उपराष्ट्रपति चुनाव 2025 : संख्याओं से परे राजनीति की असली परीक्षा
देवानंद सिंह
भारत के 15वें उपराष्ट्रपति के चुनाव के लिए सारा माहौल तैयार हो चुका है। मतदान 9 सितंबर यानी आज मंगलवार को होना है, और आज ही नतीजे भी सामने आ जाएंगे। यह चुनाव अचानक इसलिए आया, क्योंकि उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने 21 जुलाई की देर शाम स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए पद से इस्तीफ़ा दे दिया था। उन्होंने अगस्त 2022 में कार्यभार संभाला था और उनका कार्यकाल 2027 तक चलना था, लेकिन अप्रत्याशित इस्तीफ़े ने न केवल संवैधानिक प्रक्रिया को गति दी बल्कि राजनीति में भी नई हलचल पैदा कर दी।

सामान्यत: उपराष्ट्रपति का चुनाव राजनीतिक दृष्टि से नीरस माना जाता है, क्योंकि यह सीधा जनसमर्थन वाला पद नहीं है, और निर्वाचक मंडल संसद के दोनों सदनों के सांसदों तक सीमित होता है, लेकिन इस बार का चुनाव कई मायनों में असामान्य और दिलचस्प हो गया है। इस्तीफ़े की अचानक पृष्ठभूमि से लेकर पार्टियों की रणनीति, गठबंधनों के भीतर समीकरण और संभावित क्रॉस-वोटिंग की आशंकाओं ने इसे चर्चा का केंद्र बना दिया है। राजनीतिक हलकों में इन दिनों डिनर पॉलिटिक्स का दौर तेज़ है। गठबंधन एक-दूसरे को मात देने के लिए केवल औपचारिक अपीलों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि निजी संपर्क, भोज और लगातार संवाद के जरिए अपने सांसदों को साधने में लगे हुए हैं। संसद से लेकर सोशल मीडिया तक हर तरफ यह चुनाव चर्चा में है।

विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव केवल एक संवैधानिक पद को भरने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके नतीजों से सत्ता की मजबूती, संघ और सरकार के रिश्तों की गहराई और नेतृत्व की स्वीकार्यता जैसे पहलुओं की भी परख होगी। धनखड़ का अचानक इस्तीफ़ा कई सवाल खड़े करता है। क्या यह सिर्फ स्वास्थ्य कारणों से हुआ या इसके पीछे कोई गहरे राजनीतिक संकेत छिपे हैं? यह सवाल राजनीतिक गलियारों में लगातार उठाया जा रहा है। इस्तीफ़े का समय भी दिलचस्प है, जब संसद का मानसून सत्र अभी ताज़ा ही समाप्त हुआ था, और राजनीतिक माहौल पहले से ही चुनावी रंग में था। पिछले दिनों कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ़ इंडिया का चुनाव हुआ, जिसमें भाजपा सांसद राजीव प्रताप रूडी ने बड़ी जीत दर्ज की। यह चुनाव भले ही छोटे स्तर का माना जाए, लेकिन इसमें सत्ता और संगठन की भूमिका पर चर्चा तेज़ रही। खास बात यह रही कि इसमें भाजपा के भीतर ही क्रॉस-वोटिंग की चर्चाएं सामने आईं। यही कारण है कि उपराष्ट्रपति चुनाव में भी यही सवाल उठ रहा है कि क्या सब कुछ पूर्व निर्धारित गणित के अनुसार होगा या कुछ अप्रत्याशित मोड़ देखने को मिलेंगे।

