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    Home » राजनीति में परिवर्तन: जनसेवा या सिर्फ सत्ता की लालसा?
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    राजनीति में परिवर्तन: जनसेवा या सिर्फ सत्ता की लालसा?

    Devanand SinghBy Devanand SinghMarch 21, 2026Updated:March 21, 2026No Comments3 Mins Read
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    पुराना किला और इंद्रप्रस्थ
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    राजनीति में परिवर्तन: जनसेवा या सिर्फ सत्ता की लालसा?

    ​केवल सत्ता की लालसा नहीं, बल्कि जनसेवा ही राजनीति का मूल मंत्र होना चाहिए।वर्तमान समय में हमारे चारों ओर राजनीति की एक तीव्र लहर बह रही है। एक लोकतांत्रिक देश में चुनाव या राजनीतिक समीकरणों का बदलना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, किंतु यह परिवर्तन समाज के हर स्तर पर गहरा प्रभाव डालता है। एक निष्पक्ष नागरिक के रूप में हम टीवी चैनलों और सोशल मीडिया के माध्यम से देख रहे हैं कि राजनीतिक जगत में दलबदल, नाम परिवर्तन और नए-नए समीकरणों का सृजन हो रहा है। राजनीतिज्ञ अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए जो कठोर परिश्रम कर रहे हैं, वह भी हमारी दृष्टि से ओझल नहीं है। परंतु प्रश्न यह उठता है कि— क्या यह कठोर प्रयास और परिवर्तन समाज के भविष्य के लिए शुभ संकेत हैं?
    ​जाति-जनजातियों का स्नेह और समान अधिकार—
    ​असम जैसे विविधतापूर्ण राज्य में प्रत्येक जाति और जनजाति का अपना स्वाभिमान और अपनी आकांक्षाएँ होती हैं। राजनीति के इस मैदान में यह जनप्रतिनिधियों का प्राथमिक कर्तव्य है कि प्रत्येक छोटे-बड़े समुदाय को समान स्नेह, आदर और सम्मान प्राप्त हो। यदि किसी विशेष वर्ग या समूह को अत्यधिक प्राथमिकता देकर दूसरे हिस्से की अनदेखी की जाती है, तो समाज में असंतोष की भावना जन्म लेती है, जो विकास के मार्ग में बाधक सिद्ध होती है।
    ​मध्यम वर्ग का संघर्ष और उपेक्षा—
    ​अक्सर यह देखा जाता है कि राजनीतिक अभियानों के दौरान निर्धन वर्ग की समस्याओं पर तो चर्चा होती है, परंतु समाज की रीढ़ माना जाने वाला ‘मध्यम वर्ग’ अपने दुखों और संघर्षों के साथ नेपथ्य (पर्दे के पीछे) में ही रह जाता है। कुछ लोग गरीबों के बीच जाकर उनकी समस्याओं को सुनने का स्वांग रचते हैं या कार्य करते हैं, किंतु वे मध्यम वर्ग की व्यावसायिक समस्याओं, रोजगार के संकट और उनके दैनिक संघर्षों के प्रति विमुख रहते हैं। राजनीति का मुख्य उद्देश्य केवल एक विशेष वर्ग को संतुष्ट करना नहीं, बल्कि समाज के हर स्तर की समस्याओं का समाधान करना होना चाहिए।
    ​राजनीतिज्ञों से आह्वान: लोकप्रियता या जनसेवा?
    ​केवल टीवी की स्क्रीन या सोशल मीडिया पर चेहरा चमकाने के लिए अथवा व्यक्तिगत लाभ हेतु एक दल छोड़कर दूसरे दल में सम्मिलित होना स्वस्थ राजनीति का लक्षण नहीं है। जनसेवा की वास्तविक भावना के साथ ही राजनीति के क्षेत्र में कदम रखना चाहिए। जनता एक नेता को उसके चरित्र और कार्यों के आधार पर चुनती है, न कि केवल उसकी लोकप्रियता के आधार पर। जनसाधारण और मध्यम वर्ग के दुखों के बोझ को कम करने के संकल्प के साथ ही राजनीतिज्ञों का आगे आना वांछनीय है।
    यह संभवतः एक कड़वा सच है, जिसे समाज के सम्मुख प्रकट करने में कई लोग संकोच करते हैं। परंतु समाज के एक सचेत नागरिक होने के नाते हमारा यह दायित्व है कि हम सत्य को उजागर करें। हम समाज के प्रत्येक व्यक्ति का सम्मान करते हैं, किंतु वह सम्मान कुरीतियों या अन्याय को प्रश्रय देने वाला नहीं होना चाहिए। हमारी एकमात्र कामना यही है कि देश के प्रत्येक कोने में शांति और सद्भाव की डोर सदैव अटूट रहे। समाज के सभी वर्गों के बीच समन्वय स्थापित हो और हमारा राज्य उन्नति के शिखर की ओर अग्रसर हो।
    ​

     

     

    मूल लेखिका
    मनीषा शर्मा
    अनुवादक:– रितेश शर्मा
    पता- जलुकबाड़ी, गुवाहाटी

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