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    Breaking News Business Headlines कारोबार राष्ट्रीय संपादकीय

    दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था बनने की ओर भारत

    Devanand SinghBy Devanand SinghSeptember 30, 2026No Comments3 Mins Read
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    दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था बनने की ओर भारत

    – महेन्द्र तिवारी

    भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर दुनिया की प्रमुख आर्थिक एजेंसियों ने जो नया आकलन प्रस्तुत किया है, वह केवल एक सांख्यिकीय संशोधन नहीं बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था की बढ़ती मजबूती का संकेत है। प्रमुख अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी मूडीज़ ने वित्त वर्ष 2027 के लिए भारत की सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर का अनुमान 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 7 प्रतिशत कर दिया है। इसके साथ ही कई वैश्विक वित्तीय संस्थानों और अर्थशास्त्रियों ने भी भारत के आर्थिक भविष्य को पहले की तुलना में अधिक आशाजनक बताया है।

    यह बदलाव ऐसे समय आया है जब विश्व अर्थव्यवस्था अभी भी अनेक चुनौतियों से जूझ रही है। पश्चिम एशिया में भू राजनीतिक तनाव, ऊर्जा की ऊंची कीमतें, वैश्विक व्यापार की अनिश्चितता और कई विकसित देशों में धीमी आर्थिक वृद्धि ने विश्व बाजार को प्रभावित किया है। इसके बावजूद भारत ने अपनी घरेलू आर्थिक शक्ति के बल पर उल्लेखनीय स्थिरता दिखाई है। पहली तिमाही में अपेक्षा से बेहतर आर्थिक प्रदर्शन ने वैश्विक एजेंसियों का विश्वास और मजबूत किया है।

    भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका विशाल घरेलू उपभोक्ता बाजार है। लगभग हर क्षेत्र में बढ़ती मांग ने उद्योगों को उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रेरित किया है। ग्रामीण क्षेत्रों में आय और उपभोग में सुधार तथा शहरी क्षेत्रों में सेवा क्षेत्र की मजबूती ने बाजार को गति दी है। जब किसी देश की वृद्धि केवल निर्यात पर निर्भर न होकर घरेलू खपत पर आधारित होती है, तब वह बाहरी झटकों का सामना अपेक्षाकृत बेहतर ढंग से कर पाता है। यही कारण है कि भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था कहा जा रहा है।

    विनिर्माण क्षेत्र भी इस सकारात्मक तस्वीर का महत्वपूर्ण आधार बनकर उभरा है। इलेक्ट्रॉनिक्स, अभियांत्रिकी उत्पाद, मशीनरी और औद्योगिक उत्पादन में निरंतर विस्तार देखने को मिल रहा है। निर्यात के आंकड़े भी बताते हैं कि भारत केवल पारंपरिक वस्तुओं तक सीमित नहीं है, बल्कि उच्च मूल्य वाले उत्पादों में भी अपनी उपस्थिति मजबूत कर रहा है। इससे रोजगार, निवेश और उत्पादन तीनों को दीर्घकालिक लाभ मिलने की संभावना है।

    सरकार द्वारा सड़क, रेल, बंदरगाह और डिजिटल अवसंरचना पर किया जा रहा पूंजीगत निवेश भी आर्थिक वृद्धि का प्रमुख प्रेरक बना हुआ है। सार्वजनिक निवेश ने निजी क्षेत्र को नए उद्योग स्थापित करने और क्षमता विस्तार के लिए प्रोत्साहित किया है। सेवाक्षेत्र, विशेषकर वित्त, सूचना प्रौद्योगिकी, पर्यटन और व्यापारिक सेवाओं की निरंतर मजबूती ने भी आर्थिक गतिविधियों को व्यापक आधार प्रदान किया है।

    हालांकि यह उत्साह पूरी तरह जोखिमों से मुक्त नहीं है। मूडीज़ ने स्पष्ट किया है कि ऊंची कच्चे तेल की कीमतें, खाद्य महंगाई और प्रतिकूल मौसम जैसी परिस्थितियां भविष्य की वृद्धि को प्रभावित कर सकती हैं। यदि ऊर्जा आयात महंगा होता है तो महंगाई बढ़ने और चालू खाते पर दबाव आने की आशंका बनी रहेगी। इसलिए आर्थिक प्रबंधन में संतुलन बनाए रखना उतना ही आवश्यक होगा जितना विकास की गति को बनाए रखना।

    भारत के लिए यह समय अवसर और जिम्मेदारी दोनों का है। बढ़ती विकास दर का वास्तविक अर्थ तभी होगा जब उसका लाभ रोजगार, आय वृद्धि, ग्रामीण समृद्धि और सामाजिक विकास तक पहुंचे। वैश्विक एजेंसियों का बढ़ा हुआ भरोसा भारत के आर्थिक भविष्य के प्रति आशावाद अवश्य व्यक्त करता है, किंतु इस विश्वास को स्थायी उपलब्धि में बदलने के लिए निरंतर सुधार, निवेश और समावेशी विकास की दिशा में समान गति से आगे बढ़ना होगा।

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