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    Home » जहाँ शर्म नहीं-वहाँ वफ़ा कैसी-आधुनिक प्रेम की उजड़ी महफ़िल!
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    जहाँ शर्म नहीं-वहाँ वफ़ा कैसी-आधुनिक प्रेम की उजड़ी महफ़िल!

    Sponsored By: सोना देवी यूनिवर्सिटीJanuary 15, 2026No Comments3 Mins Read
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    जहाँ शर्म नहीं, वहाँ वफ़ा कैसी,आधुनिक प्रेम की उजड़ी महफ़िल!
    राष्ट्र संवाद
    भारत (इंद्र यादव) आज के डिजिटल और भागदौड़ भरे युग में ‘इश्क’ शब्द अपनी गहराई खोता जा रहा है। जिस प्रेम को कभी तपस्या माना जाता था, आज वह सोशल मीडिया के ‘लाइक्स’ और ‘स्वाइप’ कल्चर तक सिमट कर रह गया है। एक समय था जब प्रेम में ‘शर्म’ (लोक-लज्जा और संकोच) को एक आभूषण माना जाता था, जो मर्यादा की सीमा तय करता था। लेकिन आज, जब मर्यादाओं की दीवारें ढह रही हैं, तो वफादारी का टिकना भी मुश्किल हो गया है।

     

     

    ◆ प्रदर्शन की भूख और खोती हुई निजता

    आज का प्रेम ‘अनुभव’ करने से ज्यादा ‘दिखावे’ का विषय बन गया है। जब रिश्ता दिल से ज्यादा इंस्टाग्राम की फीड पर जीवित रहने लगे, तो उसकी जड़ें खोखली होने लगती हैं। जहाँ निजता की शर्म खत्म हो जाती है, वहाँ रिश्तों की पवित्रता भी दम तोड़ देती है। दिखावे की इस होड़ ने प्रेम को एक ‘उजड़ी हुई महफ़िल’ बना दिया है, जहाँ शोर तो बहुत है, पर सुकून गायब है।

     

     

    ‘ऑप्शन’ की भरमार और प्रतिबद्धता की कमी

    डेटिंग एप्स के दौर में इंसान अब ‘रिश्ते’ नहीं, ‘विकल्प’ (Options) तलाशता है। जब तक सामने वाले से स्वार्थ सिद्ध हो रहा है, तब तक वफादारी है। जैसे ही कोई बेहतर विकल्प मिलता है, पुराने वादे और कसमें बोझ लगने लगती हैं। जहाँ रिश्तों में एक-दूसरे के प्रति जवाबदेही और सामाजिक लोक-लज्जा का डर खत्म हो जाता है, वहाँ ‘धोखा’ देना एक आम बात बन जाती है।

     

     

    वफादारी का गिरता स्तर

    वफ़ा का सीधा संबंध चरित्र और मूल्यों से है। आज की ‘आशिकी’ में वफ़ा को अक्सर ‘पुरानी सोच’ करार दे दिया जाता है। लोग एक साथ होते हुए भी मानसिक रूप से कहीं और होते हैं। बिना किसी संकोच के भावनाओं के साथ खेलना आज एक ट्रेंड सा बन गया है। यह समाज के लिए एक चेतावनी है कि हम प्रेम जैसे सुंदर अहसास को उपभोग की वस्तु (Commodity) बना रहे हैं।

     

     

    उजड़ी महफ़िल सा अहसास

    आज के प्रेमी साथ तो हैं, पर वे अकेले हैं। रिश्तों में वह गर्माहट और भरोसा नहीं रहा जो पुराने दौर की कहानियों में मिलता था। आज की आशिकी उस उजड़ी हुई महफ़िल की तरह है जहाँ मोमबत्तियाँ तो जल रही हैं, पर रौशनी नहीं है। सब कुछ सतही है, गहरा कुछ भी नहीं।

     

     

    प्रेम केवल दो शरीरों का मिलन नहीं, बल्कि दो आत्माओं का एक-दूसरे के प्रति समर्पित होना है। जब तक रिश्तों में ‘हया’ (शर्म) और मर्यादा वापस नहीं आएगी, तब तक ‘वफ़ा’ केवल किताबों का शब्द बनकर रह जाएगी। हमें समझना होगा कि आजादी और उच्छृंखलता में फर्क होता है। प्रेम को फिर से ‘आबाद’ करने के लिए हमें इसमें गहराई, सम्मान और ईमानदारी को वापस लाना होगा। आज की आशिकी को अगर बचाना है, तो उसे बाज़ार से निकालकर फिर से दिल के कोने में जगह देनी होगी।

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