कुल 782 सांसद इस चुनाव में वोट डालेंगे, इनमें लोकसभा और राज्यसभा के सभी निर्वाचित और नामित सदस्य शामिल हैं। गणित साफ है। एनडीए गठबंधन के पास जीत के लिए आवश्यक बहुमत से कहीं अधिक वोट हैं। उन्हें 391 की ज़रूरत है, और उनके पास लगभग 422 वोट उपलब्ध हैं। वहीं, इंडिया गठबंधन के पास करीब 312 वोट हैं। संख्या के लिहाज़ से एनडीए की जीत पक्की मानी जा रही है, लेकिन असली सवाल यह है कि कौन-सा गठबंधन अपनी संख्या से अधिक वोट हासिल कर पाता है। यदि, कहीं भी क्रॉस-वोटिंग हुई तो यह संदेश जाएगा कि गठबंधन की पकड़ उतनी मज़बूत नहीं रही, जितनी दिखाई दे रही है।
एनडीए ने इस बार जिस उम्मीदवार को मैदान में उतारा है, वह आरएसएस की पृष्ठभूमि से आते हैं। यह चयन केवल औपचारिक नहीं बल्कि राजनीतिक संकेतों से भरा हुआ है। इसका मतलब है कि भाजपा नेतृत्व अब भी संगठन और संघ के बीच बेहतर समन्वय बनाकर चल रहा है। उपराष्ट्रपति जैसे पद के लिए संघ के स्वयंसेवक का उम्मीदवार बनना इस तालमेल की झलक है। इंडिया गठबंधन ने दक्षिण भारत से आने वाले उम्मीदवार को उतारकर चुनाव को दक्षिण बनाम दक्षिण की लड़ाई का रूप देने की कोशिश की है, लेकिन समस्या यह है कि दक्षिण की प्रमुख पार्टियों से उसे ठोस समर्थन नहीं मिल रहा। आंध्र प्रदेश में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही एनडीए उम्मीदवार के साथ हैं। तमिलनाडु में डीएमके ने साफ कर दिया है कि समर्थन विचारधारा के आधार पर होगा, केवल “तमिल पहचान” के कारण नहीं। ऐसे में, इंडिया गठबंधन की रणनीति अधूरी नज़र आती है।

विश्लेषकों का कहना है कि यदि, डीएमके समर्थन से पीछे हटती है, तो भाजपा इसे अगले विधानसभा चुनाव में बड़ा राजनीतिक हथियार बना सकती है। वहीं, अगर डीएमके समर्थन करती है, तो उसे अपने गठबंधन की विचारधारा की साख पर सवालों का सामना करना पड़ेगा। तेलंगाना में एआईएमआईएम ने पूर्व न्यायाधीश बी. सुदर्शन रेड्डी का समर्थन घोषित कर दिया है। यह समर्थन पूरी तरह स्थानीय पहचान और क्षेत्रीय भावनाओं पर आधारित है। हैदराबाद की राजनीति में ओवैसी का यह कदम एक तरह से प्रतीकात्मक महत्व रखता है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर इसका असर सीमित रहने वाला है। फिर भी यह बताता है कि उपराष्ट्रपति चुनाव क्षेत्रीय पार्टियों के लिए भी अपनी पहचान दर्ज कराने का मंच बन गया है। उपराष्ट्रपति का चुनाव सिंगल ट्रांसफ़रेबल वोट सिस्टम से होता है। इसमें सांसद अपनी प्राथमिकता के आधार पर उम्मीदवारों को क्रम देते हैं, पहली पसंद, दूसरी पसंद, तीसरी पसंद आदि। यही कारण है कि इसमें पार्टी व्हिप लागू नहीं होता।
इतिहास बताता है कि इसी वजह से कई बार नतीजे अप्रत्याशित हुए हैं। 1969 का राष्ट्रपति चुनाव इसका उदाहरण है, जब कांग्रेस का अधिकृत उम्मीदवार हार गया और वी.