पश्चिम एशिया में संतुलन की कूटनीति: भारत की रणनीतिक प्राथमिकताएं
देवानंद सिंह
पश्चिम एशिया एक बार फिर अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है। महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर हमले, समुद्री मार्गों की सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंताएं और महाशक्तियों के बीच तनाव ने इस क्षेत्र को वैश्विक राजनीति का केंद्र बना दिया है। ऐसे समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ईरान के राष्ट्रपति के साथ हुई बातचीत भारत की संतुलित और व्यावहारिक विदेश नीति का स्पष्ट संकेत देती है।
प्रधानमंत्री मोदी ने बातचीत के दौरान नौवहन की स्वतंत्रता और समुद्री मार्गों की सुरक्षा पर जोर दिया। यह केवल एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक और रणनीतिक जरूरतों से जुड़ा मुद्दा है। भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है और वैश्विक व्यापार का महत्वपूर्ण हिस्सा इन्हीं समुद्री मार्गों से गुजरता है। ऐसे में इन मार्गों की सुरक्षा भारत के लिए राष्ट्रीय हित का विषय है।
प्रधानमंत्री द्वारा पश्चिम एशिया में महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर हमलों की निंदा भी इसी व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा है। इन हमलों से न केवल क्षेत्रीय स्थिरता प्रभावित होती है, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं भी बाधित होती हैं। कोविड-19 के बाद विश्व पहले ही आपूर्ति संकट का सामना कर चुका है, और ऐसे हमले वैश्विक अर्थव्यवस्था को और अस्थिर कर सकते हैं। भारत, जो खुद को एक उभरती आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित कर रहा है, इस तरह की अस्थिरता से सीधे प्रभावित होता है।
ईरान के साथ बातचीत में एक और महत्वपूर्ण पहलू भारतीय नागरिकों की सुरक्षा का रहा। ईरान में रह रहे भारतीयों के प्रति वहां की सरकार के सहयोग की सराहना करते हुए प्रधानमंत्री ने यह स्पष्ट किया कि भारत अपनी प्रवासी आबादी की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। यह दृष्टिकोण भारत की विदेश नीति का एक स्थायी तत्व बन चुका है, जहां कूटनीति केवल राज्य-से-राज्य संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि नागरिकों के हितों को भी केंद्र में रखती है।
प्रधानमंत्री मोदी द्वारा ईद और नवरोज की शुभकामनाएं देना भी सांस्कृतिक कूटनीति का हिस्सा है। भारत हमेशा से विविधता और सह-अस्तित्व का समर्थक रहा है, और इस प्रकार के संदेश संबंधों को मानवीय आधार प्रदान करते हैं। यह “सॉफ्ट पावर” भारत की विदेश नीति को एक अलग पहचान देती है।
इसी संदर्भ में मध्य प्रदेश में शिया समुदाय द्वारा ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई की हत्या की निंदा और अमेरिका-इजराइल के खिलाफ नारेबाजी को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह घटनाएं दर्शाती हैं कि वैश्विक घटनाओं का प्रभाव भारत के भीतर भी महसूस किया जाता है। हालांकि, भारत सरकार की नीति स्पष्ट रूप से संतुलित और गैर-पक्षपाती रही है। भारत ने हमेशा संवाद, कूटनीति और शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन किया है, चाहे मामला ईरान का हो, इजराइल का या अमेरिका का।
भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह “रणनीतिक स्वायत्तता” को बनाए रखते हुए सभी पक्षों के साथ संबंधों को संतुलित रखने की कोशिश करती है। एक ओर भारत के इजराइल और अमेरिका के साथ मजबूत संबंध हैं, तो दूसरी ओर ईरान के साथ भी ऐतिहासिक और रणनीतिक जुड़ाव है, खासकर चाबहार बंदरगाह जैसे परियोजनाओं के माध्यम से।
आज के जटिल वैश्विक परिदृश्य में भारत की यह संतुलित कूटनीति न केवल उसके राष्ट्रीय हितों की रक्षा करती है, बल्कि उसे एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में भी स्थापित करती है। पश्चिम एशिया में शांति, स्थिरता और सुरक्षित व्यापारिक मार्गों की वकालत करते हुए भारत यह संदेश दे रहा है कि वह केवल एक दर्शक नहीं, बल्कि एक सक्रिय और जिम्मेदार भागीदार है।

