बिहार के पते पर विदेशी पासपोर्ट, कठघरे में सत्यापन व्यवस्था
देवानंद सिंह
बिहार के पतों पर 31 अफगान नागरिकों के भारतीय पासपोर्ट बनवाए जाने की खबर ने सरकारी दस्तावेजी सत्यापन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पुलिस मुख्यालय के स्तर पर सामने आई जानकारी के मुताबिक 30 अफगान नागरिकों के पटना और एक के दरभंगा के पते पर भारतीय पासपोर्ट जारी हुए। दो बांग्लादेशी नागरिकों के भी बिहार के पते पर भारतीय पासपोर्ट बनवाए जाने की सूचना है। मामला जांच के अधीन है, इसलिए अंतिम निष्कर्ष जांच रिपोर्ट के बाद ही सामने आएगा। लेकिन सवाल अभी से सामने खड़ा है—आखिर ऐसा हुआ कैसे?
पासपोर्ट कोई सामान्य पहचान पत्र नहीं है। यह भारत सरकार द्वारा जारी महत्वपूर्ण यात्रा दस्तावेज है। इसके लिए पहचान, पता और नागरिकता से जुड़े दावों का सत्यापन किया जाता है। ऐसे में यदि विदेशी नागरिकों ने भारतीय पते और दस्तावेजों के आधार पर पासपोर्ट हासिल किए हैं तो यह केवल आवेदकों की कथित धोखाधड़ी का मामला नहीं, बल्कि उस पूरी प्रक्रिया की पड़ताल का विषय है, जिसके तहत आवेदन से लेकर पुलिस सत्यापन और पासपोर्ट जारी होने तक कई स्तरों पर जांच होती है।
अब जांच का केंद्र यही होना चाहिए कि संबंधित लोगों ने बिहार का पता कैसे हासिल किया और आवेदन में कौन-कौन से दस्तावेज लगाए। क्या दस्तावेज फर्जी थे? क्या किसी वास्तविक व्यक्ति के दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया? क्या पते का सत्यापन ठीक से हुआ? और सबसे अहम यदि कहीं जानबूझकर मदद की गई तो वह मदद किस स्तर पर हुई? इन सवालों के जवाब बिना पूरी प्रक्रिया की जांच किए नहीं मिल सकते।
विदेश मंत्रालय और गृह मंत्रालय से रिपोर्ट मिलने के बाद पुलिस मुख्यालय ने संबंधित जिलों के डीएम तथा एसएसपी-एसपी को जांच के निर्देश दिए हैं। यह जरूरी कदम है, लेकिन जांच केवल पासपोर्ट धारकों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। जिस दस्तावेज के आधार पर पता या पहचान साबित की गई, उसके स्रोत से लेकर सत्यापन करने वाले तंत्र तक हर कड़ी की जांच होनी चाहिए। यदि फर्जीवाड़ा प्रमाणित होता है तो यह भी तय होना चाहिए कि चूक लापरवाही थी या किसी संगठित प्रयास का हिस्सा।
इस मामले में जल्दबाजी में किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना भी उचित नहीं होगा। विदेशी नागरिक होना अपने आप में अपराध नहीं है। अपराध या फर्जीवाड़े का निर्धारण उपलब्ध दस्तावेजों और जांच के निष्कर्षों से ही होगा। इसलिए जांच तथ्यपरक और निष्पक्ष होनी चाहिए।
मामला जितना दस्तावेजों का है, उतना ही व्यवस्था की विश्वसनीयता का भी। यदि जांच में गड़बड़ी सामने आती है तो दोषियों पर कार्रवाई के साथ सत्यापन प्रक्रिया की खामियों को दूर करना जरूरी होगा। सवाल सिर्फ यह नहीं कि 33 पासपोर्ट कैसे जारी हुए बड़ा सवाल यह है कि ऐसी चूक दोबारा न हो, इसके लिए व्यवस्था में क्या बदला जाएगा। यही इस जांच की असली कसौटी होगी।