वी. गिरि इंदिरा गांधी के समर्थन से जीत गए। यही पद्धति इस बार भी अनिश्चितताओं का दरवाज़ा खोलती है, चूंकि उपराष्ट्रपति चुनाव में पार्टी लाइन पर वोटिंग बाध्यकारी नहीं है, इसलिए सांसदों को खुली छूट होती है कि वे अपनी इच्छा के अनुसार वोट डालें। यही कारण है कि दोनों गठबंधनों में असली चुनौती अपने-अपने सांसदों को लाइन में रखने की है। दक्षिण भारत के उम्मीदवार की मौजूदगी, क्षेत्रीय दलों की रणनीति और व्यक्तिगत समीकरण मिलकर क्रॉस-वोटिंग की संभावनाओं को और बढ़ा देते हैं। उपराष्ट्रपति भारत का दूसरा सबसे ऊंचा संवैधानिक पद है। वह न केवल कार्यपालिका का दूसरा प्रमुख होता है, बल्कि राज्यसभा का सभापति भी होता है। संवैधानिक व्यवस्था में उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच पदक्रम में आते हैं।
अगर, किसी कारणवश राष्ट्रपति का पद रिक्त हो जाए तो उपराष्ट्रपति कार्यकारी राष्ट्रपति की भूमिका निभाते हैं। यही कारण है कि यह चुनाव केवल औपचारिकता नहीं बल्कि संवैधानिक स्थिरता की दृष्टि से भी अहम है, चूंकि उपराष्ट्रपति राज्यसभा के सभापति होते हैं, इसलिए इस चुनाव का सीधा असर उच्च सदन की कार्यप्रणाली पर पड़ेगा। विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों जानते हैं कि सभापति की कार्यशैली किस तरह सदन की बहस, कानून बनाने की प्रक्रिया और संसदीय संस्कृति को प्रभावित करती है। इसलिए उपराष्ट्रपति चुनाव की राजनीतिक अहमियत और बढ़ जाती है। इस बार के चुनाव को दिलचस्प बनाने वाला एक और पहलू है दक्षिण भारत। चाहे एनडीए का उम्मीदवार हो या विपक्ष का, दोनों की जड़ें दक्षिण में हैं। यह स्थिति न केवल चुनाव को रोचक बनाती है बल्कि इस बात को भी दर्शाती है कि भारतीय राजनीति में दक्षिण का महत्व लगातार बढ़ रहा है। अगले कुछ वर्षों में तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में बड़े चुनाव होने हैं। इस चुनाव में दक्षिण से उम्मीदवार उतारना पार्टियों की भविष्य की रणनीति का हिस्सा भी है, हालांकि एनडीए की जीत लगभग तय है, लेकिन असली परख होगी कि वह कितने वोट हासिल करता है। अगर, गठबंधन अपनी संख्या से कहीं अधिक वोट ले लेता है तो यह उसकी मज़बूती और संगठन की ताक़त का परिचायक होगा। वहीं, अगर संख्या से कम वोट मिले या क्रॉस-वोटिंग की खबरें आईं, तो यह नेतृत्व की पकड़ पर सवाल खड़े कर सकता है। इसी तरह इंडिया गठबंधन के लिए भी यह चुनाव केवल जीत-हार का मामला नहीं है, बल्कि यह उसकी आंतरिक एकजुटता और रणनीतिक समझ का इम्तहान है।
कुल मिलाकर, आने वाले दिनों में परिणाम भले ही स्पष्ट हों और एनडीए की जीत लगभग तय हो, लेकिन यह चुनाव संख्याओं से कहीं अधिक है। यह चुनाव दिखाएगा कि संसद में किसकी पकड़ कितनी मज़बूत है, क्षेत्रीय दल किस हद तक स्वतंत्र रुख अपना सकते हैं और क्रॉस-वोटिंग जैसे घटनाक्रम सत्ता और विपक्ष के नेतृत्व को किस तरह चुनौती देते हैं। भारतीय लोकतंत्र में उपराष्ट्रपति का चुनाव भले ही जनता के सीधे वोट से न होता हो, लेकिन यह सत्ता की दिशा, गठबंधनों की मजबूती और राजनीति के बदलते समीकरणों की झलक ज़रूर देता है। यही वजह है कि इस बार का चुनाव केवल संवैधानिक औपचारिकता नहीं बल्कि राजनीतिक तापमान का असली पैमाना बन गया है।

