित माइकल जॉन ऑडिटोरियम में आयोजित ‘संवाद आपके साथ’ कार्यक्रम में हंगामा और हाथापाई की घटना हुई, वह यह दर्शाती है कि हर गुट टिकट पाने को लेकर किसी भी हद तक जा सकता है। निश्चित ही यह आगामी विधानसभा चुनावों की दृष्टि से बिल्कुल भी उचित नहीं है। यह घटना न केवल पार्टी के भीतर की अराजकता को दर्शाती है, बल्कि यह भी स्पष्ट करती है कि आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को किस तरह के संकट का सामना करना पड़ सकता है। हैरान करने वाली बात यह है कि यह सब कुछ नव नियुक्त प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश, पूर्व विधायक जेपी पटेल, जिला की सह प्रभारी रमा खलको, पूर्व सांसद डॉ अजय कुमार, प्रदीप कुमार बलमुचू कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक चौधरी पूर्व जिला अध्यक्ष विजय खा ,अजय सिंह और जिला अध्यक्ष आनंद बिहारी दुबे की मौजूदगी में हुआ।

     

     

     

    कांग्रेस पार्टी की गुटबाजी ने लंबे समय से पार्टी की एकजुटता और प्रभावशीलता को कमजोर किया है। झारखंड कांग्रेस में यह समस्या विशेष रूप से गंभीर रूप लेती जा रही है, जहां पार्टी के विभिन्न गुट अपने-अपने नेता और कार्यकर्ताओं के समर्थन को लेकर अक्सर भिड़ जाते हैं। इस प्रकार की अंदरूनी कलह का सबसे बुरा असर पार्टी की चुनावी संभावनाओं पर पड़ेगा, क्योंकि इससे जनता के बीच एक नकारात्मक संदेश जाता है।

    ‘संवाद आपके साथ’ कार्यक्रम के दौरान हुए हंगामे की घटना इस बात को प्रदर्शित करती है कि पार्टी के भीतर की अंतर्विरोधों ने अब सार्वजनिक रूप से अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है। यह दृश्य न केवल पार्टी के भीतर की असहमति को उजागर करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि पार्टी के सदस्य किस हद तक एक-दूसरे से लड़ सकते हैं। जब पार्टी के सदस्य ही एक-दूसरे के खिलाफ इस तरह का व्यवहार करते हैं, तो इससे जनता का विश्वास भी प्रभावित होता है।

    आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को इस गुटबाजी का गंभीर नुकसान उठाना पड़ सकता है। चुनावी प्रचार के दौरान पार्टी की एकजुटता और संगठन की मजबूती महत्वपूर्ण होती है। गुटबाजी के कारण कांग्रेस पार्टी की प्रचार रणनीति कमजोर पड़ सकती है, क्योंकि विभिन्न गुट अपने-अपने नेता और कार्यक्रमों को प्राथमिकता देंगे, इससे पार्टी के चुनावी संदेश में असंगति उत्पन्न हो सकती है और यह चुनावी प्रचार के प्रभाव को कम कर सकती है।

     

     

     

    इसके अलावा, कांग्रेस पार्टी के भीतर की गुटबाजी मतदाताओं को भी नकारात्मक संदेश देगी। जब पार्टी के नेता और कार्यकर्ता ही एक-दूसरे के खिलाफ लड़ रहे होते हैं, तो मतदाता यह सोचने लगते हैं कि अगर ये लोग अपनी पार्टी के भीतर ही संगठित नहीं रह सकते, तो वे जनता के हित में क्या काम करेंगे? इस प्रकार की सोच से मतदाताओं का कांग्रेस पार्टी के प्रति विश्वास घट सकता है।

    वर्तमान में, कांग्रेस पार्टी को चाहिए कि वह इस गुटबाजी की समस्या का समाधान तत्काल तरीके से निकाले। पार्टी के नेताओं को चाहिए कि वे आपसी मतभेदों को सुलझाने के लिए एक मंच पर आकर काम करें और एकजुटता की भावना को प्रबल करें। इसके लिए पार्टी के भीतर आंतरिक संवाद और सामंजस्य को बढ़ावा देना आवश्यक है। केवल इस तरह ही कांग्रेस पार्टी अपनी चुनावी संभावनाओं को बेहतर बना सकती है और जनता का विश्वास पुनः प्राप्त कर सकती है।

    उम्मीद की जानी चाहिए कि कांग्रेस पार्टी इस संकट को समझेगी और अपनी चुनावी रणनीति में सुधार करेगी। अन्यथा, गुटबाजी की इस समस्या का असर न केवल विधानसभा चुनाव में बल्कि भविष्य में पार्टी की राजनीति पर भी पड़ सकता है। यह समय है कि कांग्रेस पार्टी अपने भीतर की समस्याओं को गंभीरता से ले और एक मजबूत और एकजुट नेतृत्व की दिशा में कदम बढ़ाए। इस प्रकार की गुटबाजी के खिलाफ एक ठोस रणनीति अपनाकर ही कांग्रेस पार्टी झारखंड में अपनी चुनावी संभावनाओं को सुरक्षित कर सकती है और आगामी विधानसभा चुनाव में प्रभावी प्रदर्शन कर सकती है।

    झारखंड कांग्रेस की गुटबाजी एक चुनावी संकट
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