स्वास्थ्य व्यवस्था में ‘सेवा’ नहीं, ‘सौदेबाजी’: गंभीर चेतावनी
ईमानदार नेतृत्व बनाम असहयोगी तंत्र: सुधार की राह में सबसे बड़ी बाधा
देवानंद सिंह
जमशेदपुर के स्वास्थ्य विभाग में रिटायर्ड नर्स से घूस मांगने के आरोप में एक क्लर्क का निलंबन महज एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि उस गहरी संस्थागत बीमारी का संकेत है जो सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को भीतर से खोखला कर रही है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि पीड़ित कोई प्रभावशाली व्यक्ति नहीं, बल्कि एक सेवानिवृत्त नर्स है जिसने जीवन भर सेवा दी और अंततः अपने ही वैध अधिकार के लिए भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ा।
‘राष्ट्र संवाद इनसाइड’ में सामने आई जानकारी कि एरियर भुगतान से लेकर मनचाही पोस्टिंग तक “फिक्स रेट” पर काम होता है। व्यवस्था में जड़ जमा चुकी दलाली और कमीशनखोरी की भयावह तस्वीर पेश करती है। जब स्वास्थ्य जैसा संवेदनशील विभाग इस प्रवृत्ति की चपेट में आ जाए, तो इसका असर केवल कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मरीजों की सेवा की गुणवत्ता और भरोसे पर भी पड़ता है।
यह भी उल्लेखनीय है कि आरोपित कर्मी पूर्व में भी भ्रष्टाचार के मामलों में निलंबित हो चुका है। इसके बावजूद उसी तंत्र में उसकी पुनः सक्रियता कई सवाल खड़े करती है क्या निगरानी तंत्र कमजोर है या फिर कहीं न कहीं संरचनात्मक शिथिलता है? सिविल सर्जन कार्यालय, पूर्वी सिंहभूम के यक्ष्मा विभाग से जुड़े इस प्रकरण ने प्रशासनिक साख को भी प्रभावित किया है।
हालांकि उपायुक्त पूर्वी सिंहभूम, सिविल सर्जन डॉ. साहिर पाल ने तत्काल मामले पर संज्ञान लेते हुए जांच कमेटी गठित की और जांच उपरांत आरोपी को तुरंत निलंबित किया, जिसकी चर्चा पूरे शहर में होने लगी है। इसके बावजूद ऐसी घटनाएं यह संकेत देती हैं कि सिस्टम के भीतर कहीं गहरी दरारें मौजूद हैं, जिनका लाभ उठाकर भ्रष्ट तत्व सक्रिय बने रहते हैं।
स्पष्ट है कि केवल निलंबन जैसे तात्कालिक कदम पर्याप्त नहीं होंगे। आवश्यकता है व्यापक और निष्पक्ष जांच की, जो पूरे नेटवर्क को सामने लाए। साथ ही, पारदर्शिता, जवाबदेही और तकनीकी निगरानी को सख्ती से लागू करना होगा। “जीरो टॉलरेंस” का दावा तभी सार्थक होगा, जब कार्रवाई निचले स्तर तक सीमित न रहकर पूरे तंत्र पर समान रूप से लागू हो।
राष्ट्र संवाद का मानना है कि यदि स्वास्थ्य विभाग में समय रहते ठोस सुधार नहीं किए गए, तो जनता का भरोसा डगमगाने लगेगा और यह किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा है। अब वक्त है कि शासन और प्रशासन दिखावटी कदमों से आगे बढ़कर वास्तविक सुधारों की दिशा में निर्णायक पहल करे, ताकि ‘सेवा’ का यह क्षेत्र फिर से अपने मूल उद्देश्य जनकल्याण की ओर लौट सके।

