विशेष संपादकीय: -भगवा आतंकवाद का झूठा नैरेटिव बेनकाब
क्या मालेगांव फैसले के बाद कांग्रेस साध्वी प्रज्ञा ठाकुर से माफी मांगेगी?
*देवानंद सिंह*
मालेगांव ब्लास्ट मामले में आए अदालत के फैसले ने एक बार फिर पुराने जख्मों को हरा कर दिया है। साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने जिस अमानवीय यातना को झेला, उसकी यादें आज भी राजनीति और न्याय प्रणाली पर सवाल खड़े करती हैं। मालेगांव ब्लास्ट मामले में अदालत का फैसला भारतीय राजनीति के एक लंबे और विवादित अध्याय का अंत है। सभी आरोपियों के बरी होने से यह स्पष्ट हो गया कि वर्षों तक ‘भगवा आतंकवाद’ का जो नैरेटिव रचा गया, वह ठोस सबूतों पर नहीं बल्कि राजनीतिक फायदे के लिए गढ़ी गई कहानी थी।

यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक रूप से भी बेहद संवेदनशील रहा। आरोपियों ने डेढ़ दशक तक अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए संघर्ष किया, जबकि उन्हें मीडिया ट्रायल और राजनीतिक बयानबाजी ने पहले ही ‘दोषी’ करार दे दिया था। इस दौरान न केवल उनकी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा नष्ट हुई बल्कि समाज में अविश्वास और विभाजन भी गहराया।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पूछताछ के दौरान उन्हें बेल्ट से पीटा गया, कांटों पर लिटाया गया और वेंटिलेटर तक पहुंचा दिया गया। डॉक्टरों ने माना कि यह चोटें पुलिसिया मारपीट का नतीजा थीं। तमाम अत्याचारों के बावजूद साध्वी ने आरोप कबूलने से इनकार किया। अगर, वह दबाव में झुक जातीं, तो शायद ‘भगवा आतंकवाद’ का राजनीतिक नैरेटिव आज और भी गहरा होता।

*न्याय और माफी की आवश्यकता*
अब जबकि अदालत ने आरोपियों को बरी कर दिया है, यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या कांग्रेस साध्वी प्रज्ञा ठाकुर से सार्वजनिक रूप से माफी मांगेगी?
क्या उन अधिकारियों पर कार्रवाई होगी जिन्होंने सत्ता के दबाव में निर्दोषों पर अत्याचार किए? क्या राजनीतिक दल भविष्य में ऐसे ‘नैरेटिव’ गढ़ने से बचेंगे जो समाज को विभाजित करते हैं?
बहरहाल, न्याय केवल अदालत में बरी होने से पूरा नहीं होता। न्याय की सच्ची जीत तभी होगी जब साध्वी प्रज्ञा ठाकुर जैसे पीड़ितों का सम्मान बहाल हो।

मालेगांव केस का फैसला भारतीय राजनीति और न्याय व्यवस्था के लिए चेतावनी है कि सत्ता के लिए निर्दोषों की बलि देना न केवल लोकतंत्र के लिए खतरनाक है, बल्कि यह समाज की आत्मा पर भी गहरा आघात है। अब समय आ गया है कि कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दल आत्ममंथन करें और पीड़ितों से माफी मांगते हुए ऐसी गलतियों को दोहराने से बचने का संकल्प लें।

अदालत का यह फैसला न्यायपालिका की ताकत और निष्पक्षता का प्रतीक है। यह संदेश भी देता है कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता और किसी खास विचारधारा या समुदाय को बिना ठोस सबूतों के आतंकवाद से जोड़ना न केवल न्याय के साथ खिलवाड़ है बल्कि देश की सामाजिक एकता को भी चोट पहुंचाता है।
*मालेगांव ब्लास्ट केस पर एक नज़र*

*सितंबर 2008:* मालेगांव में बम धमाका, 6 लोगों की मौत, दर्जनों घायल।
*2008–2009:* साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, कर्नल पुरोहित सहित कई गिरफ्तार।
*2010:* तत्कालीन सरकार और कुछ राजनीतिक दलों ने ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द का इस्तेमाल किया।
*2016:* एनआईए ने चार्जशीट में कई आरोपियों को क्लीन चिट दी।
*2025:* विशेष अदालत ने सबूतों के अभाव में सभी आरोपियों को बरी किया।
*अदालत ने कहा “मामले में आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं।”*

