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    Home » न्याय का विस्तार ही लोकतंत्र की असली कसौटी | राष्ट्र संवाद
    अपराध संपादकीय

    न्याय का विस्तार ही लोकतंत्र की असली कसौटी | राष्ट्र संवाद

    Devanand SinghBy Devanand SinghApril 13, 2026Updated:April 13, 2026No Comments2 Mins Read
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    जनप्रतिनिधियों की त्याग भावना
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    न्याय का विस्तार ही लोकतंत्र की असली कसौटी

    देवानंद सिंह
    भारत के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत का यह कथन कि देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती कानूनों की कमी नहीं, बल्कि न्याय तक आम लोगों की सीमित पहुंच है वास्तव में हमारी न्यायिक व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना को उजागर करता है। एक ओर जहां भारत में अधिकारों और कानूनों का मजबूत ढांचा मौजूद है, वहीं दूसरी ओर इन अधिकारों का लाभ अंतिम व्यक्ति तक समय पर नहीं पहुंच पाना लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
    आज न्याय केवल अदालतों तक सीमित एक औपचारिक व्यवस्था बनकर रह गया है, जबकि उसका वास्तविक उद्देश्य समाज के हर वर्ग, विशेषकर कमजोर और वंचित तबकों तक सुलभ होना चाहिए। दूरी, देरी और जटिल प्रक्रियाएं आम नागरिक को न्याय पाने की राह में हतोत्साहित करती हैं। पर्वतीय राज्यों जैसे उत्तराखंड में भौगोलिक कठिनाइयां इस समस्या को और गंभीर बना देती हैं, जहां न्याय तक पहुंच केवल कानूनी नहीं बल्कि भौतिक चुनौती भी है।
    सीजेआई का यह जोर कि “न्याय का अस्तित्व नहीं, उसकी उपलब्धता महत्वपूर्ण है” न्यायपालिका के लिए एक स्पष्ट दिशा-निर्देश है। न्याय की सफलता का मापदंड केवल बड़े और चर्चित मामलों का निपटारा नहीं, बल्कि रोजमर्रा के जीवन में आम नागरिक को मिलने वाला न्याय होना चाहिए। यही लोकतंत्र की असली ताकत है।
    इस संदर्भ में वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र—जैसे लोक अदालत, मध्यस्थता और प्री-लिटिगेशन सुलह—महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। ये न केवल न्याय प्रक्रिया को तेज और सस्ता बनाते हैं, बल्कि सामाजिक सौहार्द को भी बनाए रखते हैं। साथ ही, ‘न्याय मित्र’ जैसे डिजिटल और स्थानीय पहल न्याय को लोगों के दरवाजे तक ले जाने की दिशा में सराहनीय प्रयास हैं।
    हालांकि, केवल योजनाएं और पोर्टल बनाना पर्याप्त नहीं होगा। जरूरत है व्यापक जागरूकता, प्रभावी क्रियान्वयन और संस्थागत संवेदनशीलता की। जब तक समाज के अंतिम व्यक्ति को यह विश्वास नहीं होगा कि न्याय सुलभ और निष्पक्ष है, तब तक संविधान की आत्मा अधूरी ही रहेगी।
    अंततः, न्यायपालिका और शासन तंत्र को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि न्याय केवल कागजों पर नहीं, बल्कि हर नागरिक के जीवन में वास्तविक रूप से उतर सके। क्योंकि एक सशक्त लोकतंत्र की पहचान उसके कानूनों से नहीं, बल्कि उन कानूनों के प्रभावी और समान क्रियान्वयन से होती है।

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