चेतावनी : ब्रह्मर्षि विकास मंच संभले, अन्यथा मिट जाएंगे
भाजपा और ब्रह्मर्षि समाज : उपेक्षा की राजनीति या समाज की चूक?
देवानंद सिंह
जमशेदपुर। भारतीय जनता पार्टी और ब्रह्मर्षि समाज का रिश्ता शुरू से ही सहयोग, समर्थन और विश्वास पर टिका रहा है। भाजपा के गठन के समय से लेकर आज तक जमशेदपुर में पार्टी को खड़ा करने, मजबूत करने और चुनावी सफलता दिलाने में ब्रह्मर्षि समाज की भूमिका अहम रही है। स्वर्गीय मनमोहन चौधरी, स्वर्गीय सच्चिदानंद राय, हरेंद्र पांडेय, जटाशंकर पांडे, अनिल सिंह और कनाडा में रह रहे अरविंद जैसे कई नाम ऐसे हैं, जिनके योगदान को नकारा नहीं जा सकता।
इसके बावजूद यह एक कड़वी सच्चाई है कि भाजपा गठन के बाद से अब तक जमशेदपुर में एक भी जिला अध्यक्ष ब्रह्मर्षि (भूमिहार) समाज से नहीं बनाया गया। चुनाव के समय टिकट वितरण की प्रक्रिया में भी यह समाज लगातार उपेक्षा का शिकार होता रहा है। हर बार समाज को आश्वासन तो मिलता है, लेकिन निर्णायक घड़ी में उसे दरकिनार कर दिया जाता है।
भाजपा को मिलने वाले ब्रह्मर्षि समाज के वोट प्रतिशत की बात करें तो यह लगभग 90 प्रतिशत तक रहा है। इसके बावजूद पार्टी संगठन और चुनावी प्रतिनिधित्व में इस समाज को वह स्थान नहीं मिला, जिसका वह हकदार है। पार्टी के भीतर यह तर्क अक्सर दिया जाता है कि समाज की पकड़ कमजोर है, जबकि हकीकत यह है कि जमशेदपुर पूर्वी और जमशेदपुर पश्चिम दोनों विधानसभा क्षेत्रों में ब्रह्मर्षि समाज की भूमिका निर्णायक रही है।
हाल ही में जिला अध्यक्ष पद को लेकर हुई रायशुमारी में डॉ. जटाशंकर पांडे, अनिल सिंह, राकेश सिंह, बबुआ सिंह और दीपू सिंह जैसे नाम सामने आए थे। इन नामों से समाज में उम्मीद जगी थी कि इस बार भाजपा नेतृत्व ब्रह्मर्षि समाज को सम्मान देगा। लेकिन अंतिम निर्णय की प्रक्रिया में इन सभी नामों को किनारे कर दिया गया। अब जबकि जिला अध्यक्ष के नाम की घोषणा लगभग तय मानी जा रही है, औपचारिकता ही शेष रह गई है।

इसी बीच ब्रह्मर्षि विकास मंच, जमशेदपुर के महासचिव अनिल ठाकुर का बयान सामने आया है। उन्होंने भाजपा पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि झारखंड में पार्टी ब्रह्मर्षि समाज को केवल वोट बैंक के रूप में देखती है। उन्होंने यह भी कहा कि समाज का योगदान भुला दिया गया है और संगठनात्मक पदों व टिकट वितरण में लगातार उपेक्षा की जा रही है।
हालांकि इस पूरे परिदृश्य के लिए केवल भाजपा को दोषी ठहराना भी उचित नहीं होगा। समाज को भी आत्ममंथन करना होगा कि आखिर क्यों वह अपनी राजनीतिक ताकत को निर्णायक रूप से इस्तेमाल नहीं कर पा रहा है। जब तक समाज संगठित होकर राजनीतिक रूप से मजबूती नहीं दिखाएगा, तब तक कोई भी दल उसे केवल वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करता रहेगा।
राजनीति में सम्मान मांगने से नहीं, बल्कि संघर्ष और एकजुटता से मिलता है। ब्रह्मर्षि समाज के सामने यह समय चेतावनी का है। यदि अब भी सामाजिक मंच राजनीतिक दिशा तय करने में विफल रहे, तो आने वाले समय में समाज की स्थिति और कमजोर हो सकती है।
भाजपा और ब्रह्मर्षि समाज : उपेक्षा की राजनीति या समाज की चूक?
यह केवल एक आरोप या बयान नहीं, बल्कि ब्रह्मर्षि समाज के लिए अंतिम चेतावनी है
संभलिए, संगठित होइए और अपना हक लेने के लिए निर्णायक लड़ाई लड़िए, अन्यथा इतिहास गवाह बनेगा कि अवसर हाथ से निकल गया।

